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बेज़ुबान जीवों पर अत्याचार अमानवीय -- जगदीश बाली

ईश्वर ने इस संसार में रहने के लिए केवल मनुष्य को ही पैदा नहीं किया। इस पृथ्वी पर केवल मनुष्य का एकाधिकार नहीं है। सृष्टि के उस सर्जक ने इस प्रकृति को विभिन्न तरह के प्राणियों से अलंकृत किया है। उसने इस जहां को छोटे से छोटे और बड़े से बड़े जीवों से भरा है। इन सभी जीवों का इस पृथ्वी पर जीवित रहने का उतना ही हक है जितना मनुष्य का। हां, ईश्वर ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणि ज़रूर बनाया है। मनुष्य अन्य जीव-जंतुओं से इसलिए श्रेष्ठ व अलग है क्योंकि उसमें मनुष्यता के गुण हैं। उसमें संवेदनाएं है, दया है, सहानुभूति है और दूसरों के दर्द को समझने व महसूस करने वाला एक दिल भी है। वह अच्छे और बुरे के बीच में फ़र्क करने की सलाहियत रखता है। इन सबमें दया को मनुष्ता का सबसे बड़ा लक्षण माना गया है। यदि मनुष्य में दया नहीं तो वह जानवर की माफ़िक ही है। शास्त्रों में कहा गया है कि अहिंसा मानव धर्म का लक्षण है और प्राणियों का वध अधर्म है। जिस मनुष्य में प्राणियों के प्रति दया नहीं उसका तप-जप, शिक्षा-दीक्षा, ज्ञान-ध्यान सब निरर्थक है। मनुष्य इस सृष्टि का राजा ज़रूर है और अन्य प्राणि इसकी रयाया है। एक राजा के रूप में जीव जंतुओं का भक्षण व संहार नहीं, बल्कि रक्षण व संरक्षण उसका कर्तव्य है। कबीर दास जी ने कहा है- जीव मति मारो बापुरा, सबका एकै प्राण। हत्या कबहूं न छूटिहैं, जो कोटिन सुनो पुराण। अर्थात जीवों को नहीं मारना चाहिए क्योंकि सभी जीवों में एक जैसे प्राण होते हैं। जीव हत्या के पाप को आप पुराणों के करोड़ों वचन सुन कर भी नहीं धो सकते। 
    ऐसा नहीं है कि मनुष्य के वर्चस्व वाली इस दुनियां में पशु-पक्षियों से मोहब्बत करने वाले नहीं हैं। परंतु दुखद पहलू यह हैं कि जीव जंतुओं के साथ क्रूरता करने वालों की भी कमी नहीं हैं। कुछ दिनों पहले केरल के साइलैंट वैली फ़ॉरैस्ट में एक 15 वर्षीय हथिनी की विस्फ़ोटक पदार्थ खाने से दर्दनाक मौत हो गई। ये और भी विषादित करने वाला विषय है कि हथिनी गर्भवती थी। वह तीव्र पीड़ा को तीन दिन तक एक तालाब में खड़े-खड़े सहती रही और अंतत: अपने अजन्में बच्चे के साथ उसकी मौत हो गई। उसकी मौत के साथ इंसानियत की भी एक बार फ़िर मौत हो गई। इसी तरह की ह्र्दय विदारक घटना हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के झंडूत्ता के डाढ गांव में भी सामने आयी है। यहां कुछ दिनों पहले विस्फ़ोटक पदार्थ चबाने से एक गर्भवती गाय बुरी तरह घायल हो गई। देवभूमि हिमाचल के लिए यह घटना कलंकित करने वाली ही कही जा सकती है। गाय या हथिनी मे से किसी ने शौक से स्वत: ही विस्फ़ोटक पदार्थ खा कर आत्महत्या करने की कोशिश तो नहीं की होगी। इन कुकृत्य के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार रहा होगा। इन घटनाओं के सिलसिले में गिरफ्तारियां भी हुई हैं। वैसे जानवरों से क्रूरता की ऐसी घटनाएं अकसर सामने आती रहती हैं। 
    आपको याद होगा जुलाई 2016 में चिन्नई में एक कुतिया से क्रूरता का दिल रुला देने वाला मामला भी सामने आया था। सोशल मीडिया में वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें एक युवा एक कुतिया को छत की टैरैस से नीचे फ़ेंकता हुआ दिखाई देखा जा सकता है। अच्छा ये हुआ कि कुतिया बच गई और कार्तिक डंडपानी नामक एक जीव प्रेमी स्वयंसेवी ने इस कुतिया को गोद ले लिया और इसका नाम भद्रा रखा। रोचक है कि भद्रा से मिलने सदाशिवम नामक 68 वर्षीय जंतु प्रेमी कोयंबतूर से चिन्नई पहुंचा और उसने इस कुतिया को गले लगा कर बेज़ुबान जीव के प्रति अपना स्नेह जताया। दुखद है कि इस घटना को अंजाम देने वाले जो दो युवक थे, वे मैडिकल के छात्र थे अर्थात डॉक्टर बनने वाले थे। ये वाक्या दर्शाता है कि जहां जानवरों से प्रेम करने वाले मानवादी मौजूद हैं वहीं इन बेज़ुबान जानवरों से अमानवीय व्यवहार करने वाले लोग भी जहां-तहां मिल जाते हैं। कुछ रोज़ पहले सोशल मीडिया पर एक और वीडियो वायरल हुआ जिसमें एक शख्स ने मिलन करते नाग-नागिन के जोड़े को काट डाला। 
    विडंबना है जहां एक ओर हम वानरराज हनुमान की पूजा करते हैं और उनकी 108 फ़ुट ऊंची प्रतीमा स्थापित कर अपनी आस्था का दंभ भरते हैं, वहीं दूसरी ओर वानरों की हत्या की खबरें देवभूमि हिमाचल में सामने आ रही हैं। कारण ये कि वे हमारी फ़सलों को नष्ट कर देते हैं। बंदरों को भगाने के कई और तरीके भी हो सकते हैं। जंगल पर्याप्त नहीं होंगे, तो भूख मिटाने के लिए खेतों की ओर रुख करेंगे। एक तरफ़ हम राजा शिबि की बात गर्व से करते हैं जिन्होंने कबूतर के मांस के बदले अपना पूरा शरीर बाज़ के समक्ष भक्षण के लिए रख दिया था, वहीं दूसरी तरफ़ बेझिझक पशु-पक्षियों का शिकार व मांस भक्षण को हम मानव का अधिकार समझते हैं। कहने को तो हम गाय को माता कह देते हैं, पर हमारी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसका भरण-पोषण ठीक तरह से किया जाता है। परंतु जब वह दूध देने के काबिल नहीं रहती तो उसे जंगलों में हांक दिया जाता है। वैसे तो हम नंदी बैल की भी पूजा करते हैं, परंतु जहां बैलों से खेती नहीं की जाती, वहां बछड़ा पैदा होने पर उसे इतना कम भोजन दिया जाता है कि वह स्वयं मर जाता है या थोडा बड़ा होते ही उसे भी जंगल में छोड़ दिया जाता है। अगर ऐसा न होता तो सड़कों पर आज इतने सारे गाय-बैल कहां से आ रहे हैं। कसाईखानों में किस तरह जानवरों को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतारा जाता है, ये किसी से छुपा नहीं। आज भी धार्मिक स्थलों पर खास मौकों पर सैकड़ों बेज़ुबान बकरों की गर्दनें सरेआम अलग कर दी जाती हैं। आस्था का ढोल पीटने वाले इसे देवी देवताओं को खुश करने की परंपरा का हवाला देते हुए इसे जारी रखे हुए हैं। पहले तो कई बातें हुआ करती थीं जो आदमी के सभ्य होते-होते बदल गयीं। परंतु मालूम नहीं क्यों अंधविश्वास से भरी हुई ये धारणाएं आज भी बनी हुई हैं। पशु-पक्षी बोल नहीं पाते। इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें दर्द और पीड़ा नहीं होती। यदि जानवरों से मनुष्य के जीवन को खतरा हो जाए, तो उस स्थिति में जानवरों का हनन उचित माना जा सकता है, परंतु बिना प्रयोजन के ही बेज़ुबान जीवों की हत्या कर देना, उन्हें पीड़ा पहुंचाना कहां का धर्म है, कहां का न्याय और कैसा अधिकार? याद रखो कुदरत अपना बदला कई रूपों में कई गुणा बढ़ा कर लेती है।

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