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सफरे हयात यों ही चलता ही चला जाता है--गज़ल

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सफरे हयात यों ही चलता ही चला जाता है
इसमें बिछड़ता है कभी कोई कभी जुड़ता जाता है

एक सा नहीं रहता कभी दिन रात का मिज़ाजे मौसम
इन्सा कभी गम तो कभी खुशी में जीता चलता जाता है

हम गर अकेले भी कभी पड़ गए हयाते राह पर चलते
तब भी समझते हम रहे यों सिलसिला चलता जाता है

हमने कभी भी तो गिला शिकवा नहीं किया किस्मत से
हम तो समझते हैं सफर ये जिन्दगी कटता जाता है

कतरा समन्दर का महज़ हम हैं भरम फ़िर क्योँ  हमको हो
जब तक भी जियो खुश रह सको दिल ये दुआ करता जाता है !!
                                                                                                                    --अश्विनी रमेश
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