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हिमाचल के कुल्लू में फाल्गुन में मनाया जाता है फागली उत्सव

देव भूमि हिमाचल त्योहारों और उत्सवों का प्रदेश है. देव परम्पराओं के अनुसार यही मेले त्यौहार यहाँ की समृद्ध सांकृतिक धरोहर के अभिन्न अंग हैं. कुल्लू जिला में कहीं आग का खेल खेला जाता है तो कहीं मुखौटे पहन कर अश्लील गलियां दी जाती है. जिला में फाल्गुन महीनें में मनाई जाने बलि फागली भी एक ऐसा ही उत्सव है.

कुल्लू घाटी में फाल्गुन महीने में मनाई जाने बाली फागली को मेलो का आगाज माना जाता है. इसी उत्सव के साथ ही समूचे प्रदेश में मेलों की बहार आती है .घाटी में अक्टूबर से नवम्बर दिसम्बर तक मशाल लिए आग का खेल खेला जाता है. इस उत्सव में जम कर अश्लील गलियां दी जाती हैं . माना जाता है की इससे पहाड़ों से बुरी आत्माओं को खदेड़ने का पर्यास किया जाता है ताकि सुख शांति बनी रहे. जिला के बंजार, मनाली अदि बिभिन्न क्षेत्रों में फागली नाम के इस उत्सव को मनाये जाने का अलग अलग विधान है. बंजार क्षेत्र के कई गाँव में बीठ और फागली नाम के इस उत्सव का आगाज़ फागुन मॉस की सक्रांति से हो जाता है. इस अवसर पर गाँव के लोग लकरी के मुखौटे और घास अदि के बस्तर पहन कर अश्लील गलियां देते हुए परम्परानुसार गाँव की परिक्रमा करते हैं.इस नजारे को महिला पुरुष सभी देखते हैं. कई सथानों पर विशाल कंटीली झाड़ियों से बने अबरोधकों हो हटाने के लिए भी जदोजहद होती है. फागली या बीठ के दिन अश्लील गलियां ही नहीं अश्लील नृत्य भी किया जाता है. इस उत्सव के दौरान पहाड़ी वाद्ययंत्रों से अलग की धुनें बजाई जाती है, कई जगह घास अदि से बना बीठ फेंकने की भी परम्परा है. इसे पकड़ना शुभ माना जाता है. फागली के दिन ही आगामी साल के लिए फसलों की पैदाबार, मौसम. आगजनी,सुखशांति अदि की भ भबिष्य बाणी भी की जाती है. जनश्रुतियों के अनुसार कभी पहाड़ों में असुरी शक्तियों का सम्राज्य तेजी से फैलता जा रहा था. जिससे घाटी में देवी देवता ऋषि मुनि और मानव बेहाल हो उठे थे. असुरी ताकतों से निजात दिलाने के लिए तब देवताओं ने यह खेल रचा था.कहते हैं क़ि  इस के वाद पहाड़ असुरों के चंगुल से आजाद हो गए और देवताओं ने भी राहत की सांस ली. उस के वाद फागली का यह त्यौहार पहाड़ों में आज तक प्रचलित है. इस अवसर पर अपने सगे सम्बन्धियों को बुलाये जाने क़ि भी रसम है और इस मौके पर घाटी भांति भांति के पहाड़ के पकवानों से महक उठती है.अश्लील गलियों का यह त्यौहार घाटी में हर साल हर्षो उल्लास से मनाया जाता है. असुरो से आज़ादी के लिए कुल्लू के पास बाखली सहित कुछ गाँव में  मनाया जाने बाला सद्याला भी अश्लील गालीयों का त्यौहार है. इस गाँव में लोग रात भर जले विशाल अग्निकुंड  में बने अंगारों को नृत्य करते हुए नगें पों से ही बुझाते हैं लेकिन हैरानी क़ि बात है क़ि किसी को भी न तो चोट लगती है और न ही इन दहकते अंगारों से किसी का पों जलता है.पहाड़ों में जलती मशालों संग मनाया जाने बाला दिआउलि  उत्सव भी अश्लील गालीयों का त्यौहार हैं . महिला हों या पुरुष उन्हें इस अश्लीलता के उत्सव क़ि परम्परा से कोई भी परहेज नहीं हैं.सब कहते हैं क़ि इस से बुरी आत्माएं गाँव के करीब भी नहीं फडकती हैं. पहाड़ में मान्य जाने बाला यह उत्सव देखने योग्य होता है.


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