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» » » » » कहानी प्रायश्चित (दीपक शर्मा 'कुल्लुवी')



कहानी
प्रायश्चित
बस स्टैंड से जैसे ही मैं बस में चढ़ा तो सामनें की सीट पर बैठे अपनें एक पुरानें मित्र को बैठे देखा I उत्सुकता वश मैनें उससे पूछा कहाँ जा रहे हो भाई ? यह सुनकर उसनें जबाब दिया घर जा रहा हूँ I मैनें फिर उससे प्रश्न किया ऐसे ही घूमनें फिरनें जा रहे हो या किसी काम से ? यह सुनकर उसने उदास स्वर में कहा नहीं घूमनें फिरनें नहीं दरअसल मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया है आज सुबह I और दुपहर तक अंतिम संस्कार भी हो जाएगा I

यह सुनकर मेरे तो होश उड़ गए I मैनें कहा कमाल है तुम्हारा यार...... इस बस में तुम्हें कम से कम सोलह घंटे लगेंगे घर पहुंचनें में I यहाँ से सीधी फ्लाईट है उसे पकड़ लेते तो केवल दो घंटे में घर पहुँच जाते अंतिम संस्कार से पहले पहले I तुमनें ऐसा क्यों नहीं किया ?
यह सुनकर मेरे मित्र नें रुआंसे स्वर में जवाब दिया तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो फ्लाईट पकड़ लेता तो समय से पहुँच जाता लेकिन क्या करूँ अपनीं मजबूरी के चलते ऐसा नहीं कर पाया I मजबूरी....... मैनें हैरानी से पूछा ऐसी क्या मजबूरी आ गई थी रुपये पैसे की बात थी तो हमसे कह देते ?
उसनें नज़रें झुकाते हुए कहा तुम मेरे सबसे पुरानें और सबसे अच्छे मित्र हो अब तुमसे क्या छुपाना I दरअसल बात यह है कि पिता जी हमसे किसी बात पर बेहद खफ़ा थे इसलिए वह अपनीं वसीयत में यह लिखकर गए हैं कि मेरा बेटा न तो मेरी अर्थी को कंधा ही देगा और न ही मुखाग्नि I अब उनकी इच्छा के विरुद्ध तो हम जा ही नहीं सकते थे इसलिए मैं जानबूझकर बस में जा रहा हूँ ताकि जब तक मैं पहुंचूं सब निवट जाए, हमारे पिता जी के बचन का मान भी रह जाए और हमारी शर्म भी I अगर समय से पहुँच जाता तो अंतिम यात्रा में शामिल तो ज़रूर होता पर न तो अर्थी को कंधा ही दे पाता और न ही मुखाग्नि I ऐसे में वहां आए हुए लोग ,रिश्तेदार,दोस्त मित्र हम पर हमारे खानदान पर उँगलियाँ उठाते I तरह तरह कि बातें करते I बेवजह की तानाकशी वर्दाश्त से बाहर हो जाती I किसी के सवालों का हमारे पास कोई जवाब ही नहीं होता I
उसकी बातें सुनकर मैंने कहा अगर तुम्हारे पिता जी नें जो इतनें सुलझे इतने समझदार इन्सान थे उन्होंने ऐसा फैसला किया है तो इसके पीछे कोई तो कारण तो ज़रूर होगा ?
उसने जवाब दिया हाँ कारण तो ज़रूर होगा वह कभी गलत नहीं हो सकते I लेकिन मुझे तो लगता था मैं बहुत अच्छा हूँ, भोला हूँ, सबसे प्यार करता हूँ, सबकी भावनाओं को समझता हूँ,सबको माफ़ करनें की हिम्मत रखता हूँ लेकिन शायद यह मेरी गलतफहमी ही थी मेरी भूल थी I अगर ऐसा होता तो मेरे साथ ऐसा हरगिज न होता I अब जो भी हो मैं तो खुद को ही कसूरबार समझता हूँ समझता रहूँगा जो मेरे पिता जी को इतना बड़ा फैसला लेना पड़ गया I शायद मुझमें ही कोई कमी थी य मैं ही घरवालों को ठीक से समझा नहीं पाया सबको यही लगता है की हम सब बहुत ऐश कर रहे हैं.....हाँ एक ज़माना था जब हमने बहुत ऐश की खूब घूमना फिरना ,होटल ,जहाज़ सब कुछ लेकिन कुछ वर्षों से वक़्त ने ऐसी पलटी मारी की हालात पूरी तरह से बदल गए I एक समय था जब मरे पास सब कुछ था फिर सब कुछ चला गया और आज यह हालात है कि किसी तरह से बड़ी मुश्किल से घर चला पा रहा हूँ I एक समय था जब मेरे पास तीन तीन चार चार कमरों के सैट होते थे आज एक कमरे में सारे परिवार के साथ गुज़ारा कर रहे हैं एक समय कार,मोटर साईकिल स्कूटर सब था आज एक टूटी फूटी साईकिल भी नहीं I इतनी भयंकर गर्मीं में जहाँ एयरकंडिशन भी फेल हो जाते है ऐसे में मेरे बच्चों के पास कूलर तक नहीं एक पंखे से काम चला रहे हैं जो गर्म हवा फैंकता है I और ऐसा भी नहीं पिता जी मुझे प्यार नहीं करते थे शायद सबसे ज्यादा मुझे ही प्यार करते थे I पिता जी नें अपनी जायदाद में से सबसे ज्यादा हिस्सा तो मुझे ही दिया है लेकिन वह जायदाद जिसपर एक बेटे का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है बाप की अर्थी को कंधा देनें और मुखाग्नि का उससे वंचित कर दिया I अब तुम्हीं बतलाओ किस मुहं से मैं फ्लाईट पकड़ता कैसे अंतिम यात्रा में शामिल हो पाता I उसकी दास्ताँ सुनकर मैनें कहा तुम लेखक हो भावुक हो अगर तुम खुद को अपराधी समझते हो तो इसका कोई तो प्रायश्चित भी ज़रूर होगा .... कुछ सोचा है इसके बारे में ? हाँ....... प्रायश्चित तो करूँगा और ज़रूर करूंगा I मैंने सोच भी रखा है I अपनीं आँखें तो मैंने और मेरी धर्मपत्नी ने पहले ही दान दे दी हैं I अब अपनीं मौत के बाद मैं अपना मृत शरीर भी मैडिकल रिसर्च सेंटर को दान दे दूंगा ताकि किसी का तो भला हो सके और अर्थी ,कंधा मुखाग्नि की सारी संभावनाएं अपने आप ही समाप्त हो जाएँ और किसी को कोई मलाल भी न रहे I सबको हर बंदिश से आजाद कर दूंगा I ताकि कल मेरे बेटे मेरे परिवार को इस दर्द से न गुज़रना पड़े जिससे मैं आज गुज़र रहा हूँ ..............I

मुझे अपनी खता मालूम नहीं,पर तेरी खता पे हैराँ हूँ
कैसे भुला दूँ दिल से तुझे, जैसा भी हूँ बस तेरा हूँ
दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'
09136211486


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4 पाठकों के सुझाव और विचार:

  1. vaishwik kalyaan aksar vyaktigat aaghaaton ko kam kar deta hai..

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  2. शर्मा जी बहुत ही सुंदर कहानी ! बधाई | आजकल के परिप्रेक्ष्य में सार्थक कहानी है |

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  3. ALOK JI THANKS FOR APPRICIATING MY STORY,AFTER WRITING THIS STORY I DONATED MY BODY TO AIIMS AFTER MY DEATH

    DEEPAK

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