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फीके रंग (दीपक शर्मा कुल्लुवी)

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फीके रंग

फीके हो गए रँग होली के
जब से रंग रिश्वत का आया
भ्रष्टाचारी गिरगिट सा रँग
सारी दुनियाँ पर है छाया
तू भी पापी मैं भी पापी
सारी दुनियाँ पापी
पाप के भागीदार हैं सारे
क्या ममता क्या माया
बापू प्यारे,अन्ना हजारे
कलयुग में किस किसको सुधारें
किसी ने घपले किये हज़ारों
किसी ने चारा खाया
कहीं भंवरी कांड,कहीं बंदर बाँट
अँगूठा छाप के भी ठाठ बाठ
सब जानते लाखों करोड़ों का
किसने चूना लगाया
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई
सब कहते हैं भाई भाई
लेकिन भाईचारे का
किस किसनें धर्म निभाया
रँग-ओ-गुलाल की होली कहाँ अब
खून की होली होती है
खून की होली से ही अब तो
यह संसार नहाया
दीपक 'कुल्लुवी' तू पागल है
तू क्या करने आया
कविता सुनाने पाँच मील से
पैदल पैदल आया
पैदल पैदल-----

दीपक शर्मा कुल्लुवी
09350078399

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