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दीवान-ए-दीपक 

 
मुकद्दर में ही लिखा था,मुहब्बत कैसे न होती
दर्द भी मिलना लिखा था तो कैसे आँख न रोती
 

 तेरी हर सोच का हर फैसला मंज़ूर है दाता
इंसान की मजबूरी का यही तो फर्क है दाता 
तू जो चाहे वो कर सकता तेरे काबू में है सब कुछ
तेरी रहमत अगर होती तो कुछ तो मैं भी कर जाता 
 
दीपक कुल्लुवी 
२४/९/१२.

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