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शान-ए-हिन्दोस्तान (''जयदेव विद्रोही'') एक विद्रोही प्यारा सा भाग-4

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(''जयदेव विद्रोही'')

एक विद्रोही प्यारा सा भाग-4

(स्वतंत्र लेखक,पत्रकार)

रिपोर्ट"दीपकशर्मा कुल्लुवी" सिटिजन जर्नलिस्ट
(जर्नलिस्ट टुडे नैटवर्क)





किस किसको रखते साथ हम अपनें
किसको छोड़ देते
हम टूट गए खुद-व-खुद
दिल अपनों का कैसे तोड़ देते
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हिंदी ,उर्दू,संस्कृत ,अंग्रेज़ी,पहाड़ी कांगड़ी और फारसी भाषाओं के ज्ञाता "विद्रोही"जी अपनीं लेखनी में शब्दों का चयन एक जोहरी की तरह से करते हैं I उनकी पारखी नज़र से सुन्दर,प्रभावशाली शब्द बच नहीं पाते I यही प्रतिभा "विद्रोही"जी को बड़े बड़े विद्वानों की श्रेणी में ला खड़ा करती है "विद्रोही"जी की इन्हीं खूबियों के कारण कई छोटे बड़े लेकिन छोटे दिल वाले लेखक उनसे खार भी खाते हैं I लेकिन उनका कुछ कर नहीं पाते क्योंकि मंच पर केवल लेखक की प्रतिभा बोलती है उसका अंदाज़ बोलता है और कुछ नहीं I किसी भी मंच पर "विद्रोही"जी को मात देना असंभव है क्योंकि उनकी साधना किसी योगी से कम नहीं है I घटिया सोच वाले लोग अच्छे लेखक नहीं हो सकते I ऐसे लोगों के पास बड़ी बड़ी डिग्रियां तो ज़रूर होती है लेकिन वोह ज्ञान भंडार वोह सोच वोह शब्द चयन की शक्ति ,समझ नहीं जो "विद्रोही "जी के पास है I इसलिए वोह उनके सामनें टिक नहीं पाते और अक्सर घटिया हरकतें करते रहते हैं I


सब कहते 'दीपक कुल्लुवी' को
लिखना नहीं आता
हाल-ऐ-दिल अपना चाहकर भी
कहाँ कोई लिख पाता


जिस जिस मंच पर भी "विद्रोही"जी गए वहां अपनी छाप छोड़ कर ही आए I हर जगह सफलता के झंडे गाढ़ कर आए "विद्रोही"जी को किताबें पढनें ,इकठी करनें का बेहद शौक़ है वह जब भी दिल्ली आते हैं तो जितनी हो सके किताबें खरीद कर कुल्लू ले जाते हैं I और अपनीं लाईब्रेरी में सजा देते हैं I मेरे दादा जी और दादी जी के नाम पर उन्होनें घर पर एक लाईब्रेरी स्थापित की है जिनमें हर बिधा की अनमोल हजारों किताबें मिल जाएंगी पूरे रिकार्ड के साथ I ख़ाली समय में "विद्रोही"जी इसी लाईब्रेरी में अध्य्यन रत्त मिलेंगे यह लाईब्रेरी उनका एक अनमोल खज़ाना है अपनें बल बूते पर बनाया हुआ बिना किसी सरकारी,गैरसरकारी अनुदान के I


शेष अगले अंक -5 में

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