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जमीन से जुड़ना

                                                    
एक
स्वच्छंद
और
मुक्त
पक्षी के लिए
जमीन से
जुड़े रहने का सुख भी
उतना ही
आनंदमयी होता है
जितना की
आकाश में
विचरने का सुख
जमीन आधार है
जहाँ से
नापी जाती है
आकाश की दूरी
जमीन पहचान है
जमीन से उरते हुए
उस पक्षी की
जिसे
हर गज की ऊंचाई पर
उरते हुए भी
आभास होता रहता है
जमीन से कटने का
इसलिए
जमीन से काटकर भी
वेह उससे जुरा रहता है
बहुत ऊँचाई पर
मुक्त विचरते हुए भी
जिस पक्षी की गर्दन
ज़मीन की ओर
झुकी रहती है
ज़मीन की.....
ऊँची नीची घाटियों
लहलहाती फसलों
पगडंडियों
खाईयों,गड्डों
और
नदी नालों को देखकर
जिसकी आँखें
सुख पाती है
और....
ज़मीन का सुख

आकाश का सुख
जिसमे एक होकर
मिल जातें हैं
ऐसा पक्षी
दूर आकाश में
भटकता नहीं
ओझल नहीं होता
न ही खोता है
अपनी
ज़मीन का होने की पहचान
और
माँ ज़मीन
उसकी राह देखती है
प्रतीक्षा में
खरी रहती है
तब तक
जब तक
उसका बेटा
वेह पक्षी
उसकी ममतामयी
गोद में बैठकर
चुग नहीं लेता
उन दानो को
जिसमे
संचित है उसके प्राण
और
माँ की यह गोद
आधार है
उसकी
सम्पूर्ण
परम्सुख्दायी
इस जीवन यात्रा की
                                  (मेरे कविता संग्रह 'ज़मीन से जुड़े आदमी का दर्द' से उधृत सारगर्भित कविता)
                                  -अश्विनी ramesh






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