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आग 
सीने में मेरे धधक रही है आग,
डरता हूं कहीं जल ना जाऊं अपनी आग में !  
कभी सुलगती, कभी पड जाती शीतल,
फ़िर अचानक धधक उथती है आग !

शायद ज़िन्दा हूं मॆं भीतर से, 
तभी धधकती है ये आग !
मर जाऊं आगर मॆं भी भीतर से,
तो शायद हो जाऊं मॆं भी शान्त, निश्चेत, 
ऒर फ़िर शयद नहीं धधकेगी ये आग !

पर क्यों हो जाऊं मे अचेत, निश्चल ?
क्यों हो जाऊं मॆं शामिल इस भीड़ में ?
नहीं, मैं जीना चाहता हूं इस तरह से,
कि धधकती रहे ये आग !
आज मेरे सीने में जलती, 
कल हर सीने में जलाना चाहता हूं मैं ये आग !

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