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मजनुओं की कमी नहीं

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टेम्‍पों में ज्‍यादा सवारियां नहीं थी।  आमने -सामने दोनों तरफ की सीटों पर कुल छ: जने बैठे हुए थे। शाम का समय था । टेम्‍पों इंदिरा नगर के पॉलीटेक्निक चौक से गोमती नगर को जा रही थी । गोमती नगर में हॅनीमेन चौराहा टेम्‍पों का अंतिम स्‍टॉप था ।

टेम्‍पों में दो महिलाएं और अन्‍य सभी पुरूष लोग बैठे हुए थे। सभी अधेड थे । सब की उम्र पैंतालीस से पचास के बीच लग रही थी । दोनों महिला सवारी एक तरफ की सीट पर साथ- साथ बैठी हुई थी । उन दोनों के ठीक सामने बैठा अधेड़ कुछ फिल्‍मी अंदाज में नौजवानों की तरह एक फिल्‍मी गीत बेसुरी आवाज और भोंडे तरीके से गाने की कोशिश कर रहा था। लगता था, अधेड़ को अपनी उम्र का जरा भी लिहाज और अहसास नहीं है । सामने बैठी महिला को ऊपर - नीचे एकटक देखते हुए वह गाने की कोशिश कर रहा था। शक्‍ल- सूरत से  वह भद्र दिख रहा था । लेकिन उस की हरकतें किसी आवारा लौंडे जैसी दिख रही थी । संभवत: वह दारू पिये हुए था । सामने बैठी अधेड़ महिला नाक- भौंह सिकोड़ रही थी । लेकिन वह कुछ बोल नहीं रही थी । स्‍पष्‍ट था कि वह सामने वाले की हरकतों से परेशान हो रही है। वैसे लखनऊ उत्‍तर प्रदेश के सब से सभ्‍य शहरों में माना जाता है ।

विवेकखंड आते- आते कुछ सवारियां चढ़ी और कुछ उतरीं । पर उस अधेड़ का गाना और महिला की ओर झुक - झुक पड़ना बदस्‍तूर जारी था । मैं कुछ समय तक इन हरकतों को देखता रहा । जब मेरे पास वाली सवारी उतरी तो मैंने उस महिला की परेशानी को भांप अपने पास की खाली सीट पर बुला लिया। लेकिन उस अधेड़ व्‍यक्ति की हरकतें अब और अधिक बढ़ गई थी । हर कोई उस की उम्र और उसे शराब के प्रभाव में जान उसे नजरअंदाज कर रहा था । पर वह अपनी ओछी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था । फिर वह उठा और महिला के पास आ कर बैठ गया और भोंडी हरकतें करते हुए उल - जलउल बकने लगा । महिला का चेहरा बता रहा था कि वह अधिक असहज है और अपने आप को अपमानित

महसूस कर रही है । लेकिन हर कोई चुप बैठा हुआ था । जब मुझ से रहा नहीं गया तो मैंने अधेड़ को दूसरी सीट पर बैठने के लिए कहा । आश्‍चर्य, वह बिना
किसी प्रतिवाद के मान गया और दूसरी सीट पर बैठ गया । परन्‍तु उस की हरकतें जारी थीं  और अब वरदाशत से बाहर होती जा रही थी ।  महिला शायद अब डर गई थी ।
शक्‍ल- सूरत और पहनावे से महिला सिंधी या पंजाबी लगती थी । सुसंस्‍कृत और भले घर की ।  महिला मेरी तरफ कुछ सिकुड़ कर बैठ गई थी । उन दोनों के बीच मैं जैसे दीवार बन गया था ।

हुसैडिया चौराहे पर सभी सवारियां उतरने लगी । मजनू की तरह हरकतें करते उस अधेड़ ने टेम्‍पों से उतरते- उतरते महिला का हाथ पकड़ लिया । महिला ने जोर से " इडिएट " कह कर अपना हाथ झटके से छुड़ा लिया और तेज कदमों से दौड़ती हुई सी एक ओर को बढ़ गई । अधेड़ पुरूष उस ओर देखता हुआ महिला को ऊंची आवाज में बुलाने लगा । अधेड़ अपनी उम्र का लिहाज किये बिना लहक रहा था और आस- पास खड़े लोग उस की अदाओं पर हंस- हंस कर लोट-पोट हो रहे थे । लेकिन किसी ने उस शराबी  को समझाने या चुप कराने की कोशिश नहीं की। लोगों के लिए यह जैसे एक  मुफ्त का   मनोरंजन था । परन्‍तु महिला के प्रति लोगों में कोई सहानुभूति, कोई संवेदना नहीं दिख रही थी । 

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