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कविता- पेड़ से गिरे पत्ते

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पेड़ पर से
जहाँ-जहाँ से गिरे थे पत्ते
पतझड़  में
वहाँ-वहाँ फूटती कोपलों से
झाँक रहें हैं नन्हें -नन्हें
कोमल चिकने पात ...
पत्ते जो झडकर  गिरे थे
पसरे थे धरती पर दूर-दूर तक
कुछ जले, कुछ मिट्टी में दफ़न हुए
न वे हिंदू थे, न मुसलमान
फिर भी इसी मिट्टी में समाये
अपना-अपना भाग्य उनका....
पर कभी कुछ खत्म हुआ है क्या?
मरा है कभी क्या कोई
देह मरती है आत्मा नहीं
आत्मा कोंपल की तरह
 लेती रहती है पुनर्जन्म..........
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