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कहानी (दीपक शर्मा 'कुल्लुवी') हाथ छूट गया साथ छूट गया

17.11.111पाठकों के सुझाव और विचार



कहानी
(दीपक शर्मा 'कुल्लुवी')
हाथ छूट गया साथ छूट गया

कुछ पल ज़िंदगी के दर्द भरे होते हैं I
जब हम सबके होते हुए तन्हा से होते हैं II

आज मेरी ज़िंदगी का एक अजीब-ओ-गरीब दिन था I मेरे माता पिता कुछ दिन हमारे साथ गुज़ारने के बाद बापिस अपने घर कुल्लू जा रहे थे I मेरे पिता श्री जयदेव 'विद्रोही' जी को अखिल भारतीय स्वतन्त्र लेखक मंच की तरफ से इस वर्ष का महाकवि कालिदास अवार्ड मिला था इसी को प्राप्त करने के लिए वह कुल्लू से यहाँ पधारे थे I पिछले तीन दिनों से वोह मेरे मामा जी के घर आयानगर में थे वहीँ से सीधे उन्हें दिल्ली बस अड्डे पहुंचकर कुल्लू की बस लेनी थी जो दिन को तीन बजे के करीब चलती थी I मुझे उनके इस प्रोग्राम का पता चला तो मैंने अपनें दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ले ली पूरे दिन की मिल नहीं पायी क्योंकि मेरे एसिस्टैंट 'नीरज पांडे ' के पिता जी का कुछ दिन पहले क़त्ल हो गया था इसलिए वह अपने घर बहराइच गया हुआ था I ऑफिस से सीधे गोविन्दपुरी मैट्रो स्टेशन पहुँचा और वहाँ से केन्द्रीय टर्मिनल पहुँचा वहाँ पहुँचते ही कश्मीरी गेट की मैट्रो पकड़ ली और बिना कोई समय गंवाए बस अड्डे पहुँच गया जैसे ही मैं मैट्रो से बहार निकल रहा था तो मेरे बेटे का फोन आया उसनें पूछा कहाँ पहुंचे हो ....? जल्दी आओ पाँच मिनट में बस निकलने वाली है यह सुनकर मैं बदहवास सा स्टैंड की तरफ भागा... जैसे ही वहां पहुंचा तो देखा कुल्लू की बस वहां नहीं थी I मैंने पूछ्तास काउंटर से पूछा तो उन्होनें बतलाया अभी अभी तो निकली कुल्लू की बस..... मैंने देखा बाहर वाले गेट के नजदीक बस खड़ी थी मैं तेजी से फिर उस तरफ भागा जैसे ही बस के नजदीक पहुंचा बस फिर आगे निकल गई जैसे वोह मुझसे चूहे बिल्ली का खेल रही हो लेकिन किस्मत से उसके आगे एक चंडीगड़ की बस लगी थी इस वजह से कुल्लू वाली बस को रुकना पड़ गया मैंने तेज़ी से खिड़की की तरफ भागा और पिता जी को देने वाले कुछ पेपर खिड़की के साथ खड़े एक व्यक्ति को देते हुए कहा बस में श्री जयदेव विद्रोही जी बैठे होंगे यह उन्हें दे देना I तभी मेरी नज़र सामने की खिड़की पर पड़ी जहाँ मुझे मेरे पिता जी की कुल्लुवी टोपी दिखी दी मैंने आव देखा न ताव चलती बस के आगे से निकल कर दूसरी तरफ पहुँच गया साँस फूल चुका था आवाज़ निकल नहीं रही थी मैंने जोर जोर से खिड़की पर हाथ मारा जिससे मेरी माँ की नज़र मुझपर पड़ गयी और उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और जोर से मेरे पिता जी को कहा 'दीपक 'आ गया .. .. 'दीपक 'आ गया I इससे पहले पिता जी मुझे ढंग से देख पाते य कोई बात कर पाते बस तेज़ी से आगे निकल गयी और झटके से मेरा हाथ मेरी माँ के हाथ से छूट गया I और हम सब एक दूसरे को तब तक देखते रहे जब तक की एक दूसरे की आँखों से ओझल नहीं हो गए मेरे लिए बेहद दर्द भरे क्षण थे यह बेबस सा खामोश सा मैं फुटपाथ के साथ वाली दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया तभी मेरे बेटे का दुवारा से फोन आया अन्दर ही कहीं था उसने पूछा मैं कहाँ हूँ ? मैंने बतलाया बाहर वाले गेट के पास हूँ यह सुनकर कुछ ही देर में वह मेरे पास आ गया और कहने लगा कहा दादा दादी तो चले गए......मेरी इतनी हिम्मत नहीं थी की उससे कह पता कि मैं उनसे चलते चलते मिल पाया हूँ क्योंकि मेरा ब्लड प्रैशर बढ़ गया था साँस जोर जोर से फूल रही थी शायद बस का समय बदल गया था ढाई बजे ही चल दी थी I इतनी भाग दौड़ करनें के बाद भी ढंग से माता पिता से न मिल पाने का बेहद अफ़सोस था ......लेकिन खुदा कि मर्ज़ी के आगे क्या कर सकता था रोना आ रहा था मगर जगह ऐसी थी की रो भी नहीं सकते थे ...मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूँ क्या न करूँ ? मैं आधे दिन कि छुटी लेकर आया था I मेरा बेटा पूछता रहा अब कहाँ जाओगे ? मैंने उसे कहा मुझे अभी कुछ नहीं पता मैं क्या करूँगा कहाँ जाऊंगा I इसके बाद मैंने उसे वहाँ से भेज दिया और काफी देर तक वहीँ अकेला खड़ा रहा I
बाद में मैं चांदनी चौक के शीशगँज गुरूद्वारे में जाकर घंटों बैठा रहा और रात को थका हारा उदास मन से कालकाजी अपने घर अपने घर पहुंचा I

दिल का दर्द वही जानता, जिसको होता है I
कौन जाने किसी की याद में, कोई क्यों रोता है II

दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'
09350078399
१७.११.११.
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