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जहाँ बारात में दूल्हा नहीं जाता

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अजब गजब हैं हिमाचल के लाहुल घाटी की विवाह परम्पराएँ

हिमाचल प्रदेश पुरातन संस्कृतियों और परम्पराओं का प्रदेश है. प्रदेश के बिभिन्न क्षेत्रों की विवाह परम्पराएँ भी अलग अलग हैं. लेकिन प्रदेश के कवायली कहलाये जाने bale लाहुल स्पीती की रस्मे और भी अनूठी हैं.भले ही आधुनिकता के इस दौर में पुरानी रस्मे धीरे धीरे आधुनिकता का लबादा ओढ़ रहीं हैं लेकिन आज भी यहाँ कई रिवाज़ जीवंत हैं.

हिमाचल के दुर्गम कबायली जिला लाहुल स्पीती में शादी की रस्में अलग अलग हैं, यहाँ कई गाँव ऐसे भी हैं जहाँ बरात में दूल्हा नहीं जाता है बल्कि दुल्हे की बहन दुल्हन के घर कुछ निशानियाँ ले कर जाती है. शीत नारुस्थल के नाम से जनि जाने बाली इस घाटी के जिला मुख्यालय केलोंग सहित गाहर घाटी के बिलिंग, युरिनाथ, रौरिक, छिक्का, जिस्पा अदि कई ऐसे गाँव हैं जहाँ रात भी निकलती है,बाद्ययंत्र  भी बजते हैं,नाच गान भी होता है लेकिन यहाँ दुल्हन लाने के लिए दूल्हा बारात संग नहीं जाता है.क्षेत्र के लोगों के अनुसार इस घाटी की छोटी शादी में दुल्हे की बहन ही दुल्हे की कुछ निशानियाँ ले कर दुल्हन लाने की रसम अदा करती है. घटी की मियाद. तिणन,pattan, गाहर अदि घाटियों की शादी की रस्में मेल भी खाती हैं. इस घाटी में विवाह की सबसे पुराणी रसम गंधार्भ विवाह है. इस घाटी में न तो कुइंडली मिलई जाती है और न ही गृह चाल देखने का रिवाज़ है.भले ही देश के कई हिस्सों में भादों महीने को काल महीने की संज्ञा दी जाती है और इस महीने विवाह शादियों जैसे शुभ कार्य बरजित होते हैं लेकिन इस घाटी में जयादातर शादियाँ इसी महीने ही होती हैं. घाटी में अपनी पसंदीदा लड़की उठा कर ले जाने की परमप्र पुरानी है.लड़की  उठा ले जाने के वाद लडको के परिजन यहाँ मक्खन लगी शराब की बोतल ले कर लड़की बालों के घर जाते हैं . यदि लड़की के परिजन इस बोतल को खोलते हैं तो रिश्ता स्वीकार्य होता है यदि नहीं तो इसे नमंजूर माना जाता है. इस  शादी की मान्यता के लिए  कई बार प्रयास किये जाते हैं . कई बार इस शादी को अगली पीढ़ी ही मान्यता देती है.घाटी में इस रिश्ते की मजूरी को कई साल भी लग जाते हैं और ऐसी शादियों के निर्वहन में बच्चों ही नहीं बल्कि पोतो के शरीक होने के भी कई प्रमाण मिलते हैं. भले ही घाटी में शिक्षा के बिस्तार के साथ साथ लोग दुसरे क्षत्रों की रस्मों को अपना रहे हों लेकिन यह भी के सच्चाई है की घाटी में यदि ऐसी शादियों के टूटने के प्रमाण मिले तो बे अपवाद ही हो सकते हैं. दहेज़ जैसी  बुराई से कोसो दूर इस वैवाहिक  परम्परा को आज की पीढ़ी त्यागती जा रही है. ऐसे में घाटी के लोगों के लिए भी शादियाँ अब महंगी होती जा रही हैं.


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