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शान-ए-हिन्दोस्तान (''जयदेव विद्रोही'') एक विद्रोही प्यारा सा भाग-5

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(''जयदेव विद्रोही'')

एक विद्रोही प्यारा सा भाग-5
(स्वतंत्र लेखक,पत्रकार)

रिपोर्ट"दीपकशर्मा कुल्लुवी" सिटिजन जर्नलिस्ट
(जर्नलिस्ट टुडे नैटवर्क)


आपसे दीदार की
ऐसी सजा मिली
कल तक जो मेरे साथ था
दिल मेरा खो गया

"विद्रोही"जी की आवाज़ भी बड़ी दिलकश है तलत महमूद,गीता दत्त के पुरानें गीत अक्सर गुनगुनाते रहते हैं I आज भी आवाज़ में ठहराव है I जब हम छोटे थे तो हमारे घर पर कवि गोष्ठियां,गीतों की महफ़िल अक्सर होती रहती थी जिनमें "विद्रोही" जी के साहित्यक मित्र,हमारे स्कूल कॉलिज के प्रोफेसर,टीचर हिस्सा लेते थे I

आज नहीं तो कल
याद आएगी ज़रूर
हमनें भी तो दर्द-ऐ-जिगर
उम्र भर ही सहा..............

"विद्रोही" जी को घूमनें फिरनें का अच्छे होटलों में रहनें अच्छे रेस्तरां में खानें पीनें का बेहद शौक रहा I मैं जब डीO एO वीO कॉलिज चंडीगड़ में पढ़ता था तो कई बार वह कुल्लू से मुझे मिलनें आते थे तो यही कहते थे की खाना खानें 17 सैक्टर या 22 सैक्टर की मार्केट में किसी अच्छे से रेस्तरां में ले चलो I "विद्रोही" जी को चाए और चावल बहुत पसंद हैं I
"विद्रोही" जी एक अच्छे कुक भी हैं I सच बताऊँ मेरी माँ से अधिक स्वाद खाना बना लेते हैं I कांगड़ी अम्बुआ,तेलिये मांह,सतरंगी मीठे चावल,अमृतसरी मटर पुलाव उनकी स्पेशलिटी है I यह खानदानी गुण उनमें मेरे दादा जी से आया जो बहुत स्वाद खाना बनाते थे दादा जी से डैडी जी में उनसे मुझमें और मुझसे मेरे बेटे में वह भी नए नए व्यंजन बनानें का शौक़ीन है I
"विद्रोही" जी घर में अधिकतर कांगड़ी भाषा का प्रयोग करते हैं यह भाषा उनकी जुवान पर बड़ी मीठी सी लगती है
उन्होंनें ज़िन्दगी में बड़े उतार चढ़ाव देखे हैं लेकिन हर परिस्थिति में सामान्य दिखते हैं I

........
ग़म नहीं है इसका
मेरा लुट गया आशियाँ
अनके पास भी तो अपना
कहने को कोई ना रहा..........

"विद्रोही" जी को अपनें पिता श्री के रूप में पाकर हमें अपनें आप पर नाज़ है मुझे फक्र है की मैं इतनी बड़ी शख्सियत का बेटा हूँ और हर जन्म में बनना चाहूँगा I

शेष अगले अंक-6 में
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