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लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-4

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वहीं मँहगाई के सन्दर्भ में हवा पानी पर प्रकाशित एक कविता पर निगाहें जाकर टिक जाती हैं जिसमें कहा गया है कि हमनें इस जग में बहुतों से जीतने का दावा किया पर बहुत कोशिशों के बाद भी हम मँहगाई से जीत नहीं पाए। वहीं कानपुर के सर्वेश दुबे अपने ब्लॉग ‘मन की बातें’ पर फरमाते हैं-कुछ समय बाद किलो में, वस्तुएँ खरीदना स्वप्न हो जाएगा, 10 ग्राम घी खरीदने के लिए भी बैंक सस्ते दर पर कर्ज उपलब्ध कराएगा। नमस्कार में प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव की कविता छपी है जिसमें कहा गया है कि-मुश्किल में हर एक साँस है, हर चेहरा चिंतित उदास है। वे ही क्या निर्धन निर्बल जो, वे भी धन जिनका कि दास है। फैले दावानल से जैसे, झुलस रही सारी अमराई। घटती जातीं सुख सुविधाएँ, बढ़ती जाती है मँहगाई।
आमजन से मेरा अभिप्राय उन मजदूरों से है जो रोज कुआँ खोदता है और रोज पानी पीता है। मजदूरों की चिंता और कोई करे या न करे मगर हमारे बीच एक ब्लॉग है जो मजदूरों के हक और हकूक के लिए पूरी दृढ़ता के साथ बिगुल बजा रहा है। जी हाँ वह ब्लॉग है बिगुल। यह ब्लॉग अपने आप को नई समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक मानता है और एक अखबार के मानिंद मजदूर आंदोलनों की खबरे छापता है । यह ब्लॉग तमाम मजदूर आंदोलनों की खबरों से भरा-पड़ा है। चाहे वह गोरखपुर में चल रहे मजदूर आन्दोलन की खबर हो अथवा गुड़गाँव या फिर लुधियाना का मामला, पूरी दृढ़ता के साथ परोसा गया है।
सामाजिक सरोकारों के प्रति दृढ़ता के साथ अग्रणी दिखा लोकसंघर्ष ब्लाग। इस ब्लाग में मुहम्मद शुऐब का ज्वलंत मुद्दों पर जनआकांक्षाओं के प्रति समर्पित आलेख जवाबदेही ध्यान आकृष्ट करता रहा-पूरे वर्ष भर और लोकसंघर्ष में ‘सुमन‘ के लेख कुछ ज्यादा तीखे दिखे। कुल मिलाकर यह ब्लाग अपने जन सरोकारों को प्रस्तुत करने की दिशा में सर्वाधिक चर्चित रहा।
वहीं संवाद डाट काम के माध्यम से भी जाकिर अली रजनीश ने सम्मान की एक नई परम्परा की शुरूआत की। उनका सामुदायिक ब्लाॅग तस्लीम लगातार अंधविश्वास के घटाटोप अंधकार को नष्ट करता दिखाई दिया। साथ हीं साइंस ब्लॉगर एसोसिएशन और लखनऊ ब्लॉगर एसोसिएशन ने ब्लॉग जगत में चर्चित साझा मंच बनने की दिशा में अपने महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए।
आइए अब चलते हैं एक ऐसे ब्लॉग पर जहाँ होती है प्राचीन सभ्यताओं की वकालत। जहाँ बताया गया है कि प्रारम्भ में आदिमानव ने संसार को कैसे देखा होगा? गीजा का विशाल पिरामिड 20 साल में एक लाख लोगों के श्रम से क्यों बना? फिलिपीन के नए लोकसभा भवन के सामने मनु की मूर्ति क्यों स्थापित की गई है? ऐसे तमाम रहस्यों की जानकारी आपको मिलेगी इस ब्लॉग ‘‘मेरी कलम से‘‘ पर।
इस ब्लॉग के दिनाँक 05.04.2009 के प्रकाशित आलेख-‘‘यूरोप में गणतंत्र या फिर प्रजातंत्र ने मुझे बरबस आकर्षित किया और मैं इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए विवश हो गया। इस आलेख में बताया गया है कि-यूरोप के सद्यः युग में गणतंत्र (उसे वे प्रजातंत्र कहते हैं) के कुछ प्रयोग हुए हैं। इंग्लैंड में इसका जन्म हिंसा से और फ्रांस में भयंकर रक्त-क्रांति से हुआ। कहा जाता है, फ्रांस की राज्य-क्रांति ने अपने नेताओं को खा डाला, और उसी से नेपोलियन का जन्म हुआ, जिसने अपने को ‘सम्राट‘ घोषित किया, और इसी में हिटलर, मुसोलिनी एवं स्टालिन सरीखे तानाशाहों का जन्म हुआ। कैसे उत्पन्न हुआ यह प्रजातंत्र का विरोधाभास?
इसमें यह भी उल्लेख है कि-व्यक्ति से लेकर समष्टि तक एक सामाजिक-जीवन खड़ा करने में भारत के गणतंत्र के प्रयोग संसार को दिशा दे सकते हैं। कुटुंब की नींव पर खड़ा मानवता का जीवन शायद ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ को चरितार्थ कर सके।
प्राचीन सभ्यताओं की वकालत के बाद आइए चलते हैं सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यवहारों-लोकाचारों में निभाती, टूटती मानवीय मर्यादाओं पर बेबाक टिप्पणी करने वाले और कानूनी जानकारियाँ देने वाले दो महत्वपूर्ण ब्लॉग पर। एक है तीसरा खम्भा और दूसरा अदालत
ऐसा ही एक आलेख तीसरा खम्भा ब्लॉग पर मेरी नजरों से दिनाँक 31.05.2009 को गुजरा। आलेख का शीर्षक था आरक्षण से देश गृहयुद्ध की आग में जलने न लगे। इसमें एक सच्चे भारतीय की आत्मिक पीड़ा प्रतिविम्बित हो रही है। इस तरह के अनेक चिंतन से सजा हुआ है यह ब्लॉग। सच तो यह है कि अपने उद्भव से आज तक इस ब्लॉग ने अनेक सारगर्भित पोस्ट दिए हैं, किन्तु वर्ष-2009 में यह कुछ ज्यादा मुखर दिखा।
आइए अब वहाँ चलते हैं जहाँ बार-बार कोई न जाना चाहे , जी हाँ हम बात कर रहे हैं अदालत की। मगर यह अदालत उस अदालत से कुछ अलग है। यहाँ बात न्याय की जरूर होती है, फैसले की भी होती है और फैसले से पहले हुई सुनवाई की भी होती है मगर उन्हीं निर्णयों को सामने लाया जाता है जो उस अदालत में दिया गया होता है । यानी यह अदालत ब्लॉग के रूप में एक जीवंत इन्सायिक्लोपीडिया है। मुकद्दमे में रुचि दिखाने वालों के लिए यह ब्लॉग अत्यन्त ही कारगर है , क्योंकि यह सम सामयिक निर्णयों से हमें लगातार रूबरू कराता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भिलाई छत्तीसगढ़ के लोकेश के इस ब्लॉग में दिनेशराय द्विवेदी जी की भी सहभागिता है , यानी सोने पे सुहागा।


-रवीन्द्र प्रभात
(क्रमश:)

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून-2010 अंक में प्रकाशित
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