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शान-ए-हिन्दोस्तान (''जयदेव विद्रोही'') एक विद्रोही प्यारा सा भाग-8

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(''जयदेव विद्रोही'')

एक विद्रोही प्यारा सा भाग-8

(स्वतंत्र लेखक,पत्रकार)

रिपोर्ट"दीपकशर्मा कुल्लुवी"जर्नलिस्ट
("अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच )
आजकल नवरात्रे चल रहे हैं लेकिन मिलावट खोरों नें व्रत के कुट्टू के आटे में मिलावट कर दी जिससे हजारों लोग बीमार हो गए I एक मौत भी हुई I शर्म नहीं आती ऐसे लोगों को जो लोगों की भावनाओं उनकी ज़िन्दगी से खेलते हैं I ऐसे लोगों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए I

महाघोर कलयुग

'कुटुए' दे आटे लोको
कित्ता बड़ा क्मॉल
कईयां दे व्रत टुट्टे
कई पोंचे हस्पताल
इन्हां मिलावट खोरां दा
बस इक ही इलाज
छित्तर पोल्ले मारी मारी
करा इन्हां यो लाल
दुंह पैसेयाँ दी खातर
एडा वड्डा जुर्म कित्ता
लोकां दी भावना नें खेले
सबनिजो धोखा दित्ता
गोली मारी देया
दए पपियां जो
फांसिये पर लटकाई देया
सरे महापपियाँ जो
दीपक "कुल्लुवी" अर्ज़ एह करदा
अपणे देशे यो बचाई लेया
मिलावटखोर कन्नें भ्रष्टाचारियां जो
सूलिए पर चढ़ाई देया
........
"विद्रोही" जी की एक खासियत है लेखन के मामले में कभी भेद भाव,भाई भतीजाबाद की नीति नहीं अपनाते अगर आप पात्र हैं आपमें प्रतिभा है तो आपकी लेखनी को आगे लानें का ज़रूर प्रयत्न करेंगे अन्यथा नहीं I आज तक उन्होंने कई लेखकों की हजारों रचनाएँ प्रकाशित करवाई हैं I जहाँ तक मेरा सवाल है मैनें अब तक हर बिधा की हजारों रचनाएँ लिख डाली हैं I हजारों छप भी चुकी हैं कई अख़बारों में,पत्र पत्रिकाओं में लगभग बाईस छोटी बड़ी किताबें में पूरी कर चुका हूँ I लेकिन फिर भी आज तक मेरी केवल चार,पाँच रचनाएँ ही उन्होनें छपबाई हैं अगर उनमें भेदभाव वाली बात होती तो वह मेरी रचनाएँ सबसे पहले छपवाते लेकिन उन्होनें ऐसा नहीं किया इसका कारण है "विद्रोही"जी बहुत बड़े विद्वान हैं और हम चाहकर भी उनके जैसे विद्वान नहीं हो सकते जितना गहन अध्ययन उन्होनें किया है बारीकी से उतना हम कई जन्मों में नहीं कर सकते I उन जैसे ख़ूबसूरत शब्दों का चयन हमारे बस की बात नहीं I व्याकरण के "विद्रोही" जी माहिर हैं I किसी भी विषय में कोई उन्हें मात नहीं दे सकता I और मुझे फक्र है की उन्होनें इस क्षेत्र में पूरी ईमानदारी दिखलाई है मैं यह बिलकुल भी नहीं चाहता की कोई यह कहे की "विद्रोही" जी दीपक "कुल्लुवी" के पिता हैं मेरी बस यही तमन्ना है की सब यही कहें की "दीपक" विद्रोही"जी का बेटा है I सच में जो त्याग तपस्या उनकी है बोह बड़े बड़े ऋषि मुनियों की नहीं होती I
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जिंदादिली की ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती
तकदीर नें जो भी लिखा हँसकर किया कबूल
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मेहनत में हमनें कोई कमी नहीं रखी जनून की हद तक लिखा है लिखते रहेंगे I गत वर्ष लेखन के लिए "अखिल भारतीय स्वतन्त्र लेखक मंच" नें मुझे " साहित्य रतन" अवार्ड से नवाज़ा हालाँकि मुझे नहीं लगता की मैं इतने बड़े अवार्ड के काबिल था य काबिल हूँ फिर भी मिला है तो खुदा के साथ मंच का शुक्रिया अदा करना मेरा फ़र्ज़ है I

दीपक शर्मा कुल्लुवी
09136211486
०७-०४-२०११

शेष अगले अंक-9 में



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