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ग़ज़ल ( बार बार ) दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'

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ग़ज़ल

बार बार


हमनें तो ख्वाव के सहारा पे घर बनाया था

बूटा काँटों का अपनें हाथों से लगाया था

हम रहे फूल की ख्वाहिश में उम्र भर यारो

मेरी हालत पे गुलसितां भी मुस्कुराया था

गम नहीं जलनें का जलाया हमको गैरों नें

मैं तो खुद आग के शोलों में दौड़ा आया था

नाम 'दीपक' था जले फिर भी हम तो किश्तों में

बार बार अपनों नें जलाया और बुझाया था

दुनियां कहती है ग़ज़ल लिखना नहीं आता मुझको

हमनें लिख डाला जो ज़हन में अपनें आया था

आखरी लम्हों से पूछेंगे कभी फुर्सत में

हमनें क्या खोया ज़िंदगी में और क्या पाया था

यह ग़ज़ल मेरी नहीं,दिल के जख्मों से चुराई है

दोगे इलज़ाम आपको में रुला आया था

बेरुखी इतनी हो जाएगी यह उम्मीद थी

नग्मा हमनें ही उदासी का गुनगुनाया था

हम थे तन्हा जब रुखसत हुए ,कफन ढूंढते रहे

वो भी हमको मिला जानें किसने वो चुराया था

बेगुनाही का सबूत जीते जी मिला उन्हें

बाद जानें के यह उनके हाथ आया था

हमको ख्वावों की हकीकत पे ऐतवार था

फिर भी ख्वावों को जानें क्यों आजमाया था

दिल के टुकड़ों को समेटे,चल दिए तन्हा

मैकदे को हमनें अपना ही घर बनाया था

अश्क अपनें भी छलक आए जब हुए रुखसत

आखरी लम्हों में वादा उनका याद आया था

आखरी ख्वाहिश भी पूछी और जला भी दिया

जैसे मौक़ा बड़ी मुश्किल से हाथ आया था


दीपक शर्मा 'कुल्लुवी'

09136211486

२४/०३/२०११.

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