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» » » » » मनमानियां (दीपक 'कुल्लुवी')











हम आपकी मुहब्बत के लिए बदनाम तक़ हो जाते
गर आपका ईशारा इक बार समझ जाते

मनमानियां

कुछ हमारी जिद्द थी और कुछ उनकी नाफ़र्मानियाँ
कुछ हमारी थी और शायद कुछ उनकी नादानियाँ
न उनमें कमीं थी न हममें कमीं
ज़िन्दगी में रही किर क्यों गुमनामियाँ
सितारों सी इज्जत -ओ-शौहरत मिली
चाँद तारों सी हमको मुहब्बत मिली
न जिद्द तुमनें तोड़ी न हमनें ही तोड़ी
करते रहे दोनों मनमानियां
शौक़-ए-वफ़ा दर्द देता ज़रूर
चढ़ता नहीं सबपे इसका फितूर
दुनियाँ की लिखते रहे उम्र भर
लिखी न गई हमसे अपनीं कहानियाँ
दीपक 'कुल्लुवी' को जलना,जलेगा ज़रूर
अपनी वफ़ा पे करेगा गरूर
ज़मानें की परवाह न की न करेगा
होती रहे चाहे बदनामियाँ

दीपक 'कुल्लुवी'
03 -09 -2011 .
09136211486

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