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बेजान ख़ामोशी .....

24.2.110 पाठकों के सुझाव और विचार

र्तमान परिदृष्य का  अवलोकन करें तो भ्रष्टाचार पर काफी कुछ  लिखा जा रहा है , काफी कुछ  कहा जा रहा है, लेकिन स्थिति जस की तस है !नित ऐसे ऐसे घोटाले सामने आ रहे हैं कि एक अच्छी और ईमानदार सोच रखने वाले  हतप्रभ रह जाते हैं ! जहां एक रुपए  का हिसाब न मिलने पर हमारी  नींद हराम हो जाती है , वहीँ अरबों  का माल गटकने  वाले  इतना माल गटकने पर भी डकार नहीं लेते !

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, वो तरस नहीं खाते बसतियाँ जलाने में !

आज कलम भ्रष्ट है, सोच भ्रष्ट है, तन भ्रष्ट है, मन भ्रष्ट है, कर्म भ्रष्ट है और आत्मा मृत प्राय ! जो भष्ट नहीं , उसे या तो भ्रष्ट बनने पर मजबूर किया जाता है, या वो इस लिए ईमानदार बना रहता है क्योंकि उसे भ्रष्ट बनने का मौक़ा नहीं मिलता ! एक ईमानदार व्यक्ति का जीवन अग्निपरीक्षा में ही गुजर जाता है !
ये कह देना कि हमारे सियासतदां भ्रष्ट है न काफी होगा क्योंकि सियासतदां को उनकी कुर्सी पर आम आदमी बिठाता है और आम आदमी भी भ्रष्ट है ! एक भ्रष्ट समाज भ्रष्ट तन्त्र का ही मन्त्र फूंक सकता है !
ऐसा  इस लिए चल रहा है क्योंकि हम गांधी के देश में रहते है और हम गाँधी जी के  तीन बंदरों  की तरह हैं ! क्योकि हमें क्या लेना !  अगर ऐसे ही खामोश रहे तो:

धरा बेच देंगे, आसमां बेच देंगे, ये सियासतदां देश बेच देंगे !

और
 बहुत खतरनाक होता है बेजान ख़ामोशी से भर जाना, 
 घर से निकलना और लौट आना !
 बहुत खतरनाक होता हे सपनों  का मर जाना !

 जिस ने भी कहा, खूब कहा ! ये पंक्तिया बहुत याद आती है जब कोई अन्याय होता है और हम चुपचाप देखते रहते हैं ! कई बार मानव जात पर गुस्सा आता है, तरस आता है, घिन आती है, शर्मिंदगी होती है और  ये पंक्तिया मुझे  झकझोरती हैं --- सचमुच बहुत खातरनक् होता है बेजान ख़ामोशी से भर जाना !
फिर दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ होंसला देती हैं, प्रेरणा देती हैं कि  तू चला चल अपनी राह ! अगर अपने पर  भरोसा है,  इरादा नेक है,  और होंसले बुलंद हैं तो एक दिन सिद्ध कर सकता है की तू सचमुच इंसान कहलाने लायक है ! नहीं तो हिजड़े भी नाच नाच कर अच्छी खासी ज़िन्दगी जी लेते हैं !

पीर बड़ी पर्वत सी पिघलनी चाहिए,
हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए,
सिर्फ हंगामा खड़ा करना  मेरा मकसद नहीं,
मै  चाहता हूँ कि ये सूरत  बदलनी चाहिए !
तेरे सीने में न सही तेरे सीने में सही , 
हो कहीं भी मगर आग जलनी चाहिए !

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