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*****रूठते सिरफ वो तो मना ही लेते हम*****--गज़ल

रूठते सिरफ वो तो मना ही लेते हम
होते गिले शिकवे  मिटा ही लेते हम

हमसे खफा का तो सबब वो ही जाने
होती  खता कोई सज़ा ही लेते हम

ऐसी न थीं मजबूरियाँ कोई उनकी
होते दिले रुसवा खता ही लेते हम

वस्ल  हिज्र ज़माने की पुरानी बातें हैं
जो हाल हो खुलकर सुना ही लेते हम

रूठना कभी तो मान जाना वाजिब है
होता कहीं ऐसे निभा ही लेते हम  !!

4 comments:

  1. nice one.

    gar saath nibhata vo mera ek kadam
    omar bhar ki bewafaii seh hi lete ham.

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  2. अच्छी शायरी ,
    हमें मिलते तो ही मना लेते
    लेकिन जो मिलते ही नहीं
    कैसे फासला कम किया जाए|

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  3. मुकेश जी,
    टिप्पणी के लिए आभार !जो मिलते हैं ,उनको मनाओ जो नहीं मिलते उनको खुदा के करम पर छोड़ दो !

    जवाब देंहटाएं

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