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निभा पाओगे

16.12.111पाठकों के सुझाव और विचार




















निभा पाओगे

लाख चाहकर भी मुझे न तुम बुझाओगे
तुम अंधेरों में रहोगे जो न जलाओगे
मेरी तकदीर में लिखा था जलो सबके लिए
दर्द के किस्से किसी को न तुम सुनाओगे
अपनी खातिर हवाओं से बचाओगे मुझे
बुझ न जाऊं कहीं अश्क न बहाओगे
मेरे बुझने का अहसास भी डराता है तुम्हें
आँसूं तो आएँगे कहीं तन्हा ही बहाओगे
जल जल के कुंदन सी बन गई है मुहब्बत मेरी
ज़िन्दगी बीत गई भुलाई न गई यादें तेरी
आज भी जलते हैं रखते हैं ताज़ा हरदम
क्या मेरी तरह आप भी निभा पाओगे

दीपक शर्मा कुल्लुवी
9350078399
१६/१२/११.

नापसंदगी के लिए सबसे क्षमा चाहूँगा
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