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इन दरिंदों को सरेआम सज़ा-ए-मौत दे दो मी लॉर्ड


जगदीश बाली
9418009808
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 आज से लगभग पांच वर्ष पहले 23वर्षीय निर्भया से सामूहिक दुष्कर्म और उसकी लोमहर्षक हत्या से दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरा देश दहल उठा था और मोमबत्तियां जलाते हुए लोग आंदोलन के रूप में सड़कों पर उतर आए थे। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के कोटखाई में स्कूल की एक छात्रा के साथ पिछले वर्ष ऐसा ही दिल दहला देने वाला सामूहिक दुराचार और हत्या का मामला सामने आया। उस समय भी लोग सड़कों पर उतर आए थे। इन दो घटनाओं को याद कर अब ज़रा कल्पना कीजिए - आठ माह की बच्ची की, उसके मासूम चेहरे की, उसकी किलकारियों की और उसकी मुस्कुराहट की। क्या आप इस मासूम फूल सी बच्ची के बालात्कार की घटना के बारे में सोच भी सकते हैं? परन्तु जो कुछ हो रहा है वो यही ब्यां करता है कि मालूम नहीं इंसान कितने नीचे गिर सकता है!  ये समझ से परे है कि इंसान के रूप में दरिंदे हैवानियत की किस हद तक पहुंच सकते हैं। 
 मैं बात कर रहा हूं चंद रोज़ पहले की उस घटना की जिसकी खबर सुनकर पूरा देश एक बार फिर सकते में आ गया और इंसानियत एक बार फिर खून के आंसू रोई। हमारे देश की राजधानी व भारत का दिल, दिल्ली ये सुनकर दहल उठी कि यहां की शकूरबस्ती क्षेत्र में आठ महीने की मासूम बच्ची के साथ बर्बरता पूर्ण दुष्कर्म किया गया है। ये सुन कर रौंगटे खड़े हो गए और शरीर का रोम रोम थर्रा उठा कि इस वहशियाना दुष्कर्म को अंजाम देने वाला कोई और नहीं बल्कि उस बच्ची के ताऊ का सताईस वर्षीय बेटा है। इस खबर के बारे में जब सुना तो कानों पर भरोसा न हुआ, इस खबर को जब पढ़ा तो आंखो पर भी शक होने लगा। जब न्यूज़ चैनल्ज़ पर देखा, तो विश्वास करना ही पड़ा। इस खबर ने दिल को अंदर तक दहला दिया, मन और मस्तिष्क विचलित हो उठे। तीन घंटे के ऑपरेशन के दौरान अस्पताल के आई.सी.यू.से असहनीय और अनहद दर्द से जूझती असहाय बच्ची की चीखों का एहसास ज़रा सी इंसानी भावना रखने वाला कोई भी इंसान सहज़ ही कर सकता है। उस बच्ची की पीड़ा के बारे में सोचते-सोचते मेरा ध्यान खुशी से उछलती कूदती अपनी बेटी की ओर गया। कहीं इसके साथ भी कभी ऐसा हो गया...। ज़रा सोचिए - आठ महीने की बेटी के साथ ऐसा बर्बरतापूर्ण दुष्कर्म! फिर सोचिए अगर ऐसा आपकी बेटी के साथ हो!  या खुदा... 
 चंडीगढ़ की उस 10 वर्षीय बच्ची के बारे में भी सोचिए जिसे उसके ही चाचा के दुराचार ने मां बना दिया और इस मासूम को पता भी नहीं उसके साथ क्या हुआ है और मां बनना क्या होता है। खिलौनों से खेलने वाली10 वर्षीय मासूम बच्ची क्या जानें उसके साथ क्या हुआ है। ऐसी दरिंदगी देख क्या आपका मन ये चीख-चीख कर नहीं कहता - इन दरिंदों को सरेआम चौराहे पर सज़ा-ए-मौत दे दो माई लॉर्ड... ? 
  सितंबर 2016 में दिल्ली में ही एक मज़दूर ने 11 महीने की बच्ची से दुराचार किया और उसे मरा हुआ समझ कर झाड़ियों में छोड़ दिया। कुछ समय पहले हरियाणा के पानीपत क्षेत्र में 11 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया, उसका गला घोंट दिया गया और दरिंदे यहां भी नहीं रुके और गला घौंटने के बाद भी दुष्कर्म करते रहे। हरियाणा के ही ज़िंद में 15 वर्षीय बालिका के साथ दुष्कर्म करने के बाद बेरहमी से मार दिया गया।  पिछले वर्ष पश्चिम बंगाल के माल्दा ज़िले के एक गांव में 9 वर्षीय मासूम से लगातार तीन दिन तक दुराचार किया गया और फिर उसे एक सुनसान इमारत में लटका दिया गया। इसी राज्य में कुछ महीने पहले एक दरिंदे ने 13 वर्षीय बालिका को दुष्कर्म करने के बाद मार दिया। देश की राजधानी दिल्ली में एक 60 वर्षीय ने दो नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म किया और उन्हें 5 रूपए देकर घटना के बारे में किसी से बात ना करने को कहा। ये वो मामले हैं जिनमें नबालिग बच्चियां दरिंदगी का शिकार हुई है। इसके अलावा महिलाओं से बलात्कार के मामले तो और भी अधिक है।
 निर्भया दुराचार मामले को पांच साल से अधिक हो गए हैं। उस समय इस अपराध के लिए उठी आम जन की आवज़ से लगा था कि शायद तसवीर बदलेगी और सख्त कानून बनेगा, परन्तु बलात्कार की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। कानून कह रहा है कि सब कुछ कानून के अनुसार होगा। बीते पांच वर्षों पर नज़र दौड़ाई जाए, तो बलात्कार के मामलों में भारी वृद्धि हो रही है। देश के तमाम कोनों से आए दिन सामूहिक बलात्कार की खबरें आती ही रहती हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता हो, जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म की खबर ना आती हो। नैश्नल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के अनुसार 2015 में देश भर में बलात्कार के 34000 से ज्यादा मामले सामने आए, जबकि 2016 में 34600 मामले दर्ज़ किए गए। 2015 में 10854 मामले बालदुराचार के दर्ज़ किए गए जो बढ़ कर 2016 में 19765 तक पहुंच गए अर्थात 82 प्रतिशत की सैलाना वृद्धि। ये आंकड़े एक अंधेरी और भयावह तस्वीर पेश करते हैं। हमारे देश की राजधानी दिल्ली तो महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक होती जा रही है। थॉम्पसन रॉयटर्स फॉउंडेशन ने जून-जुलाई 2017 के बीच दुनिया के 19 महानगरों में एक सर्वे कराया जिसमें सामने आया है कि दिल्ली महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक महानगर है। 
 चंद कामयाब महिलाओं की उपलब्धियों को गिना कर हम बाकी बहू-बेटियों की दुर्दशा पर पर्दा डालकर सच्चाई से नहीं भाग सकते। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ - ये नारा तो अच्छा है, परन्तु क्या हम बेटियों को महफ़ूज़ रख पा रहे हैं? अगर बेटियां महफ़ूज़ ही नहीं, तो फिर पढ़ाएंगे किसे? खैर ज़िम्मेदारी केवल सरकार की नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी हमारी, आपकी और समाज की भी बनती है। आज किसी और की बेटी दरिंदगी का शिकार हुई है, कल मेरी और आपकी बेटी भी तो हो सकती है। इसलिए ऐसे दरिंदों का समाजिक बहिषकार कीजिए। इन्हें पकड़वाने में कानून का साथ दीजिए। और हां, ये दरिंदे बहुतायत आपके आस-पास हो सकते हैं। एन.सी.आर.बी ने खुलासा किया है कि  2015 की जानकारी के अनुसार 95 प्रतिशत बलात्कार जान पहचान वालों ने किए। इनमे से 27 प्रतिशत पड़ोसियों ने और 9 प्रतिशत परिवार के नज़दीकि सदस्य या रिश्तेदारों ने किए। इसलिए चौकन्ने रहिए। कहीं कोई दरिंदा अपके आस-पास आपकी बहू बेटियों पर बुरी नज़र तो नहीं रख रहा । हो सकता है वह घिनौनी हरकत करने की फिराक में हो। हर बेटी के मां-बाप को चौकन्ने रहने की सलाह दूंगा। समाज के पढ़े-लिखे ज़िम्मेदार लोगों को बाल दुराचार के विरुद्ध मशालें उठा कर एक जन अंदोलन करना चाहिए। सरकारों पर निर्भर मत रहिए। सरकारें तो आती-जाती रहेंगी, मगर आपकी बेटी की मासूमियत, अस्मत और स्वाभिमान पर लगे वो धब्बे शायद कभी न मिटे।   
हमें नहीं मालूम कानून की दलील क्या है, मगर एक बेटी के मां-बाप की तो यही इल्तज़ा है - इन दरिंदों को सरेआम सज़ा-ए-मौत दे दो माई लॉर्ड...

भाषा में फूहड़ता

कुछ रोज़ पहले रोज़ाना की तरह टहल रहा था | टहलते टहलते एक खुले मैदान के पास से गुज़रना हुआ| वहां कुछ बच्चे खेल रहे थे |  तभी एक छोटा सा बच्चा अपनी बहिन के साथ झगड़ रहा था | बचे की उम्र कोई छः साल और उसकी बहिन की उम्र तकरीबन आठ साल प्रतीत हो रही थी | झगड़ते  झगड़ते अचानक बच्चे ने अपनी बहिन को धक्का दिया और बोला - 'साली मा... लौ... | ' बाच्ची तो गिरते गिरते बची|, पर मैं उस नन्हें से बालक के मुंह से इन शब्दों को सुन कर मैं हक्का बक्का रह गया |  मैंने बच्चे को डांटते हुए कहा -'गंदी बात करता है| ऐसा भी कोई बोलता है क्या?' बच्चा वहां से भागता हुआ बोला : 'जब पापा मम्मी से लड़ते हैं, तो मम्मी को ऐसा ही बोलते हैं|'  ज़ाहिर है बच्चे ने ये भाषा अपने घर मेम ही सीखी होगी | इसमें बच्चे का दोष नहीं क्योकिं जन्म लेते ही वो भाषा ले कर तो नहीं आया न?
अकसर  बच्चे बड़ों के द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा को बड़ी जल्दी  अपना लेते हैं| दरअसल हमारी रोज़ाना की भाषा में फूहड़पन और अभद्रता आ गयी है| पैंट कोट टाई  पहने हुए दो जेंटलमैन यार जब मिलते हैं तो उनके सम्बोधन मैं भी भाषा का बिगड़ा हुआ मिज़ाज़ झलकता है| एक कहता है -'और भई माँ... | दूसरा जवाब यूँ  देता है-'ठीक है भई पैं ... |' आत्मीयता मेँ वे भूल जाते हैं की उनके आस पास भी दुनिया बसती है | अगर निकट कोई बच्चा हो तो समझ लीजिए ये शब्द तो जुकाम  की तरह एक बच्चे से सुसरे को और फिर पता नहीं कहां कहा तक पहुंच जाऐंगे|
इस तरह की भाषा से आप विद्यालयों मेँ भी रु बू रु हो सकते हैं| मज़े की बात ये है कि छात्र ताबड़तोड़ इन
एक्सपलेटिवज़ का इस्तेमाल करते हैं| भाषा का ज्ञान न होना अलग बात है, परन्तु फूहड़ और अभद्र भाषा का नियमित तौर पर इस्तेमाल समाज में बढ़  रहे छिछोरेपन व विकृत  मानसिकता को दर्शाता है| जेम्ज़ रोज़ोफ है - 'भाषा की फूहड़ता मदिरा की तरह होता है, जिसका इस्तेमाल एक ख़ास समूह मेँ ख़ास समय पर ही प्रयुक्त की जा सकते है|   


Vulgarity is like a fine wine: it should only be uncorked on a special occasion, and then only shared with the right group of people.” 
― James Rozoff      

TEST 4

TEST 3

TEST 2

TESTING

रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना और ब्लॉग आलोचना कर्म के मायने: डॉ॰ विरेन्द्र कुमार बसु

पुस्तक समीक्षा

रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना और ब्लॉग आलोचना कर्म नामक पुस्तक डॉ॰ सियाराम द्वारा लिखित है, जो कानपुर विश्वविद्यालय के अंतर्गत तिलक महाविद्यालय में एसिस्टेंट प्रोफेसर हैं। यह पुस्तक कानपुर विश्वव्द्यालय से लघुशोध पर आधारित है। लेखक के अनुसार इस पुस्तक में व्यक्त विचार अनेकानेक लेखकों, समीक्षकों, संस्थाओं, पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों आदि से संदर्भ सहित प्रस्तुत किए गए हैं। इस पुस्तक की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार डॉ॰ राम बहादुर मिश्र ने लिखी है, जिसमें उन्होने रवीन्द्र प्रभात को लोक मेधा का कलमकार माना है, वहीं उन्होने स्वीकार किया है कि रवीन्द्र प्रभात के लेखन की विशेषता है कि वे जिस जीवन और समाज से अनुभव बटोरते हैं उससे अगाध प्रेम भी करते हैं।  यही कारण है कि उनके पास एक भोगा हुआ यथार्थ है जिसे उन्होने शब्दों में पिरोया है। उन्होने यह भी स्वीकार किया है, कि रवीन्द्र प्रभात लोकभाषा की ताकत को भलीभाँति समझते हैं और उसका सटीक प्रयोग भी करते हैं। वस्तुत: वे लोक मेधा के ऐसे रचनाकार हैं जो लोक की हर प्रवृति से वाकिफ हैं।

पुस्तक के लेखक का मानना है, कि रवीन्द्र प्रभात पहले एक सशक्त साहित्याशिल्पी हैं और बाद में हिन्दी के प्रथम ब्लॉग विश्लेषक। रवीन्द्र प्रभात की पहचान और लोकप्रियता हिन्दी ब्लॉगिंग के क्षेत्र में सर्वाधिक है। वे हिन्दी ब्लॉग आलोचना के स्तंभ पुरुष हैं। हालांकि आलोचना कर्म सदैव से ही विवादों के घेरे में रहा है लेकिन रवीन्द्र प्रभात की ब्लॉग आलोचना लाभ-लोभ, पद-प्रतिष्ठा के सारे प्रलोभनों से अलग, अपनी व्यापक दृष्टि और अपने विचार के प्रति पूरी निष्ठा और संकल्पों के साथ प्रतिबद्ध हैं और यही इनकी ब्लॉग आलोचना की बड़ी विशेषता है।

86 पृष्ठ के इस पुस्तक में सबसे पहले रवीन्द्र प्रभात के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विहंगम दृष्टि डाली गयी है। उसके बाद उनकी काव्य चेतना के विविध रचनाधर्मी आयाम को विश्लेषित किया गया है। तत्पश्चात उनके कथा साहित्य में संघर्ष और द्वंद्व, व्यंग्य और सामाजिक परिस्थितियाँ, हिन्दी ब्लॉग आलोचना में उनकी भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाले गए हैं। इस पुस्तक में रवीन्द्र प्रभात के साहित्य में प्रयुक्त सुभाषित को भी प्रस्तुत किया गया है। साथ ही इस पुस्तक में चार साक्षात्कार क्रमश: आलोक उपाध्याय, जागृति शर्मा, निशा सिंह और डॉ॰ सियाराम के द्वारा प्रस्तुत किए गए हैं, जो इस पुस्तक की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करता है।

यह पुस्तक एक शोध ग्रंथ है जो साहित्यकार और चिट्ठाकार रवीन्द्र प्रभात के व्यक्तित्व व कृतित्व पर एकाग्र है। भाषा का लालित्य और विंब प्रशंसनीय है। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है, कि यह पुस्तक सहेज कर रखने लायक है और अन्य शोध हेतु प्रयुक्त होने वाली सर्वोत्कृष्ट सामग्री है।




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पुस्तक का नाम: 
रवीन्द्र प्रभात की परिकल्पना और ब्लॉग आलोचना कर्म
प्रकार: पेपर बैक
लेखक : डॉ॰ सियाराम
प्रकाशक: अवध भारती प्रकाशन नरौली, हैदरगढ़, बाराबंकी (उ॰ प्र॰)
आई॰ एस॰ बी॰ एन॰ 9978-93-83967-35-3

मूल्य: 180 रुपये 
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खटनोल और भज्‍जी नरेश देयोग

बात सन् १५૪० की है जब पूरा हिमाचल शेरशाह सुरी के सेनापति
खवासखान के अाक्रमणों से त्रस्त था । भज्जी का शासक आलमचंद भी अपने विजय अभियान पर था । उसने कोटी के शासक गोपीचंद को नालदेहरा की लड़ाई में’ बुरी तरह हराया जिसमें दोनों अोर के १८०० लोग मारे गए । इसके पश्चात वह सांगरी व मधान की अोर मुड़ा अौर उन्हें भज्जी में’ मिला लिया ।
लेकिन इससे पहले कि वह वापिस मूलभज्जी पहुंचता गोपिचंद ने अपनी हार का बदला लेते हुए आलमचंद की अनुपस्थिति का फ़ायदा उठाया अौर बेड़ों(राजमहल) को जला डाला अौर भज्जी के काटली,जाबल आदि स्थानों पर कब्जा कर दिया।
अब उसे अन्यत्र राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश थी जो उसे तत्कालीन खाट (जिसे बाद में’ बठोल अब खटनोल कहा गया)के रूप में’ मिला अौर भज्जी की राजधानी खटनोल बनी जो १६८८ तक रही । बाद में’ सोहनपाल ने सुन्नी को बसाया ।
(गजैटियर के अनुसार आलमचंद को २९वीं पीढ़ी का कहा गया जो जनश्रुतियों एव़ कालखंड से मेल नहीं खाता)

परिवर्तन ---- आलोक कुमार सातपुते


रिटायर्ड मास्टर तिवारीजी बड़ी ही बेचैनी से चहलकदमी कर रहे थे। अपने ललाट पर उभर आई पसीने की बूँदांे को वे बार-बार अपनी धोती से पोंछते। एक अजीब सी असुरक्षा की भावना घर कर गई थी उनमें। तीन
लडकियाँ थीं उनकी। बड़की और मँझली की शादी करने में वे लगभग बिक ही चुके थे, अब तीसरी सर पर सवार थी। वे छुटकी के भविष्य के प्रति आशंकित थे। इसी चिन्ता में उन्हें रात भर नींद न आती। सोते समय ऐसे करवटें बदलते, मानांे बिस्तर में काँटे उग आये हों। मँझली बेटी के दहेज़ लोभी ससुराल वालों ने उसे जलाकर मार डाला था। कुछ समाजसेवी संगठन और पत्रकार वग़ैरह कुछ दिनों तक थोथी सहानुभूति
दिखाते रहे, और उसके बाद अब हम क्या कर सकते हैं, हमें जितना करना था, कर चुके आदि जुमले
बोलने लगे। तिवारीजी सोचने लगे, आज हर आदमी मौक़ापरस्त है, किस मौक़े को कब भुनाना हैं, वह
अच्छी तरह जानता है। उसकी इस दक्षता को देखकर ऐसा लगता है, मानो मौक़ापरस्ती उसे घुट्टी
में पिलाई गयी हो । कोर्ट में बचाव पक्ष ने उनकी निष्कलंक बेटी पर चरित्रहीन होने का लांछन लगाया था।
कितनी छिछालेदर हुई थी उनकी । उधर बड़की के ससुराल वालांे की तरफ से भी धीमी पर सख़्त मांगे
ज़ारी थीं। ये सब सोचते-सोचते उनकी आँखों के सामने अन्धेरा सा छाने लगा। उन्होंने घबराकर अपनी घड़कन टटोली, और इस बात से निश्चिंत होकर कि, उनका हृदय धड़क रहा है, और वे अभी भी जीवित हैं, उन्होने अपनी बेचैनी बाँटने के उद्देश्य से अपनी पत्नी को आवाज़ दी...‘‘लक्ष्मी’’। मास्टरजी को खुद अपनी आवाज़ किसी अंधे कुएँ से आती हुई प्रतीत हुई। उनकी मंद आवाज़ की अभ्यस्त उनकी पत्नी रसोई से हाथ धोती
हुई निकली। वह मास्टरजी की मनःस्थिति से अच्छी तरह से परिचित थी। ‘‘लक्ष्मी मैं हमेशा इसी
चिंता में लगा रहता हूँ, कि हम छुटकी का ब्याह कैसे कर पायेंगे। मँझली हत्याकाण्ड के बाद तो मेरे हाथ पाँव ही फूल गये हैं।’’ तिवारीजी ने अपनी चिन्ता बतायी। ‘सुनियेजी, छुटकी के लिये राकेश कैसा रहेगा ? अच्छी
सरकारी नौकरी में है। कितना सम्मान करता है वह हमारा ।’ पण्डिताईन ने अपनी राय ज़ाहिर की। ‘‘ये क्या कह रही हो भागवान ? हम ठहरे उच्चकुलीन कान्यकुब्ज बाह्मण और कहाँ वो हरिजन । अरे हमें समाज में
रहना है कि नहीं। समाज के लोग हमें जात-बाहर कर देंगे। अरे हमारी लाश को कौन हाथ लगायेगा। सड़ती पड़ी रहेगी।’’ कहते-कहते उनके ललाट पर फिर पसीने की बूँदे चमकने लगीं । ‘‘देखिये जी आजकल ये सब बेकार की बातें हैं। आखिर समाज ने हमें दिया ही क्या है, सिवाय असुरक्षा की भावना के। किस समाज की बात कर रहे हैं आप ? क्या उसी समाज की, जहाँ दूल्हों की नीलामी होती है, और बोली लगाने के चक्कर में वधू-पक्ष के लोग बिक जाते हैं, या उस समाज की बातें कर रहे हैं, जो अपने बनाये जाल में खुद ही फँस गया है। हमारे समाज के द्वारा फैलाये गये पाखण्ड के जाल में दूसरे तो फँसते नहीं है, उलटे हमें ही अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सब कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं । मँझली का हश्र तो आप देख ही चुके हैं । रही बात जात बाहर
करने, और हमारी लाश के सड़ते रहने की, तो सुनिये हम जीते जी जिस काया की क़द्र नहीं करते, उसे दुनिया भर के व्यसनों से नष्ट-भ्रष्ट करते रहते हैं, उस काया की मरने के बाद चिंता क्यों करें। ज़्यादह ही है तो हम समाज की आँखों में धूल झोंकने के लिये छुटकी की शादी के बाद उसे मरा घोषित कर उसका पिण्डदान कर देंगे। इससे समाज का थोथा अहं भी शांत हो जायेगा । हमारी बेटी सुख से रहे, इससे ज़्यादा हम और क्या चाहेंगे। छुटकी कह रही थी, कि राकेश काफी प्रतिभाशाली है। उसका सिलेक्शन सामान्य सीट से हुआ है। दरअसल व्यवस्थागत दोषों के चलते हम हरिजनो के प्रकृति-प्रदत्त गुणों की उपेक्षा कर जाते हैं । हम उनकी
प्रतिभा का मूल्यांकन आरक्षण का चश्मा पहनकर करते हैं । ये उनके साथ अन्याय है। छुटकी यह भी बता रही थी कि, राकेश घर से भी अच्छा सम्पन्न है । पिछली बार जब आपकी तबीयत खराब हुई थी, तो कितनी मदद की थी उसने...तब कहाँ था आपका समाज ? छुटकी तो यह भी बता रही थी कि, उनके समाज के लोग बड़े उदारमना होते हैं । वे सभी को अपने समाज में मिला लेते हैं । हमें तो ऐसे लोगों से सीख लेनी चाहिए । हम क्या सामाजिक कुरीतियों का पोषण करने के लिये ही उच्च वर्ग के हैं । छुटकी ने तो मुझे घुमा-फिरा कर बता ही दिया है, कि दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं, और हमारी स्वीकृति चाहते हैं । अब हमें भी उन्हें स्वीकृति प्रदान कर ही देना चाहिये।’ पण्डिताईन ने अपनी राय दी । ‘‘पर यह सब होगा कैसे ? हम किस तरह उन्हें स्वीकृति प्रदान करेंगे । स्पष्ट बोल पाने का साहस तो मुझमे बचा ही नहीं है ।’’ मास्टरजी ने पण्डिताईन से
सहमत होते हुए प्रश्न किया । ‘छुटकी बता रही थी कि, आज राकेश का बर्थ-डे है । आप ऐसा करिये बर्थ-डे के उपहारस्वरूप सिनेमा की दो टिकटें ले आइये, दोनों को एक साथ फिल्म देखने भेज देते हैं।’ पण्डिताईन ने
चहक कर कहा । थोड़ी देर विचार करने के बाद मास्टरजी के कदम टाकीज़ की ओर बढ़ने लगे । उनकी आँखों में अपनी बेटी की ख़ुशी के सपने उभरने लगे । सामने ही प्लेटफॅार्म पर लगने के लिये ट्रेन अपनी पटरी बदल
रही थी ।

 आलोक कुमार सातपुते
 09827406575
 832, हाउसिंग बोर्ड काॅलोनी
सड्डू, रायपुर (छ.ग.)