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मुगल इतिहास का पन्नाः पिंजौर लेख - दौलत भारती

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महाभारत कालीन पिंजौर न केबल उस युग के किस्से ओर प्रमाण समेटे हुए है वल्कि मुगलसलतन की धरोहरें भी इस स्थल के ऐतिहासिक होने की पुष्टि करती हैं। गार्डन ही नहीं अपितु यहां का भीमा देवी मंदिर और पिंजौर की बावडियां भी इतिहास की गवाह हैं। कभी पंचपुर नाम से पहचान रखने वाले वर्तमान पिंजौर का उत्तर भारत का बृंदावन होने का दर्जा भी प्राप्त है। 
हरियाणा यूं भी अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए बिख्यात है । महाभारतकालीन विभिन्न घटनाओं का साक्षी हरियाणा उस युग से कई धरोहरों को अब भी संजोए हुए है। शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में बसे क्षेत्र सिंधु घाटी की सभ्यता स ेअब तक के इतिहास के ऐसे पन्ने हैं जो न केवल पुरातन भारतीय संस्कृति का आईना है अपितु आज भी ये स्थल आगुंतकों का अभिभूत करते हैं। चंडीगढ़ शिमला मार्ग पर अविस्थित पिंजौर भी सदियों पुरानी यादों को समेटे आज भी महाभारत कालीन और मुगल सलतनत की यादों का तरोताजा करता है। इतिहास के गबाह पिंजौर के बारे में बता रहे हैं दौलत भारती
सर्दियों में पहाड़ों में जब बर्फ पड़ती है और गर्मियों में मैदानी इलाकों में तपिश बेहाल करती है तो देश भर के सैलानी सकून प्राप्त करने के लिए हिमाचल की वादियों की ओर रूख करते हैं। यदि शिमला हो कर हिमाचल की ओर जाना हुआ तो चंडीगढ़ से मात्र 25 किमी की दूरी पर यादविंद्रा गार्डन पिंजौर कुछ पल रूकने के लिए एक अच्छी सैरगाह है। यूनेस्को की विश्व धरोहर पिंजौर का नजारा देखते ही हर कोई कह उठता है वाह !क्या बात है। शिमला मार्ग पर स्थित पिंजौर महाभारत काल, मुगल शासकों के दौर से गुजरते हुए वर्तमान में हरियाण का प्रमुख पयर्टक स्थल बन चुका है। हालांकि चंडीगढ़ से मात्र 20 किमी की दूरी पर होते हुए भी मुगलकालीन इस पड़ाव की पहचान महज यादविंद्रा पब्लिक गार्डन के रूप में ही है लेकिन कभी पंजपुरा के नाम से बिख्यात वर्तमान पिंजौर को अभी भी वह दर्जा हासिल नहीं हो पाया है जो इसे मिलना चाहिए था।
कुरूक्षेत्र महाभारत के लिए बिख्यात है ..पिंजौर का सम्बन्ध भी महाभारत से जोड़ा जाता है। जनश्रुतियों और मौजूद प्रमाणों के आधार पर कहा जाता है कि पाडंवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम एक वर्ष यहीं व्यतीत किया था और उसी आधार पर इसका नाम पंचपुर पड़ा। पंचपुर ही धीरे-धीरे पिंजौर के नाम से विख्यात हो गया।
ऐतिहासिक संदर्भो तथा हरियाणा पुरात्तव एवं संग्रहालय विभाग के मुताबिक पृथ्वी राज के एक शिलालेख में 1167 ईसवी - विक्रमी संवत 1224 में भी इस स्थल का उल्लेख पंचपुर के नाम से हुआ है।
इस क्षेत्र में एक लाख वर्ष पूर्व प्रयोग किये गये पत्थरों के औजार भी मिले हैं। जो इस क्षेत्र की प्राचीनतम ऐतिहासिक सम्पदा और आदिकालीन मानव सभ्यता के साक्ष्य माने जाते  हैं। 
पिंजौर क्षेत्र में बहुतायत में फैले हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियों एवं मंदिरों के अवशेष मिले हैं जो 13वीं शताब्दी तक पिंजौर के एक अन्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थल के रूप में विकसित हानेे की बात को पुष्ट करते हैं। इतिहासकार अलबरूनी के1030 ई के विवरण से भी यह बात प्रमाधित होती है। 
पिंजौर से प्राप्त अवशेषों का समृद्व संग्रह पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग, हरियाणा के अतिरिक्त, म्यूजजियम एण्ड आर्ट गैलरी, चण्डीगढ़, एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तव विभाग,कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरूक्षेत्र में भी है मौजूद हैं।
इतिहास के पन्नों के अनुसार13वीं शताब्दी के मध्य में विदेशी आक्रमणकारियों ने पिंजौर को भी तहस-नहस कर रख दिया। उसी दौर में यहां के विभिन्न मंदिरों की तोड़-फोड़ का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। 
1254 ई तक पिंजौर सिरमौर के शासक की जागीर था। मिन्हज-पस- सराज नामक तत्कालीन इतिहासकार ने ‘तदकाते नासिरी’ नामक ग्रंथ में उल्लेख किया है कि इल्तुतमिश के पुत्र नसीरूद्दीन महमूद ने 1254 ईस्वी में इस स्थान को सिरमौर के राजा से छीनकर अनेक मंदिर एवं बावडियों को तोड़ा। इसके बाद पिंजौर को1311 मे तैमूर एवं 1507 में चंगेज खां के आक्रमणों को भी झेलना पड़ा जिससे यहां की कई ऐतिहासिक धरोहरें नेस्तनावूद हो गई। 
ठतिहास के पन्नों के अनुसार औरंगजेब के शासनकाल के दौरान उसका चचेरा भाई  फदई खां यहां का गवर्नर हुआ। 1661 में, उसने यहां मुगल उद्यान बनाने के लिए अनेक मन्दिरों एवं बावडियों को तोड़ा। इन मन्दिरों के अवशेष, आज भी इस उद्यान  की दिवालों पर मिलते  हैं।  
यह उद्यान, यहां की सबसे प्रसिद्घ जगह है। महाराजा पटियाला यादवेन्द्र सिंह पटियाला के सबसे आखरी राजा थे। उन्हीं की बदौलत ंिपजोर गार्डन का वर्तमान स्वरूप हर किसी को अपनी ओर आकृष्ट करता है। यह उद्यान, अब उन्हीं के नाम से जाना जाता है। इस उद्यान के बगल में हरियाणा पर्यटन का विभाग बजरीगर मोटेल है।यहां पर घूमने के लिये, इस उद्यान के अतिरिक्त भीमा देवी का मंदिर एवं संग्रहालय है।  
यादविंद्रा गार्डन्स, हरियाणा टूरिज्म को 1966 में मिला। लगभग 50 एकड जमीन पर बिछे खूबसूरत संगीतमय गार्डन की  सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस संगीतमय बाग की नींव संगीत से नफरत करने वाले सम्राट औरंगजेब के माध्यम से पडी थी। सत्रहवीं शताब्दी के उतरार्द्घ में लाहौर पर औरंगजेब ने विजय हासिल की। फतह का प्रतीक स्मारक बनाकर सेनापति व पंजाब के सूबेदार, रिश्ते में बादशाह के दूर के भाई नवाब फिदाई खां जब दिल्ली वापस लौटे तो औरंगजेब ने उपहार स्वरूप शिवालिक पहाडियों में बसा जंगलनुमा गांव पंचपुरा;पिंजौरद्ध उनके नाम कर दिया। फिदाई खां वास्तुकार होने के साथ-साथ दार्शनिक भी थे सो जंगल में बहार लाने का श्रेय फिदई को जाता है। उन्होंने जंगल को मनमोहक मनोरम स्थल में बदल दिया। बे कुछ बरस यहां रूके। कहा जाता है कि बादशाह औरंगजेब की बेगमें भी यहां आकर रहतीं। तत्कालीन रियासत सिरमौर के महाराज से फिदाई के टकराव के चलते 1675 ई. में इस क्षेत्र पर सिरमौर रियासत ने फिर सेे कब्जा कर लिया था । इस दौरान बरसों तक यह जगह पर बिरान और उजडी रही और यूं वास्तुकार प्रकृति प्रेमी फिदाई का ख्वाब भी पतझड हो गया। 
क्हा जाता है कि महाराजा पटियाला ने मौका मिलते ही यह क्षेत्र सिरमौर से अपने नियंत्रण में ले लिया। अपनी शौकीनमिजाजी के लिए बिख्यात महाराजा पटियाला की बदौलत इस जगह की विरानी और सूनापन सज-संवर कर हरा भरा, मनमोहक हो गया। हरियाणा को 1966 में अलग राज्य की हैसियत मिली और पर्यटन विभाग ने इसे पर्यटकीय नजरिये से तैयार किया। फरवरी 1967 से आम जनता इस जगह की लाजवाब खूबसूरती के दीदार होने लगे। उद्यान का जीर्णोद्वार करवाने वाले महाराजा पटियाला यादविन्द्र सिंह की स्मृति में उद्यान का नाम यादवेन्द्रा गार्डन रखा गया। 
इतिहास का गबाह
ंिपजौर इतिहास का गबाह है । यह क्षेत्र ईसा पूर्व 9वीं से 12वीं शताब्दी के पनपने का साक्षी भी रहा। पुरातत्व पे्रमी पर्यटकों के लिए यहां भीमा देवी मंदिर व धारा मंडल के अवशेष जिज्ञासा जगाते हैं। जहां इस बात के साक्ष्य हैं। प्राचीन संदर्भ है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास का आखिरी साल इसी क्षेत्र में बिताया था । जनश्रुति के मुताबिक अपने दुश्मनों की, पानी में विष मिला देने की आशंका के चलते पांडवों ने प्रतिदिन एक नई बावडी खोद कर जल प्रबंध किया था। कहा जाता है कि कभी पिंजौर में 365 बावडियां थीं। विदेशी आक्रमणकारियों ने इन बावडि़यों को तबाह कर दिया लेकिन अभी भी पिंजौर में उस काल की यादे दिलाती कुछेक बावडि़यां मौजूद हैं। किसी युग की याद दिलाती ये बावडि़यां अपनी उपेक्षा की कहानी खुद ही वयां करती हैं। पिंजौर में एक ही स्थान पर निर्मित प्राचीन मंदिर,मस्जिद औेर  गुरूद्वारा इस स्थल में आपसी सदभावना और एकता की मिसाल प्रस्तुत करता है। पिंजोर अविस्थित द्रोपदी की बावड़ी भी इतिहास का एक पन्ना है।
यहां खास है यहां
बैसाखी पर यहां एक महामेला लगता है। बाग के टैरेस के साथ दोनों तरफ आम तथा कुछ अन्य फलों के बगीचे लगे हैं। संभवतया तभी यहां हर बरस जून-जुलाई के महीने में मैंगो फैस्टिवल का आयोजन होता है जिसमें उत्तर भारत में ही नहीं अपितु देश भर में उगाई जाने वाली आम की प्रर्दशनी देखते ही बनती है। आम से बने पकवान आदि इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होते हैं।दिलचस्प बात यह है कि पिंजौर गार्डन में ही- गदा आम होता है जिसके एक ही फल का वजन दो किलो तक भी हो सकता है। यहां आम की अन्य किस्मों के अलावा केले, चीकू, आडू, चीकू, अमरूद, नाशपती, लोकाट, बीज-रहित जामुन, हरा-बादाम व कटहल के काफी पेड हैं। किसी भी मौसम में जाएं, कोई न कोई फल उपलब्ध रहता है। यहां मुगल गार्डन, जापानी बाग, प्लांट नर्सरी के साथ-साथ मोटेल गोल्डन ओरिएंट रेस्तरां, शाॅपिंग आर्केड, मिनी चिडियाघर, ऊंट की सवारी, व्यू गैलरी, कांफ्रेंस रूम, बच्चों के मनोरंजन के लिए विभिन्न गतिबिधियों का भी इंतजाम  है। राजसी महलनुमा गार्डन के प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही यहां आकर मुगलकालीन विरासत का अहसास होता है। गर्मियों की शाम और सर्दियों की धूप गार्डन के भीतर दूर दूर तक मखमली घास, फब्बारों से फुटती फुहारे, प्रकृति का एकांत । सचमुच ऐसी जन्नत और कहां । यहां गुजारे कुल पल हर किसी को थकान मुक्त करते हैं और सकून ऐसा कि दिलो दिमाग तरोताजा हो जाए। लेकिन प्रबेश की मंहगी टिकटें,बच्चों के मंनोरजन आदि के विभिन्न कार्नर तथा खानपान आदि का बेहद मंहगा होना तथा खानपान की चीजों के दामों पर अंकुश न होना जरूर यहां आए पर्यटकों को थोड़ा सा निराश करता है। पिंजौर के आसपास बन्य सरंक्षण स्थलियंा भी देखी जा सकती है। लेकिन प्रचार प्रसार की कमी के कारण ये सैलानियों की नजरों से दूर रहती है। वन वनस्पति, वन्यप्राणियों के अनुसंधानकर्ताओं और  शोधार्थियों के लिए भी आसपास बहुत कुछ है। हरियाणा सरकार इस स्थल पर अत्याधुनिक होटल प्रबंधन संस्थान की स्थापना भी करने जा रही है। आसपास ही एक गि( संरक्षण केंद्र स्थापित है। हिमाचल, या चंडीगढ़ आना हो तो पिंजौर देखना न भूलें।
पिंजौर गार्डप पंहुचना बेहद आसान हैं। चंडीगढ़ से शिमला मार्ग पर महज आधा-पौने घंटे की दूरी पर पिंजौर है । शिमला से लौटते हुए या जाते हुए मुख्य मार्ग पर यह स्थल परवाणू, कालका से आगे है। मनाली से लौटना हो तो आप स्वारघाट,नालागढ़, बददी हो कर भी ंिपजौर पंहुच सकते हैं। कालका रेलवे स्टेश्न से पिंजौर गार्डन महज तीन किमी की दूरी पर है। देहरादून, हरिद्वार,नाहन आदि होकर भी यहां आसानी से पंहुचा जा सकता है। यहां ठहरने के लिए हरियाणा पर्यटन विभाग सहित कई नीजि होटल आदि भी उपलब्ध हैं।
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