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शान-ए-हिन्दोस्तान ('जयदेव "विद्रोही'') एक विद्रोही प्यारा सा भाग-3

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(''जयदेव विद्रोही'')

एक विद्रोही प्यारा सा भाग-3

(स्वतंत्र लेखक,पत्रकार)

रिपोर्ट"दीपकशर्मा कुल्लुवी"जर्नलिस्ट
(जर्नलिस्ट टुडे नैटवर्क)

मैं घर (कुल्लू) से दूर बहुत दूर (दिल्ली) में हूँ I और चाहकर भी उनकी कोई मदद नहीं कर पाता I लेकिन दिल से एक पल के लिए भी खुद को उनसे अलग नहीं कर पाता I कलम उठाते ही मेरे ज़हन में उनका ख्याल एक बार आता ज़रूर है I
"विद्रोही"जी नें अपनों से परायों से बहुत घोखे खाए हैं I लेकिन वह फिर भी खामोश अपनें भाग्य का खेल मानकर निरंतर सफलता की सीढ़ीयाँ चढ़ते रहे I उम्र के इस दौर में भी उनकी चुस्ती फुर्ती काबिल-ए-तारीफ है अपनें आप में एक मिसाल है और दूसरों के लिए प्रेरणा स्त्रोत I उनके चाहने वाले बेशुमार हैं I अपनें पराए सबमें वह बहुत लोकप्रिय हैं I बड़े बड़े दिग्गज भी उनकी सशक्त लेखनी का लोहा मानते हैं I
मेरा एक शे-र था जो "विद्रोही"जी कि जिंदगी पर खरा बैठता है I
...................
न हंसेंगे खुशियों में न रोएंगे हम ग़म में
हमनें तो हर हाल में जीनें कि कसम खाई है .......

"विद्रोही"जी को फूलों से बेहद लगाव,बहुत प्यार है उन्होंने सैंकड़ों फूल घर में लगा रखें है और हर रोज़ बच्चों की तरह उनकी देखभाल,रखवाली करते हैं समय समय पर पानी देते है धूप छाँव का ख्याल रखते हैं चाहे तवियत ठीक हो य नहीं I
उनकी मित्र मण्डली में सब गुणी जन व्यक्तित्व वाली नामी ग्रामीं हस्तियाँ हैं जो किसी न किसी विधा में अग्रणी हैं I उन्हें अनगिनत अवार्डों से नवाज़ा जा चुका है लेकिन उन्हें इस बात का कोई गुमान नहीं कोई दिखावा नहीं I एक सीधा सादा सच्चा इंसान उनमें बसता है I दूसरों की अच्छाइयों की कद्र करना उन्हें आता है उनका रिश्ता सबसे दोस्ताना रहता है चाहे वह अपना हो या पराया I

"विद्रोही" जी कि एक खूबसूरत लम्बी कविता कि कुछ लाइनें

दीपक
मैं दीपक हूँ
शत्रु अन्धकार का
मित्र पथ से भटकों का
सच नहीं कि जलता हूँ मैं
मैं तो राह दिखाता हूँ I
मुक्तिदाता भी हूँ
अनगिनत कीट-करीत और पतंगों को
निर्बाध चमकाता हूँ
कालिमा अवसाद में
विपरीत झांझवात मैं
मैं पूजनीय हूँ
भिन्न भिन्न अनुष्ठानों में
पूजा में अर्चना में
जीवन के जन्म से ,मृत्यु पर्यन्त तक
पूरक हूँ-मैं प्रेरक हूँ
मानस कि
तृप्ति -तुष्टि और मुक्ति का
गंगा कि जल कि कल -कल मैं
पितृ ऋण से उऋण करता
अक्षत ,पुष्प धुप से सुवासित
पत्तों के बेड़े में प्रवाहित
झोंको में बहता हुआ
मुक्तिदाता बन जलमग्न हो जाता हूँ मैं
गैरों के परित्राण हेतु बलिदान हो जाता हूँ मैं.......

शेष अगले अंक-4 में


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