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अंतर्द्वन्द

2.10.102पाठकों के सुझाव और विचार

अन्दर जो पलता है , आँखों से बहता है ।


                                           बेजुबान है मगर , फिर भी कुछ कहता है ।


नहीं रखता कोई बन्धन , पर जकड़े रखता है ।


                                          मन की बातों को , खामोशी से तोलता रहता है ।


ये है ‘अंतर्द्वन्द’ , जो चुपचाप चलता रहता है !!
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