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अपनी-अपनी कुर्सी से चिपके रहो प्यारे ----- बोधिसत्व कस्तूरिया

27.9.110 पाठकों के सुझाव और विचार

अपनी-अपनी कुर्सी से चिपके रहो प्यारे,
जिनका मर गया ज़मीर,उन्हे कौन मारे!!
जनता तो मरने को है,कभी आतंक वाद,
कभी मँहगाई और कभी प्रशासन के मारे!! अपनी- अपनी कुर्सी........
पाँच साल के लिये, मिल गई जो कुर्सी,
चाह कर भी फ़िर ,कौन गद्दी से उन्हे उतारे!! अपनी- अपनी कुर्सी........
जनता को बेलने पड रहे हैं कितने पापड?
बेटे की फ़ीस,ट्यूशन,रसोई कर रहे हैं उघारे!! अपनी- अपनी कुर्सी........
समझ नही आता फ़िर भी कैसे करते हैं?
लोग पैट्रोल का कुल्ला और दारू के गरारे !! अपनी- अपनी कुर्सी........
हाँ बेशक उनके घर पर चूल्हा ना जले,
उनकी ज़िन्दगी तो बस, मौज़-मस्ती है प्यारे!! अपनी- अपनी कुर्सी........
बीबी झिक-झिक करती, तेल ७०रू०किलोहै,
पकौडी कैसे बनाऊ,सब्ज़ी झौकने से भी हारे !! अपनी- अपनी कुर्सी........
बच्चो को खाना खिलाये या पढा्यें-लिखायें,
मध्यम वर्गीय परिवारो को नज़र आ गये तारे!!अपनी- अपनी कुर्सी........
बोधिसत्व कस्तूरिया 

२०२ नीरव निकुन्ज
सिकन्दरा आगरा २८२००७
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