'हिमधारा' हिमाचल प्रदेश के शौकिया और अव्‍यवसायिक ब्‍लोगर्स का मंच

लोभ

15.5.102पाठकों के सुझाव और विचार

 वनवास के दौरान यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से अनेक प्रश्न किए। उनसे एक प्रश्न किया गया कि किन-किन सद्गुणों के कारण मनुष्य क्या-क्या फल प्राप्त करता है और मानव का पतन किन-किन अवगुणों के कारण होता है? युधिष्ठिर ने बताया, ‘वेद का अभ्यास करने से मनुष्य श्रोत्रिय होता है, जबकि तपस्या से वह महत्ता प्राप्त करता है। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह कभी दुखी नहीं होता। सद्पुरुषों की मित्रता स्थायी होती है। अहंकार का त्याग करने वाला सबका प्रिय होता है। जिसने क्रोध व लोभ को त्याग दिया, वह हमेशा सुखी रहता है। कामना को छोड़ने वाला और संतोष धारण करने वाला कभी आर्थिक दृष्टि से दरिद्र नहीं हो सकता।’ कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा,
‘स्वधर्म पालन का नाम तप है। मन को वश में करना दम है। सबको सुखी देखने की इच्छा करुणा है। क्रोध मनुष्य का बैरी है और लोभ असीम व्याधि। जो जीव मात्र के हित की कामना करता है, वह साधु है। जो निर्दयी है, वह असाधु (दुर्जन) है। स्वधर्म में डटे रहना ही स्थिरता है। मन के मैल का त्याग करना ही सच्चा स्नान है।’ युधिष्ठिर ने यक्ष के असंख्य प्रश्नों का उत्तर देकर उसे संतुष्ट कर दिया। धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं सभी सद्गुणों का पालन करते थे। ऐसे अनेक प्रसंग आए, जब वह धर्म के आदेशों पर अटल रहे। अनेक कठिनाइयां सहन करने के बाद भी उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। 

Share this article :

+ पाठकों के सुझाव और विचार + 2 पाठकों के सुझाव और विचार

एक टिप्पणी भेजें

हिमधारा हिमाचल प्रदेश के शौकिया और अव्‍यवसायिक ब्‍लोगर्स की अभिव्‍याक्ति का मंच है।
हिमधारा के पाठक और टिप्पणीकार के रुप में आपका स्वागत है! आपके सुझावों से हमें प्रोत्साहन मिलता है कृपया ध्यान रखें: अपनी राय देते समय किसी प्रकार के अभद्र शब्द, भाषा का प्रयॊग न करें।
हिमधारा में प्रकाशित होने वाली खबरों से हिमधारा का सहमत होना अनिवार्य नहीं है, न ही किसी खबर की जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य हैं।

Materials posted in Himdhara are not moderated, HIMDHARA is not responsible for the views, opinions and content posted by the conrtibutors and readers.