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एक बार भृगु ऋषि के मन में भगवान ब्रम्हा विष्णु और महेश की परीक्षा लेने का विचार आया ! वे जानना चाहते थे की इन तीनो में कौन है ! भृगु ऋषि सबसे पहले ब्रह्म लोक पहुंचे ! उन्होंने ब्रह्माजी को प्रणाम किए बिना ही कुछ ऐसे कटु शब्दों का उचारण किया की ब्रह्म जी क्रोधित हो कर उन्हें दंड देने के लिए तत्पर हो उठे ! देवी सरस्वती ने ब्रह्माजी का हाथ पकड़ कर उन्हें सयम बरतने को कहा ! भृगु जी ने भगवन ब्रहमाजी से क्षमा याचना की और लौट गए ! इसके बाद वे कैलाश पर्वत पहुंचे वहां शंकर जी के प्रति उन्होंने अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया यह देखते ही शंकरजी ने रुष्ट हो कर मरने के लिए त्रिशूल उठा लिया ! भृगु ऋषि ने क्षमा मांगी और लोट गए ! अब भृगु ऋषि विष्णु जी की परीक्षा लेने के लिए उनके धाम पहुंचे ! विष्णु भगवन सो रहे थे भृगु ने विष्णु जी की छाती पर जोर से लातसे प्रहार किया ! लात लगते ही विष्णु जी की नींद खुल गई उन्होंने ऋषि के पैर पकड़ लिए और सहलाते हुए कहा मेरे कठोर शरीर पर प्रहार से आपके पैर में चोट तो नहो लगी ! इतना सुनते ही भृगु ऋषि विष्णु जी के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मंगाते हुए बोले प्रभु आज मैं इस निष्कर्ष पर पहुँच हूँ की तीनो लोकों में आप ही श्रेष्ठ है क्योंकि आप सहनशील एवं क्षमावान है! हमारे धरम शास्त्रों में सहनशीलता और क्षमा भावना को बहुत महत्व दिया गया है !

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