Home » YOU ARE HERE » कविता- पेड़ से गिरे पत्ते

कविता- पेड़ से गिरे पत्ते

पेड़ पर से
जहाँ-जहाँ से गिरे थे पत्ते
पतझड़  में
वहाँ-वहाँ फूटती कोपलों से
झाँक रहें हैं नन्हें -नन्हें
कोमल चिकने पात ...
पत्ते जो झडकर  गिरे थे
पसरे थे धरती पर दूर-दूर तक
कुछ जले, कुछ मिट्टी में दफ़न हुए
न वे हिंदू थे, न मुसलमान
फिर भी इसी मिट्टी में समाये
अपना-अपना भाग्य उनका....
पर कभी कुछ खत्म हुआ है क्या?
मरा है कभी क्या कोई
देह मरती है आत्मा नहीं
आत्मा कोंपल की तरह
 लेती रहती है पुनर्जन्म..........

4 comments:

हिमधारा हिमाचल प्रदेश के शौकिया और अव्‍यवसायिक ब्‍लोगर्स की अभिव्‍याक्ति का मंच है।
हिमधारा के पाठक और टिप्पणीकार के रुप में आपका स्वागत है! आपके सुझावों से हमें प्रोत्साहन मिलता है कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का प्रयॊग न करें।
हिमधारा में प्रकाशित होने वाली खबरों से हिमधारा का सहमत होना अनिवार्य नहीं है, न ही किसी खबर की जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य हैं।

Materials posted in Himdhara are not moderated, HIMDHARA is not responsible for the views, opinions and content posted by the conrtibutors and readers.