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अपनों का अपनापन झूठा सा लगता है
क्या कहें क्यों सब बेमानी सा लगता है

था सच जो दिखावा सा लगता है
हर रिश्ता अब तो टूटता सा लगता है

धागा था विश्वास का उलझा सा लगता है
पड़ गई गांठ उसमे गुमां सा लगता है

चमकता था हमेशा वो चाँद झूठा लगता है
चाँदनी से भी अब खौफ सा लगता है

था बन्धन रिश्तों का धोखा सा लगता है
हर कड़ी का सिरा खुला सा लगता है

रिश्तों का हर पहलु बदला सा लगता है
खुद जिंदगी से अपनी डर सा लगता है

छोटा दायरा सोच का बढ़ा सा लगता है
तड़पने के सिवा नहीं काम कुछ लगता है

जिंदगी रह गई है इन सोचों के लिये शायद
कुछ कम कुछ ज्यादा सबब रहता है................!!


                                                                                                           

                                                                                      सुमन ‘मीत’

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