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बेसुधों की सुध लेना किसका फ़र्ज़ है


दीपक शर्मा कुल्लुवी (सिटिजन जर्नलिस्ट )
जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क

हम जिसे अपनीं भाषा में पागल कहते हैं उन बेचारों का सहारा कौन है I उनको तो यह भी पता नहीं होता की उन्होंने क्या पहना है क्या खाया है य वह कौन हैं I
कहनें को तो सरकार नें पागल खानें ज़रूर बनाए हैं लेकिन वहां तक कितनें पहुँच पाते हैं I मैं कालकाजी क्षेत्र में रहता हूँ मैंने यहाँ तीन चार ऐसे पागल देखें हैं जो बेचारे बरसों से यहीं घूमते फिरते हैं उनकी सुध लेनें वाला कोई नहीं I इनमें एक लड़की भी है जो गोविन्दपुरी में चिकन मार्किट के आस पास घूमती है I उनका जीवन लोगों के रहम-ओ-करम पर ही निर्भर है I इस मार्मिक बिषय पर सरकार की कोई ठोस निति होनी चाहिए उसे गंभीरता से सोचना चाहिए I किसी न किसी की जिम्मेदारी निश्चित करनीं चाहिए की कोई भी पागल दिख जाए तो उसे उचित सहायता मिले ऐसे मानसिक रोगियों को सहारे की अत्यंत आवश्यकता रहती है I
सरकार के साथ साथ समाज को भी इस बिषय में अपना योगदान देना चाहिए I

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