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» » मुझे तोड़ लेना वनमाली-- जगदीश बाली


Jagdish Bali
एक बार फ़िर वही हुआ जो घाटी में दशकों से होता आया है। एक बहुत बड़ा फ़िदायीन हमला और देश के लगभग 40 जवान शहीद हो गए। जब कभी भी जम्मू-कश्मीर में ये लगने लगता है कि घाटी में अमन कायम होने वाला है, तभी दहशतगर्द ऐसी घटना अंजाम दे जाते हैं कि हर एक सच्चा हिंदोस्तानी सिहर उठता है। कुछ ही समय पहले जब बारामूला को आतंकी रहित ज़िला घोषित किया गया, तो लगा कि नए साल में घाटी की फ़िज़ाओं में अमनोचैन की खुशबू फ़ैलने वाली है। पर अमनोचैन कैसे हो सकता है जब पड़ोसी देश पाकिस्तान हो, उसकी पनाह में नाचने वाले दहशतगर्द हो और दहशतगर्दों को कवर देने वाले पत्थरबाज़ अपने देश में ही मौजूद हो। पुलवामा ज़िले में स्थित अवंतिपोरा इलाके में जिस तरह से जैश-ए-मौहम्मद के विस्फोटक फ़िदायीन हमले में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस के जवानों को उड़ाया गया, वो घाटी में दहशतगर्दों के इरादों को स्पष्ट करता है। सितंबर 2016 में हुए उरी हमले से भी बड़ा व भयानक ये हमला था। इस आत्मघाति विस्फोट के बाद जो मंज़र पसरा था, उसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं थी। चारों ओर क्षत-विक्षत पड़े शवों को पहचानना तो दूर, शहीद जवानों के अंगों को ढूंड पाना भी असंभव था। आदिल अहमद डार द्वारा कार्यान्वित यह हमला इस बात की बानगी है कि दहशतगर्दों को अमनोचैन व बात-चीत से कोई सरोकार नहीं। वे तो बस कत्लोगारत व दहशत से जन्नत जाना चाहते हैं। इंसानियत खो चुके ऐसे आतंकियों का सफ़ाया होना चाहिए और उनके पनाहगाह पड़ोसी को भी माकूल सबक सिखाया जाए। उनसे बात-चीत का ढिंढोरा पीटना बंद होना चाहिए। अहम सवाल है आखिर कब तक हमारे देश के जवान यूं ही शहीद होते रहेंगे। आतंकियों के सथ रोज़ मौत से रु-ब-रु होते सैनिकों की बदौलत ही हम देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है।
ज़रा अंदाज़ा लगाइए घाटी के उस विरोधपूर्ण और तनाव भरे वातावरण व परिस्थितियों की, जिनमें हमारा फ़ौजी काम कर रहा है। ये स्थिति सचमुच किसी भीषण आपदा से कम तो नहीं है। कश्मीर घाटी में एक ओर तो सैनिक पाकिस्तान से आ रहे गोलों का सामना करते हैं और दूसरी ओर उसके द्वारा भेजे गए आतंकवादियों से लोहा लेते हैं। उस पर ये ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ व ’हिंदोस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगानेवाले पत्थरबाज़ और सियासी चालबाज़। हद तो तब हो जाती है जब सियासी गलियारों से भी ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा गूंज उठता उठाता है। दरअसल ये आवाज़ उन लोगों की है जो नमक तो भारत का खाते हैं, परन्तु उनके दिल में सहानुभूति पाकिस्तान के लिए हैं। ऐसी अलगाववादी व हिंदोस्तान विरोधी सोच रखने वालों के लिए अफ़जल गुरू, कसाव, बुराहन अवानी जैसे लोग शहीद ही होंगे और वे मानव अधिकार की आड़ में ऐसे लोगों को बचाने का भरसक प्रयास करते रहेंगे।
 हम चैन की नींद इसलिए सो पाते हैं क्योंकि सीमा पर वहां वो सैनिक खड़ा है। हम इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वह सैनिक दुश्मन के आ रहे गोलों के सामने चट्टान बन कर ढाल की तरह खड़ा है। पूस की कड़कड़ाती ठंड हो या जेठ की झुलसा देने वाला ताप, वो सैनिक वहां मुस्तैद खड़ा है। हम इसलिए अपने परिवार के साथ आनंदमय और सुखी जीवन का उपभोग कर रहे हैं क्योंकि कोई अपने परिवार, अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने भाई- बहिन, अपने मां-बाप को छोड़ कर सीमा पर तैनात है। हम इसलिए अपनी छुट्टियों व त्यौहारों की खुशियां मना पाते हैं, क्योंकि वहां देश का वो जवान खड़ा है, जिसके लिए कई बार छुट्टियां भी नसीब नहीं होती और मिलती है, तो कोई पता नहीं कब सीमा पर से बुलावा आ जाए। वह फ़ौजी शिकायत भी नहीं करता। वो तो देश के लिए शहीद होने के लिए तैयार रहता है। वह सिर नहीं झुकाता, बल्कि सिर कटाने के लिए तैयार रहता है और कहता है:
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जाए वीर अनेक
   आखिर बर्दाश्त की हद होती है। विभिन्न न्यूज चैनल्ज़ पर वीडियो में साफ देखा जा सक्ता है किस तरह से अलगाववादी सैनिकों को लात-घूंसे मारते है, उनसे छीना झपटी की जाती है और उनकी टोपी तक उछाली जाती है। फिर भी सैनिक सहन करते हैं। फिर पत्थरबाज़ उन पर पत्थरों की बरसात करने लग जाते हैं। ये सब देख कर आम देशवासी का तो खून कौलने लगता है। आखिर सैनिक कब तक खामोश रहे और क्यों? पाक परस्त पत्थरबाजों व उनके चालबाज सियासी आकाओं को समझ लेना चाहिए कि उनके नापाक मनसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।
 आज सीमा पर जवान रोज़ कुर्बान हो रहे हैं और इसके बावजूद भी सियासत के कई मदारी उनके विरुद्ध ऎफ़.आइ.आर दायर करने की बात करते हैं और पत्थर बाज़ों को आम मुआफ़ी का तोहफ़ा प्रदान करते हैं। वे पाकिस्तान के साथ बातचीत की हिमायत जोर शोर से करते हैं। ऐसा कर वे सैनिक के मनोबल को गिराने का घिनौना प्रयास कर रहे हैं और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। जिन सैनिकों की बदौलत देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है, उनके विरुद्ध प्राथमिकि दर्ज़ कर उनके मनोबल को नहीं गिराया जाता, बल्कि उनकी वतन परस्ती के ज़ज़्बे के आगे सिर झुकाया जाता है। भूलना नहीं चाहिए कि जब जवान आक्रोष में आता है, तो वह ऐसे शक्तियों को छिन्न-भिन्न कर देता है।
 वक्त आ गया है कि आतंकियो और उन्हें सहायता देने वाले पत्थरबाज़ों के साथ शून्य सहनशीलता की नीति को अपनाया जाए क्योंकि ये  न प्रेम की भाषा जानते हैं न मोहब्बत के गुलाब। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उचित ही कहा है:
छीनता हो स्वत्व कोई, और तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है
 आज देश के हर फौजी से सच्चा देशवासी कह रहा है – फौजी! तुम्हारे कारण ये देश जिंदाबाद है। इसलिए तुम हमेशा ज़िंदाबाद हो और तुम्हें ये देश जय हिंद कहता है।

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