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कहो, कैसी रही कबीर?

22.10.100 पाठकों के सुझाव और विचार

भाई साहब!अब आप से छुपाना क्‍या! मंदी के इस दौर में भी हफ्‌ते में एक दिन जैसे तैसे उपवासरख ही लेते हैं। इसलिए नहीं कि भगवान से अपना कोई नाता है। इसलिए भी नहीं कि हमपरलोक सुधारने के चक्‍कर में हैं। ये लोक तो चमची मार कर मजे से कट गया। अगले लोकमें भी कोई न कोई चमचा प्रेमी मिल ही जाएगा। अरे साहब ! अब तो जब घरवालों से हीकोई रिश्‍ता नाता नहीं रहा तो भगवान से रिश्‍ते की बात करना समय की बरबादी करनाहै। अब तो सारे रिश्‍ते नाते मनी बेस्‍ड हो गए हैं। आत्‍म केंद्रित हो गए हैं।घरवाले बाप को बाप तब तक कहते हैं जब तक उनकी मांगें पूरी करते रहो। जिस दिन उनकीमांगें पूरी करने में आपने जरा सी भी असमर्थता जाहिर कर दी के उसी वक्‍त आप कौन तोवे कौन? वे मेरी तरह आपको पहचान भी जाएं तो आपका जूता मेरा सिर। सिर भी वह जिस के बाल घिस घिस कर साफ होगए हैं।
हम तोसाहब उपवास इसलिए रख लेते हैं कि इस बहाने हफ्‌ते में कम से कम एक दिन तो भरपेट फलफ्रूट खाने को नसीब हो जाते हैं। उपवास तो मात्र एक बहाना है। असल में उपवास केनाम पर चपाती छोड़ डटकर मेवे सेवे खाना है। रोज रोज चपाती खा खाकर आपका मन नहींउकता जाता?मेरा तोउकता जाता है और उसका सबसे सरल रास्‍ता है कि हफ्‌ते में एक दिन उपवास।
कल भीमेरे उपवास था। थाली में आठ दस केले काट कर भगवान के नाम पर रखे हुए थे। साथ मेंचार सेब। पोता दूर से सेबों को देख घूर रहा था। पर घरवाली ने उसे भगा दिया,‘ बहू! कहां हो ।पोते को परे ले जाओ। देखती नहीं तुम्‍हारे ससुर जी के उपवास है। बेचारों ने सुबहसे कुछ खाया नहीं।' पोता बहू की गोद में जा केलों की थाली को टुकुर टुकुर देखतारहा। पर मेरी हिम्‍मत उसे केले का एक टुकड़ा देने की नहीं पड़ी तो नहीं पड़ी।
अभी थालीमें से एक केले का टुकड़ा उठाया ही था कि दरवाजे पर दस्‍तक हुई। घरवाली ने दरवाजाखोला तो सामने एक ढली उम्र के। पर अकड़ ऐसी जैसे किसी कमर्शियल फिल्‍म के हीरोहों।
कौन???' घरवाली ने गुस्‍सातेपूछा।
मैं कबीर!' कबीर ने मुस्‍करातेहुए कहा तो मुझे अचानक किताबों वाले कबीर की याद आ गई।
कौन कबीर?? हम तो किसी कबीरकबूर को नहीं जानते।' घरवाली दरवाजा फेरने को हुई तो मैंने उससे कहा,‘ जरा रूको। आनेदो इन्‍हें भीतर। तुम भीतर जाओ।' कबीर वैसे ही मुस्‍कराते हुए मेरे पास आ गए।
पहचाना??'
अगर मैं गलत नहोऊं तो आप किताबों वाले कबीर ही हो न??'
अरे वाह! मान गएउस्‍ताद! ऐसी धक्‍कमपेल जिंदगी में भी अपनी मेमोरी को बनाए हुए हो।'
तो यहां कैसेआना हुआ??'
तुम्‍हारे मुहल्‍लेसे एक श्रद्धालु लाउडस्‍पीकर से बांग दे रहा था। ऊपर कान फट गए तो चला आया उसेसमझाने।'
आपकी पंगे लेनेकी आदत ऊपर भी नहीं गई??'
क्‍या करूं भाई।आदत कैसे बदलूं?'
तो क्‍या कहाउसने?'
कहता क्‍या!बोला- जब बगल वालों को ही आब्‍जेक्‍शन नहीं तो तुम कौन होते हो परेशान होने वाले?'
तो भगवान कोबिना लाउउस्‍पीकर के ही बुला लेते। पहले ही क्‍या यहां पर ध्‍वनि प्रदूषण कम है जोअब तुम भी․․․․'
तभी तो लाउडस्‍पीकरसे बुला रहा हूं। इतने शोरशराबे में उस तक मेरी बिन लाउडस्‍पीकर के आवाज क्‍यापहुंच जाएगी?बिनालाउडस्‍पीकर के तो बगल वाला बंदा तक नहीं सुन पाता और वह तो स्‍वर्ग में बैठा है।'
तो ??'
तो क्‍या बंदेकी बात में दम था इसलिए पानी पानी हो चला आया।'
पर आप तो आजतकसभी को पानी पानी करते आए थे।' मैंने कहा तो वे कुछ देर कुछ सोचते हुए चुप रहे। फिर सन्‍नाटाचीरते बाले,‘ये क्‍या??'
उपवास है।'
तो???'
तो क्‍या ! अन्‍नका त्‍याग किया है आज का दिन।' मैंने अपने को महान धर्मात्‍मा के पद पर प्रतिष्‍ठित करतेहुए कहा तो वे पेट पकड़ कर हंसने लगे।
इसमें हंसने कीक्‍या बात है?चार केलेमुंह में ठूंसने के बाद मैंने दूध का गिलास मुंह में उड़ेलते पूछा।
एक बात बताओ?? मुझे कितना पढ़ा??'
आपको लेकर ही तोपीएचडी. की है। प्रोफेसर रिटायर हुआ हूं।'
झूठ! सफेद झूठ!!मुझको लेकर पीएचडी करते तो कम से कम मंदी के इस दौर में दस रूपए की चारचपातियां छोड़ सौ रूपए के फल न तोड़ते। मुझको लेकर ही पीएचडी. की थी याकिसी और पर मुझे फिट कर दिया था?'
मतलब!!' मैं चौंका।
देखो एक्‍सशोधार्थी। आज शोध के नाम पर फिटिंग ही तो चल रही है। कबीर को तुलसी पर फिट कर दोतुलसी को अज्ञेय पर। अज्ञेय को निराला पर फिट कर दो निराला को भारती पर और हो गईपीएचडी।'
पर कबीर साहब!किताबों से पेट तो नहीं भरता न! पेट के लिए तो……' मैं आगे कुछ कहने के बदले चुप हो गया।
तो कौन कहता हैउपवास रखने को?यार पढ़ेलिखे हो। सबकुछ करो ,पर उपवास के साथ उपहास तो मत करो। जो करो, मन से करो।'
पर आज मन यहांहै किसके पास??'फिर कुछदेर तक मेरी पीठ थपथपाने के बाद बोले,‘ कबीर हूं न, सो चुप रहा नहींजाता तो नहीं रहा जाता। तुम आम आदमी तो हो नहीं, बुद्धिजीवी हो।पर इस समाज का कुछ नहीं हो सकता। एक कबीर तो क्‍या, लाख कबीर भी आजाएं तो भी नहीं।' कह वे मुंह सा बनाते उठने को हुए तो मैंने आधा सिर झुकाएपूछा,‘ कबीर, मछली तो मछली है, क्‍या छोटी,क्‍या बड़ी! देशआजाद है। सभी को खाने का पूरा हक है। मन मार कर सदियों तक बड़े जिए। अब तो खुलकरजीने दो न․․․․․ कहां जा रहे हो?'
कहां जाऊंगा? कबीर को तो इससंसार में जगह ही जगह है।कह वे उठे तो मैंने चैन की सांस लेते घरवाली से पूछा,‘ चाय को पानी तोनहीं रखा था ?'
नहीं, सोच रही थी वेजाने का नाम लेते तो चाय को पानी रखने का नाटक करती।'
भगवान ऐसीघरवाली सबको दे। अंदर से थोड़े से काजू और लाना ।' मैंने भगवान कानाम लिया और दो केले पलक झपकते डकार गया। अब पेट कुछ भरा भरा लग रहा है। सच कहताहूं उपवास वाले दिन तो पेट मुआ भरने का नाम ही नहीं लेता। पेट भरने का कोई शानदारतरीका हो तो प्‍लीज लिख भेजिएगा। तहेदिल से पूरे देशवासी आपके शुक्रगुजार रहेंगे।
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