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सब कहते बेकार

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सब कहते बेकार

सब कहते बेकार लिखा
क्या सब कुछ सब बेकार लिखा ?
वोह शे-र वोह ग़ज़ल वोह भजन वोह दोहे
क्या सचमुच किसीको कुछ न जचा ?
कुछ न सीखा कुछ न सोचा
लखते रहे बस लिखते रहे
अब क्या लिखें ओ रामा..?
लिखनें को भी शायद कुछ न बचा
दीपक 'कुल्लुवी' तो पागल है
पागल था पागल ही रहा
सब हँसते देखके पागल को
वह अपने पागलपन पे हँसा
दुनियाँवाले वाह.. वाह.. करते रहे
अपनें हा..हा..करते रहे
सबको शायद सकूँ मिल गया
मुझको इक बन्दर सा नचा
मुझको इक बन्दर सा ------

दीपक शर्मा कुल्लुवी
935078399
20 /08 /12 .
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