नासूर बनती जा रही -किसान व बागवान की पीड़ा - हंसराज ठाकुर

यह कहना अपरिहार्य न होगा कि हमारा किसान – इंसानी सभ्यता की रीढ़ है I सभ्यताओं का निर्माण इन्सान ने किया I इंसानी प्रग्रति का इंजन या उसका महत्वपूर्ण कलपुर्जा किसान व बागवान है I समय के साथ सब बदलता गया – बड़ी बड़ी विकास गाथाएं लिखती चली गयी -मगर कोई गाथा लेखक या पालनहार किसान को उबार नहीं पाया I आजादी से लेकर आज तक देश व प्रदेश ने बहुत तरक्की की – अगर कोई तरक्की न कर पाया तो वो है मजदुर किसान व् बागवान I देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ करने वाले की अपनी अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है आज I 

बेशक युग परिवर्तन हुआ – हर क्षेत्र में इन्सान बुलंदियों की ओर बढ़ा , मगर किसान तब भी अकेला और असहाय था और आज भी I उदाहरणतया – आज ये विकसित समाज बाज़ार में कोई भी वस्तु खरीदता है तो उसका मूल्य उत्पादनकर्ता निर्धारित करता है अपने लागत खर्च व आमदनी के साथ सरकारी अंश (वैट ) व निर्यात खर्च जोड़कर – प्रिंट मूल्य के साथ वस्तु बाज़ार में उपभोक्ता तक पहुंचाता है I 

क्या कोई शक्सियत जानती है कि इस देश के इतिहास में कभी किसान, बागवान या सब्जी उत्पादक ने अपनी फसल का मूल्य निर्धारित किया है , अगर नहीं तो क्यों ? इसके लिए एक नए वर्ग विचौलिये का प्रादुर्भाव हुआ- जो बिना किसी मेहनत के सरेआम किसान व बागवान की मेहनत के आम चूस रहा है और किसान व बागवान के हिस्से में हमेशा ही गुठलियाँ ही पड़ती रही I    

हमारा देश कृषि प्रधान हैI  देश में सत्तर के दशक में हरित क्रांति का प्रादुर्भाव हुआ- जिसका जनक एम.एस स्वामीनाथन को माना जाता है, इसका मुख्य उदेश्य सिंचित व् असिंचित कृषि क्षेत्रों में अधिक उपज देने वाले संकर तथा जलवायु आधरित बौने बीजों के उपयोग से फसल उत्पादन में वृद्धि करना था I इसके आश्चर्यजनक परिणामों को कृषि विशेषज्ञों व् राजनीतिज्ञों ने हरित क्रांति का नाम दिया I समय के साथ परिष्कृत वैज्ञानिक तकनीक व् उपकरणों में नित नए सुधारों के साथ हमारा देश विश्व में चार बड़े कृषि उत्पादक देशों में से एक है लेकिन अमेरिका , चीन और ब्राजील के किसान कहीं ज्यादा खुशहाल हैं I    

रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग , उन्नत बीज , सिंचाई सुविधा ,वन्य पौध सरंक्षण , बहुफसली कार्यक्रम, वैज्ञानिक तकनीक, परिष्कृत यंत्र, कृषि सेवा केंद्र, कृषि उद्योग निगम, मृदा परीक्षण, भूमि सरंक्षण सहित कृषि शिक्षा व् अनुसन्धान से ही उत्पादन व् उत्पादकता में वृद्धि देखने को मिली और आज हमारा देश अन्नाज व् कृषि फसलों को निर्यात करने की स्थिति में पंहुचा – परन्तु आज भी अनेक कृषि उत्पादों का आयात करना पड़ रहा है I अभी भी प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादन अन्य विकशित देशों की तुलना में कम है I आज भी देश के हरित क्रांति कार्यक्रम में कई कमियां परिलक्षित होती हैं जैसे संस्थागत भू-धारण की व्यवस्था , श्रम विस्थापन व् रोजगार की तलाश में नगरों व् महानगरों की तरफ ग्रामीण बेरोजगारों का पलायन I हमारे देश का किसान व् बागवान हमारी खाद्य आत्मनिर्भरता की रीढ़ है अतः हमें इस रीढ़ को अधिक मजबूत बनाने की आवशयकता है I 

समय आ गया है किसानो व बागवानों के एकजुट होने का व इस समस्या का हल स्वयं ढूंढने का – फसल किसान व बागवान उगाता है तो उस फसल का मूल्य भी वो स्वयं निर्धारित करे I आज पिछले पचास वर्षों में चीजों के मूल्यों में बेतहासा वृद्धि हुई है, दस गुना से लेकर सौ गुना तक – मगर किसान व बागवानो के उत्पाद में दो तीन गुना नाममात्र की वृद्धि हुई है , आखिर ये शोषण कब तक जारी रहेगा I      

वर्तमान में भारत की 68 % आबादी गावों में बसती है और इसी आबादी का कुछ प्रतिशत हिस्सा खेतीबाड़ी व् बागवानी करके देश की खाद्य व्यवस्था को सुदृढ़ करता है I सरकार द्वारा सस्ता राशन मुहैया करवाने की योजना के साथ ही बहुत से लघु किसान बागवान व् असिंचित भूमि के मालिकों ने खेतीबाड़ी करना बंद भी कर दिया है I पहाड़ी राज्यों में तो वर्तमान परिदृश्य और भी भयानक होता जा रहा है I माध्यम वर्ग के किसान व बागवान जो अभी तक खेतीबाड़ी व बागवानी से जुड़े हैं वे भी वन्य पशुओं -जैसे सूअर व् बंदरों का फ़सलों पर आतंक से खौफ़जदा हैं I साथ ही साथ इन्सान के अमानवीय कृत्य -आवारा पशुओं से फ़सल सुरक्षित रख पाने में किसान व बागवान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं I असिंचित कृषि भूमि के किसान की तो कमर ही टूट गयी है I 

प्रकृति का सरंक्षण व् किसान बागवानों को जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान करने हेतु -कई राज्य सरकारें मानसून के दौरान पौधारोपण अभियान के तहत करोड़ों का बजट खर्च करती है मगर बिना देखरेख के लाखों पौधे सुख जाते हैं I आवश्यकता है सभी राज्य सरकारें -अपनी सरकारी वन भूमि चिन्हित करके इस बजट से उनका बाड़ा लगाकर सरंक्षण करे और औस्ती किसानों को टी.डी. देते समय एक पेड़ देने पर कम से कम दस पेड़ लगवाना सुनिश्चित करे व् उनकी देखभाल भी I एक वर्ष तक पौधे सुरक्षित रहने पर ही वन भूमि का पेड़ जरूरतमंद किसानों को दिया जाये I पौधरोपण अभियान व् सरंक्षण में टी.डी. धारकों की सहभागिता सुनिश्चित करवाई जाये I  जलवायु के आधार पर पौधों का चयन व् पौधारोपण हो तथा पौधों के आधार पर बाडायुक्त वन क्षेत्र वन्य जीवों को सरंक्षण प्रदान करे, इससे एक तरफ आवारा पशुओं को भी वन्य संपदा में प्राकृतिक रूप से सरंक्षित किया जा सकता है व् दुसरे अनुकूल सरंक्षित क्षेत्रों में अन्य वन्य प्राणियों को, जैसे चिड़ियाघरों में वन्य प्राणी सरंक्षित किये जाते हैं I बंदरों को कई राज्य सरकारें वर्मिन्न घोषित कर चुकी हैं I 

अब समय आ गया है कि किसानों की बिगड़ती दशा में राज्य सरकारें दूरदर्शितापूर्वक सहयोग का मरहम लगाना शुरू कर दे I नीतियों में किसान हितों का समावेश हो व् किसानों को आर्थिक व् नैतिक स्तर पर सुदृढ़ बनाया जाये I कानूनों का सख्ती से पालन करवाना सुनिश्चित किया जाये , विचोलियों की भूमिका समाप्त की जाये – अन्यथा किसानो व बागवानों की संख्या निरंतर घटती रहेगी I भविष्य में स्थिति विकट न बने समय रहते – यह सब नीतियाँ कारगर व् प्रभावी बनानी होंगी व् किसानो व बागवानों को नीतियों में उचित अधिमान व् सुरक्षा प्रदान करनी होगी I      


      हंस राज ठाकुर (विश्व रिकॉर्ड धारक चैस मैराथन )

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र रा.आ.व.मा. विद्यालय हट्गढ़  

तहसील बल्ह जिला मंडी ( हि.प्र )