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इक्कीसवीं सदी का पहला लाल सितारा-नेपाल : 3

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छापामार जनयुद्ध से लोकतांत्रिक चुनावों तक सोची-समझी रणनीति
अब तक इस बारे में बहुत सी बातें सामने आ चुकी हैं कि अगर माओवादियों की ताकत नेपाल में इतनी थी कि वे इन चुनावों और गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बने बगैर भी नेपाल की सत्ता पर कब्जा कर सकते थे तो उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। संक्षेप में सबसे प्रमुख तर्क के तौर पर जो बातें सामने आई हंै वे ये हैं कि अगर वे सैन्य ताकत के जरिये तख्तापलट करते तो उन्हें भारत और अमेरिका की ओर से न केवल आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता बल्कि बहुत मुमकिन था कि अमेरिका अपने कुख्यात ‘‘लोकतंत्र की रक्षा के अभियान’’ की आड़ में माओवादियों पर हमला बोल देता, और इस बहाने दक्षिण एशिया में अपनी एक और फौजी चैकी कायम कर लेता जहाँ से चीन पर भी दबाव बढाया जा सकता था। भारत इसमें उसकी मदद क्यों करता, इन कारणों पर पहले ही रोशनी डाली जा चुकी है।
10 बरस से जनयुद्ध लड़ रहे माओवादियों का यह आकलन भी गलत नहीं कहा जा सकता कि इस तरह की छापामार लड़ाई के लिए 10 बरस एक लंबी अवधि होती है। नेपाल में माओवादियों ने 10 बरस में बेशक शोषित जनता के बीच प्रतिबद्ध कैडर और सैद्धान्तिक व व्यावहारिक तौर पर प्रशिक्षित फौज तैयार की, लेकिन फिर भी लड़ाई को बहुत लम्बा खींचने में एक स्थिति के बाद लोग थक जाते हैं। जिस सपने की खातिर वे जान पर खेलने के लिए क्रान्ति का हिस्सा बनने को तैयार होते हैं, वह सपना उन्हें कभी न हासिल होने जितनी दूरी पर टँगा दिखने लगता है। लोग, जो क्रान्ति को अंजाम देते हैं, वे सिर्फ माक्र्सवाद पढ़कर या प्रतिबद्धता के आशय समझकर ही साथ नहीं आते, बल्कि वे शोषण की घुटन से आजाद होना चाहते हैं। वे खुद को, या कम से कम आने वाली पीढ़ी को बदले हालातों वाले धरती-आसमान देना चाहते हैं। इसलिए जब 2005 में ज्ञानेन्द्र ने माओवादियों के पूर्ण सफाई की तैयारी और इरादा किया तो लोगों ने भी समझा लिया कि इसे और लंबा खींचने में आंदोलन को नुकसान हो सकता है। झोपड़ियों, कंदराओं, जंगलों, गाँवों, खेतों से वे आए और देखते ही देखते पूरे काठमाण्डू में सिर्फ वे ही थे। सामने हजारों की तत्कालीन शाही नेपाली सेना थी और ये गिनती के मोटे आँकड़ों में लाखों में थे। पूरा काठमाण्डू लाल था। ज्ञानेन्द्र की फौज और पुलिस पहले ही 10 बरसों के छापामार युद्ध में अनेक दफा पराजित होकर नैतिक तौर पर पस्त थी। पूरा देश अखबारों में छप चुकी खुफिया रिपोर्टोें से यह जानता था कि नेपाल के 75 जिलों में से अधिकांश में माओवादियों का जबर्दस्त असर है। सन् 2006 की अप्रैल माओवादी बंद के असर में ऐसी गुजरी कि न फौज कुछ कर सकी न अमेरिका, इजराइल, चीन और भारत से आए हथियार। सरकारी हिंसा में 11 लोग मारे भी गए लेकिन प्रदर्शन तब तक जारी रहे जब तक राजशाही की हार न हो गई। राजा की फौज के सामने जो लोग खड़े हुए उनमें आम ग्रामीण जनता के साथ न केवल खुद उसी के गृह मंत्रालय के कर्मचारी थे, बल्कि डाॅक्टर, वकील, पत्रकार और तमाम बुद्धिजीवियांे के साथ सैनिकों के परिवार के लोग, उनके पत्नी-बच्चे भी थे। आखिरकार ज्ञानेन्द्र को नेपाल के आखिरी राजा का खिताब हासिल कर राजशाही के खात्मे के लिए तैयार होना पड़ा।
ज्ञानेन्द्र के जुल्म से परेशान तो सभी थे। सन् 2001 में नारायणहिती शाही महल में अपने बड़े भाई राजा बीरेन्द्र और उनके पूरे खानदान की हत्या की कामयाब साजिश करके नेपाल की पूरी बागडोर अपने हाथ में ले लेने वाले ज्ञानेन्द्र ने सन् 2005 में सभी राजनैतिक दलों को दिए गए अधिकार छीनकर सत्ता संचालन के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए थे। यही नहीं, गिरिजा प्रसाद कोइराला, माधव नेपाल, शेरबहादुर देउबा सहित बहुत से राजनेताओं को जेल भिजवा दिया। ज्ञानेन्द्र के जुल्म से परेशान तो सभी थे, लेकिन राजशाही को खत्म करके लोकतंत्र और फिर धीरे-धीरे समाजवाद की ओर बढ़ने का लक्ष्य सिर्फ माओवादियों का ही था। बाकी दल सिर्फ ज्ञानेन्द्र से मुक्ति या अधिक से अधिक राजशाही से मुक्ति चाहते थे और उसके लिए भी कुछ कर सकने की ताकत और नैतिक साहस उनके पास नहीं था। माओवादी नेपाली समाज की उस तस्वीर को बदलने का लक्ष्य लेकर लड़ रहे थे जिसमें नेपाल के 10 प्रतिशत लोग देश की 65 प्रतिशत जमीन के मालिक थे और वे 10 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले 70 फीसदी लोगों के पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण से देश की आधी आमदनी को कब्जाये हुए थे। जनयुद्ध के 10 वर्षों के दौरान भी माओवादियों ने जमींदार-पूँजीपतियों से जमीनें छीनकर उनका मेहनतकश जनता के बीच न्यायपूर्ण बँटवारा किया और सत्ता में आने के बाद भी समानता और न्याय पर आधारित समाज बनाने के कार्यक्रम बनाए। नेपाल में माओवादी नेतृत्व की सरकार के दौरान अर्थमंत्री रहे और एक माक्र्सवादी विद्वान की पहचान रखने वाले बाबूराम भट्टाराई ने विस्तार से सहकारिता आंदोलन को बढ़ाने, भूमि सुधार करने और देश को आत्मनिर्भर बनाने की आगामी योजनाएँ बना रखी थीं।
जाहिर है कि लोकतांत्रिक तरीके से समाजवाद कायम करने की नेपाल के माओवादियों की सुचिंतित व सर्वसमावेशी परियोजना में विरोधाभास उठने ही थे। जिन सात राजनैतिक दलों के साथ मिलकर उन्होंने राजशाही को खत्म कर लोकतंत्र की नींव रखी थी, उनका सरोकार उन सब न्याय और बराबरी की बातों से नहीं के बराबर ही था जो माओवादियों के लिए आंदोलन की कामयाबी की कसौटी थीं और हैं। इसीलिए, बहुत जल्द ही माओवादियों व शेष राजनैतिक दलों के आपसी अंतद्र्वंद्व उभर आए।
चाहे नेपाल के प्रधानमंत्री बने प्रचण्ड का इस परम्परा का उल्लंघन करना हो कि हर वह व्यक्ति जो नेपाल का प्रधानमंत्री बनता है, सबसे पहले भारत यात्रा करता है (प्रचण्ड भारत के बजाय चीन चले गए), या संविधान सभा में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व का सवाल हो, या पहाड़ी और तराई के लोगों के बीच या विभिन्न जातियों में भेदभाव का सवाल हो, या, यह सबसे प्रमुख है कि जिस जनमुक्ति सेना ने नेपाल को राजशाही से आजादी दिलाई, उसकी स्थिति क्या हो; इन सारे मुद्दों को विवाद के तौर पर उठाने का कोई मौका न नेपाल के विपक्षी दलों ने गँवाया औार न ही भारत के पूँजीवादी मीडिया ने। एक नये बनते देश और समाज के भीतर ये सारे अंतद्र्वंद्वउठने लाजिमी हैं। इन्हीं अंतद्र्वंद्वों को उभारकर और शेष अन्य राजनैतिक दलों के अवसरवादी चरित्र का जनता के सामने भण्डाफोड़ करने के लिए माओवादी भी इस नये किस्म के प्रयोग के लिए जंगलों से निकलकर खुले में आए थे। लेकिन इन्हीं अंतद्र्वंद्वों का इस्तेमाल वे सब भी करना चाहते हैं और कर रहे हैं जो माओवादियों की भूमिका राजशाही के बाद अब और नहीं चाहते। वे हर कोशिश करेंगे कि गैर जरूरी सवालों और मुद्दों में उलझकर यह क्रान्ति भटक जाए। माओवादियों के लिए यह एक कठिन परीक्षा है, क्योंकि यह उनका अपना नया तरीका है इसलिए इतिहास भी उनकी खास मदद नहीं कर सकता।
इनमें से सबसे प्रमुख एक, कटवाल प्रकरण को ही लें तो वह मानसिकता जाहिर हो जाती है जिसके चलते नेपाल की राजनीति के वे लोग माओवादियों को ‘अव्यावहारिक’, ‘नातजुर्बेकार’, ‘अड़ियल’ आदि सिद्ध करना चाहते हैं और जिनके इस अभियान को देश-विदेश का पूँजीवादी और अल्पज्ञ मीडिया सहज समर्थन देता है।

-विनीत तिवारी
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2010 अंक में प्रकाशित
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