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लिखे हुए शब्द

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लिखे हुए शब्दों का
 कोई अर्थ नहीं
अगर वे
सिगरेट की
आखरी कश की तरह
जमीन पर फेंककर
पांव से कुचल दिए जायें।
लिखे हुए शब्दों की ताकत
ऐसी हो कि बुझता हुआ दीया
फिर से सुलग जाय
अन्याय सहते
 किसी व्यक्ति के साथ
न्याय हो जाय
या जी जाय फिर से
कोई मरता हुआ आदमी।
मैं उन शब्दों को
सहेजना जरूरी समझता हूं
जो चमकते रहते हैं
तारों की तरह
अनंतकाल तक,
जिसके माध्यम से
सुन्दरता को
 बचाए रखने की
हर पल
कोशिश की जाती है।

(चित्र : सूरज जसवाल )
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