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मुकेश नेगी

जन्म:- 18/02/1975
स्थान:- कामरू, किन्नौर, हि. प्र.|
हि. प्र. विश्वविधालय से हिन्दी में एम.ए.,एम .फिल.,पीएच.डी. शोध छात्रवृति के दौरान विश्वविधालय में अध्यापन
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कवितायें, लेख,आलेख प्रकाशित एवं संगोष्ठियों में शोधपत्र का वाचन

3 comments:

  1. बधाईयाँ सुन्दर संगठित मंच अव्यावसायिक.........मैंने भी शौक के लिए अपना ब्लॉग बनाया हुआ है आशा है आप इस मंच में मेरा ब्लॉग भी सम्मलित करोगे l ....http://bikhareakshar.blogspot.in/

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  2. सर्दी हो या गरमी सूरज अपनी किरणे बरसाती है। कभी लुका छुपी का खेल दिखाकर प्रकृति
    के रंग को पलटती है।
    सूरज की अनुपम छटा बिखेरते ही
    समस्त वातावरण मंत्रमुगधकारी हो
    जाता है सूरज की किरण के पहले पायदान में ही सभी की आंखे खुल जाती है
    फलों फूलों के रंग खिल जाते
    ऑक्सीजन के संचार का माध्यम बन कर पेड़ पौधों की हरियाली को तरोताजा करती है।
    सूर्य की पहली किरण पर्वत श्रृंखला पर दिखते ही दिन का आगाज शुरु होने लगता है
    बच्चे स्कूल को, मजदूर कामकाज पर, कोई नौकरी तो कोई घर के काम में जुट जाता है
    रसोई की मिठास पकने लगती है।
    उगता सूरज ऊर्जावान व डूबता सूरज मिट जाता है
    सूर्य की किरण चेहरे पर रौनक
    खेतों में हरियाली आवाजाही कोई होने लगता है।
    कभी किसी पर ग्रहण लग जाए
    तो इसे अशुभ माना जाता है
    देख रहा हूं सूरज कब अपनी छटा
    बिखेरती है।
    सूरज डूबते ही मानव भी दिन भर के क्रिया कलापों को समेट लेता है
    जिस तरह आराम करने के लिए सूरज पहाड़ी के उस पार लौट रहा हो।
    अब थकावट होने लगी है आराम करने का वक्त आ चुका है। उगता सूरज जीत और डूबता सूरज हार के समान है।

    स्वरचित
    मुकेश नेगी
    हि प्र।

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