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Sushil Bhimta

बस यूं ही जीवन सफर पर चलते चलते, उम्र के एक पड़ाव की शाम ढलते-ढ़लते।
बचपन की यादों के दिल में मचलते-मचचलते, वक्त के जख्मों को भरते-भरते…बचपन के चार दिवारी में पलते-पलते!–आंसूओं का सैलाब पथराई आँखों से निकलते-निकलते–बस यूं ही जीवन सफर पर चलते-चलते!

गिरवी बचपन— क्यों ना चंद लम्हें उस बचपन के याद करलें जो बर्फ में तसलें में फिसलता और ठंड से ठिठुरता हाथ पर गर्म सांसे फुंकता था कभी। वो गांव की बर्फ की सफेद चादर से ढकी जमीं तो आज भी नजर आती है मगर गाँव की गलियों में खेलता वो बचपन आज शहर के पारकों, प्ले स्कूलों के दिखावे में खोकर बंदिशों में घुटकर दम तोड़नें लगा और गांव की गलियां चौबारे, नुक्कड़ वीरान छोड़नें लगा।

आधुनकिता ने गांव की माटी से रिश्ता तोड़ दिया। वो आजादी की उड़ान भरनें वाला नन्हा सा लाड़ प्यार-दुलार से भरा बचपन चार दिवारी में तन्हा छोड़ दिया। वक्त के साथ बदले हालात के हाथों तन्हाई में और चारपाई पर मोबाइल पर बचपन के अनमोल पल खोता और बचपन की दोस्ती की मस्ती खोता नजर आता है।

वो गुड़ की ढली और मक्की की रोटी की जगह पिजा, बर्गर, पेटीज खाता बीमारियों को बुलाता वो मासूम बचपन हर जगह नजर आता है। स्वाद ने स्वास्थ्य ले लिया और दिखावे नें ज़िदगी से किनारा कर लिया। शिक्षा सिर्फ अंग्रेजों से भिक्षा बनकर रह गई। ज्ञान अब अंग्रेजी है और विद्वान हिन्दोस्तानी बनें अंग्रेज। जिन्हें 79-89, 94 और 95 का पता नहीं, आज रामायण महाभारत, वैद-शास्त्रों को कोई पड़ता नहीं उन्हें अपने संस्कारों का पता चलता नहीं।

आज छाये फिल्म जगत के कपूर और खान हैं जो परदों पर निकाल रहे संस्कारों और भारतीयता की जान हैं धर्म के ठेकेदार बने आसाराम और राम रहीम जैसे जो अपने ढाबों में निकाल रहे आस्था के नाम पर आवाम की जान हैं। हरम बनाकर जी रहे धर्म स्थलों को, राजनीति और धर्म गुरु बनकर ली आड़ में हुए बेलगाम हैं। 11–12साल की उम्र में ही बेटियों की लूटते आबरू और जाती मासूमों की जान है। दौलत नें बचपन खरीद लिया, प्ले स्कूलों, करचों का साया डालकर और माता-पिता का माल देखकर! धुँधला गई माया जाल के फैले जाल से माँ-बाप की आंखें और बचपन बेचकर दिखावे की चादर खरीद लाये जिसमें बाहर से चमक तो बहुत है पर ओढ़ने पर सकूँ नहीं मिलता। बचपन पराये हाथों में पलता है जो अपनेपन को छलता है जिसका असर आज माँ बाप से और सामाजिक रिश्तों में आई दूरियों में झलकता है। बस बचपन की माँ -पिता रिश्ते-नातों की इसी अनमोल सीख की कमीं से युवा रिश्तों की दुनियाँ को छोड़ आज के दौर में थोड़ा बेदर्द दिखता है।

दौलत कमाना कोई गुनाह नहीं लाजमी है जीनें के लिए। मगर उसके सरूर में अपने घर के चिराग को जिसने चलना फिरना अभी सीखा ही होता है उसको अंग्रेजी संस्कार ही कहूँगा कि शिक्षा देने वालों के सुपुर्द कर देना मतलब बेदर्द और बेपरवाह बना देना है।

इस हालत में बड़ा हुआ बचपन फिर देश में नहीं विदेश में रुकता है और माता-पिता की आँखों में तब सिर्फ आंसुओं का सैलाब और वृद्धाश्रमों का द्वार दिखता है जहां फिर बुढापा सिसकता और गैरों से जबरदस्ती लिपटता दिखता है।

अंगेजी सिर्फ एक भाषा है जो सिर्फ माध्यम है विचारों के आदान प्रदान का, हमारे धर्म ग्रन्थ-कथा, कहानियां, पूजा-पाठ, रीति-रिवाज, वेशभूषा हमारी पहचान है। इन्हें बढ़ावा तभी मिल सकता है जब इन्हें कहीं ना कहीं हमारे पाठयक्रम और सामाजिक जीवन में आवश्यक तौर पर अपनाया और लाया जाए। आज भी हमें अंग्रेजी और अंग्रेजों ने मानसिक गुलाम बना रखा है और घर को शमशान बना रखा है जहां रोज संस्कारों व्यवहारों की अर्थी जलाई और दफनाई जाती है।

आसुंओ का सैलाब हर घर की दहलीज से निकलकर गाँव, शहर की गलियों से गुजरकर देश में अराजकता का समुंदर बनकर देश डूबने लगा है। जो सबको दिखता है पर फिर भी बचपन दिखावे के हाथों बिकता है। दौलत का जनून दिखता है। बचपन के बगैर हर घर वीरान दिखता है। धार्मिक शिक्षा ग्रन्थों को प्राण दो बचपन को नई पहचान दो, घर के वीरानों को बचपन की किलकारियों से जान दो!….होड़ है, दौड़ है, कोढ़ है, ये दिखावा एक भयानक मोड़ है!

अंत में एक गुजारिश करना चाहूंगा देश की सरकार और राज्यों की सभी सरकारों के कर्णधारों से की अंग्रेजी माध्यम ठीक है मगर उसके साथ-साथ हमारे संस्कारों, व्यवहारों को शिक्षा पाठयक्रम में लाना भी जरूरी है। हम सब सामाजिक प्राणियों का भी उतना ही उत्तरदायित्व है जितना कर्णधारों का, कि हम अपने बच्चों को अपने रीति-रिवाजों और भारतीय परिधानों, आचरण-व्यवहारों से जोड़े रखें। वर्ना बचपन विदेश में युवा बनकर आबाद होगा और भारत यूँ ही बर्बाद होगा और हमारे बुढापे का ये कडुवा स्वाद होगा।

बचपन को प्ले स्कूलों, कर्च, मोबाईल आदि में मत फसाइये उसे समय दीजिये ये कच्ची मिटटी के खिलौने हैं टूट जातें हैं इन्हें गैर हाथों में इतनी जल्दी मत सौंपिये। फूल हैं इन्हें माँ बाप रिश्ते नातों और अपने अपने समाज की बगिया में खिलने दीजिये। इनकी नाजुक उंगलियों को पकड़ कर एक उम्र तक इन्हें चलना सिखायें। फिर जहां चाहो वहां छोड़ जायें । तब ये घर समाज, देश हर जगह महकेंगे, बहकेंगे नही।

लेखक स्वतंत्र विचारक हैं तथा हिमाचल प्रदेश में रहते हैं।

विपक्ष के नकारेपन के कारण फासीवादी ताकतों ने सरकार पर कब्जा कर लिया है


बाराबंकी । कामरेड राम नरेश वर्मा कम्युनिस्ट पार्टी के निर्भीक, लडाकू व संघर्ष शील नेता थे यह विचार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि कामरेड वर्मा ऐसे वक्त में दिवंगत हुए हैं जब विपक्ष के नकारेपन के कारण फासीवादी ताकतों ने सरकार पर कब्जा कर लिया है मजदूर किसान की कोई बात सुनने वाला नहीं है
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हुमायूं नईम खां ने कामरेड राम नरेश को कर्मठ व ईमानदार साम्यवादी बताया। बहुजन समाज पार्टी के जिला उपाध्यक्ष राम प्रताप मिश्रा ने कहा कि राजनीति में कामरेड राम नरेश एक अच्छे दोस्त थे और समाज को नई दिशा देने का काम किया था
कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सहसचिव डॉ कौसर हुसेन ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को बनाए रखना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि आज पार्टी को कामरेड रामनरेश वर्मा जैसे लड़ाकू नेताओं की जरूरत है।
श्रद्धांजलि सभा को शिव दर्शन वर्मा किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह, प्रवीण कुमार, बहुजन समाज पार्टी के निशात अहमद समाजसेवी फजलुर्र्हमान, समाजवादी पार्टी के आशाराम वर्मा, हनोमान प्रसाद, अमर सिंह प्रधान, जियालाल वर्मा, मुनेश्वरबक्स गिरीश चन्द्र, राम सुचित वर्मा, योगेंद्र सिंह, श्याम सिंह, अंकुर वर्मा, अधिवक्ता नीरज वर्मा आदि प्रमुख लोग थे।

EVM और चुनाव

देश के नेता और मीडिया विश्वसनीयता खोता जा रहा है।पहले बूथ capturing होती थी जनता को ठगा जाता, शेषन साहब द्वारा  चुनाव सुधार प्रक्रिया शुरू की गई थी उससे चुनावों में काफी पारदर्षिता आ चुकी है।EVM खराब हो सकती है पर उसमें हेरा फेरी करना बेहद मुश्किल है।जो लोग हेरा फेरी करके विजेता बनते थे वे हार रहे है और चुनाव प्रक्रिया को निशाना बनाते है।मैं तो कहूंगा कि अब समय आ गया है कि अब मोबाइल एप या किसी जगह आधार कार्ड के माध्यम से अंगूठा लगा कर वोटिंग हो ताकि शत प्रतिशत वोटिंग लक्ष्य हासिल हो सके।कुछ नकारे गए लोग देश को बैलट वाली उसी चोर दुनिया में ले जाना चाहते है जहां कहा जाता है कि पोलिंग बूथ के ठेके होते थे और बाहुबली चुनावों को निर्धारित करते है।यदि भाजपा को दोषी बताते है तो देश में बहुत। से राज्यो में अन्य दलों की सरकारें है और उनकी देखरेख में चुनावी प्रक्रिया सम्पन्न होती है।अतः देश को आगे ले जाना चाहिये पीछे नहीं यही देश के लिए उचित है।

मुझे तोड़ लेना वनमाली-- जगदीश बाली


Jagdish Bali
एक बार फ़िर वही हुआ जो घाटी में दशकों से होता आया है। एक बहुत बड़ा फ़िदायीन हमला और देश के लगभग 40 जवान शहीद हो गए। जब कभी भी जम्मू-कश्मीर में ये लगने लगता है कि घाटी में अमन कायम होने वाला है, तभी दहशतगर्द ऐसी घटना अंजाम दे जाते हैं कि हर एक सच्चा हिंदोस्तानी सिहर उठता है। कुछ ही समय पहले जब बारामूला को आतंकी रहित ज़िला घोषित किया गया, तो लगा कि नए साल में घाटी की फ़िज़ाओं में अमनोचैन की खुशबू फ़ैलने वाली है। पर अमनोचैन कैसे हो सकता है जब पड़ोसी देश पाकिस्तान हो, उसकी पनाह में नाचने वाले दहशतगर्द हो और दहशतगर्दों को कवर देने वाले पत्थरबाज़ अपने देश में ही मौजूद हो। पुलवामा ज़िले में स्थित अवंतिपोरा इलाके में जिस तरह से जैश-ए-मौहम्मद के विस्फोटक फ़िदायीन हमले में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस के जवानों को उड़ाया गया, वो घाटी में दहशतगर्दों के इरादों को स्पष्ट करता है। सितंबर 2016 में हुए उरी हमले से भी बड़ा व भयानक ये हमला था। इस आत्मघाति विस्फोट के बाद जो मंज़र पसरा था, उसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं थी। चारों ओर क्षत-विक्षत पड़े शवों को पहचानना तो दूर, शहीद जवानों के अंगों को ढूंड पाना भी असंभव था। आदिल अहमद डार द्वारा कार्यान्वित यह हमला इस बात की बानगी है कि दहशतगर्दों को अमनोचैन व बात-चीत से कोई सरोकार नहीं। वे तो बस कत्लोगारत व दहशत से जन्नत जाना चाहते हैं। इंसानियत खो चुके ऐसे आतंकियों का सफ़ाया होना चाहिए और उनके पनाहगाह पड़ोसी को भी माकूल सबक सिखाया जाए। उनसे बात-चीत का ढिंढोरा पीटना बंद होना चाहिए। अहम सवाल है आखिर कब तक हमारे देश के जवान यूं ही शहीद होते रहेंगे। आतंकियों के सथ रोज़ मौत से रु-ब-रु होते सैनिकों की बदौलत ही हम देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है।
ज़रा अंदाज़ा लगाइए घाटी के उस विरोधपूर्ण और तनाव भरे वातावरण व परिस्थितियों की, जिनमें हमारा फ़ौजी काम कर रहा है। ये स्थिति सचमुच किसी भीषण आपदा से कम तो नहीं है। कश्मीर घाटी में एक ओर तो सैनिक पाकिस्तान से आ रहे गोलों का सामना करते हैं और दूसरी ओर उसके द्वारा भेजे गए आतंकवादियों से लोहा लेते हैं। उस पर ये ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ व ’हिंदोस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगानेवाले पत्थरबाज़ और सियासी चालबाज़। हद तो तब हो जाती है जब सियासी गलियारों से भी ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा गूंज उठता उठाता है। दरअसल ये आवाज़ उन लोगों की है जो नमक तो भारत का खाते हैं, परन्तु उनके दिल में सहानुभूति पाकिस्तान के लिए हैं। ऐसी अलगाववादी व हिंदोस्तान विरोधी सोच रखने वालों के लिए अफ़जल गुरू, कसाव, बुराहन अवानी जैसे लोग शहीद ही होंगे और वे मानव अधिकार की आड़ में ऐसे लोगों को बचाने का भरसक प्रयास करते रहेंगे।
 हम चैन की नींद इसलिए सो पाते हैं क्योंकि सीमा पर वहां वो सैनिक खड़ा है। हम इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वह सैनिक दुश्मन के आ रहे गोलों के सामने चट्टान बन कर ढाल की तरह खड़ा है। पूस की कड़कड़ाती ठंड हो या जेठ की झुलसा देने वाला ताप, वो सैनिक वहां मुस्तैद खड़ा है। हम इसलिए अपने परिवार के साथ आनंदमय और सुखी जीवन का उपभोग कर रहे हैं क्योंकि कोई अपने परिवार, अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने भाई- बहिन, अपने मां-बाप को छोड़ कर सीमा पर तैनात है। हम इसलिए अपनी छुट्टियों व त्यौहारों की खुशियां मना पाते हैं, क्योंकि वहां देश का वो जवान खड़ा है, जिसके लिए कई बार छुट्टियां भी नसीब नहीं होती और मिलती है, तो कोई पता नहीं कब सीमा पर से बुलावा आ जाए। वह फ़ौजी शिकायत भी नहीं करता। वो तो देश के लिए शहीद होने के लिए तैयार रहता है। वह सिर नहीं झुकाता, बल्कि सिर कटाने के लिए तैयार रहता है और कहता है:
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जाए वीर अनेक
   आखिर बर्दाश्त की हद होती है। विभिन्न न्यूज चैनल्ज़ पर वीडियो में साफ देखा जा सक्ता है किस तरह से अलगाववादी सैनिकों को लात-घूंसे मारते है, उनसे छीना झपटी की जाती है और उनकी टोपी तक उछाली जाती है। फिर भी सैनिक सहन करते हैं। फिर पत्थरबाज़ उन पर पत्थरों की बरसात करने लग जाते हैं। ये सब देख कर आम देशवासी का तो खून कौलने लगता है। आखिर सैनिक कब तक खामोश रहे और क्यों? पाक परस्त पत्थरबाजों व उनके चालबाज सियासी आकाओं को समझ लेना चाहिए कि उनके नापाक मनसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।
 आज सीमा पर जवान रोज़ कुर्बान हो रहे हैं और इसके बावजूद भी सियासत के कई मदारी उनके विरुद्ध ऎफ़.आइ.आर दायर करने की बात करते हैं और पत्थर बाज़ों को आम मुआफ़ी का तोहफ़ा प्रदान करते हैं। वे पाकिस्तान के साथ बातचीत की हिमायत जोर शोर से करते हैं। ऐसा कर वे सैनिक के मनोबल को गिराने का घिनौना प्रयास कर रहे हैं और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। जिन सैनिकों की बदौलत देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है, उनके विरुद्ध प्राथमिकि दर्ज़ कर उनके मनोबल को नहीं गिराया जाता, बल्कि उनकी वतन परस्ती के ज़ज़्बे के आगे सिर झुकाया जाता है। भूलना नहीं चाहिए कि जब जवान आक्रोष में आता है, तो वह ऐसे शक्तियों को छिन्न-भिन्न कर देता है।
 वक्त आ गया है कि आतंकियो और उन्हें सहायता देने वाले पत्थरबाज़ों के साथ शून्य सहनशीलता की नीति को अपनाया जाए क्योंकि ये  न प्रेम की भाषा जानते हैं न मोहब्बत के गुलाब। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उचित ही कहा है:
छीनता हो स्वत्व कोई, और तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है
 आज देश के हर फौजी से सच्चा देशवासी कह रहा है – फौजी! तुम्हारे कारण ये देश जिंदाबाद है। इसलिए तुम हमेशा ज़िंदाबाद हो और तुम्हें ये देश जय हिंद कहता है।

सेना पर स्तब्ध करने वाला पुलवामा हमला

देश पर पुलवामा में इतना बड़ा हमला आतंकीयों ने किया है देश स्तब्ध हो कर रह गया है, पूरे देशवासियों का  खून खौल रहा है सभी केवल बदला चाहते है 40 के बदले सभी आतंकियो का सफाया।पर ऐसे में कई छोटे बड़े नेता उलूल ज़लूल बयानबाज़ी कर रहे है।1947 से हम पाकिस्तान पर अपनी विदेश नीति को देख रहे है जो तुष्टिकरण के अलावा कुछ नहीं रही।युद्ध हुए क्या पाकिस्तान सुधरा नहीं, कश्मीर पर उसकी नीति में कोई बदलाव आया बिल्कुल नही।अटल जी की लाहौर यात्रा का जवाब कारगिल रहा।अभी देश का सौभाग्य है कि मोदी जैसा योग्य नेतृत्व मिला है पर भी विदेश नीति को कमज़ोर करने की कोशिश करने में लगे हुए है।अब देश ऐसे लोगों को कभी माफ नहीं करेगा।अब में मोदी जी पाकिस्तान क्यों गये पूरे देश को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मोदी जी देश के सरकार के प्रमुख है उनका पहला कार्य किसी भी देश को संदेश देना था कि हम दोस्ती चाहते है हम बड़े है हम पहल करते है कि क्षेत्र में हम शांति चाहते हमने आगे बढ़ कर पहल की आप भी आगे बढें और आंतरिक मुद्दे व कश्मीर समस्या का समाधान करें, मोदी के पाकिस्तान जाने के कदम को सराहनीय कदम माना जाना चाहिये।जब नकारात्मक जवाब मिला तो आतंकीयों के विरुद्ध जीरो टोलरेंस की नीति शुरू हुई जो अब भी जारी है।आतंकीयों को लगभग समाप्त कर दिया गया पाकिस्तान भी लगभग हताश हो गया है, आतंकीयों के सारे कमांडर मारे जा चुके है कोई कमांडर बनने को तैयार नही।मोदी जी ने ठोस नीति अपनायी जो प्रशंसनीय है।विरोधी दल सेना की कार्रवाई को प्रश्नचिन्ह लगाती है सेना के अफसरों को गाली देती है निंदनीय है।लोकल नेताओं की वजह से काफिलों के साथ लोकल वाहन की आवाजाही को मंजूरी देना घातक साबित हुआ।गुलाम नबी आजाद, फारूख उमर व महबूबा मुफ्ती जैसे लोग इस के लिये जिमेवार है जिनकी वजह से ये मंज़ूरी मिली थी।हम इन लोगों के व्यवहार से शर्मिंदा है।मोदी जी से अब केवल पूरा देश आप से चाहता है कि सब आतंकी कैम्प तबाह हो हाफिज सईद अजर महमूद को मौत दी जाये व पाकिस्तान को हर दृष्टि से तबाह कर दिया जाये।मोदी जी आप की सरकार आये या न आये पर सब समाप्त कर दो यही देश आप से चाहता है।जवानों की शहादत खाली न जाने पाये, वरना देश आप को माफ नहीं करेंगे।देश उन दलों को तो कभी माफ नहीं करेगा।

रघुराम राजन व मनमोहन सिंह जी बड़े अर्थशास्री है।मनमोहन सिंह जी को राजनीति में नरसिंह राव जी लाये वो केवल इसलिये ताकि एक योग्य ईमानदार व योग्य अर्थशास्री देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सके और उन्होंने अपना काम भी ईमानदारी से किया।पर प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीति को अपना लक्ष्य चुनना शायद मनमोहन सिंह जी की बहुत बड़ी भूल थी।उन्होंने बहुत कमाया लेकिन लगभग आधा उन्होंने ने इस पद को संभालकर गंवा दिया।अब उनका प्रयोग केवल अपना उल्लू साधने के लिये किया जाता है।नोट बंदी व जी एस टी पर इन दोनों यानी मनमोहन सिंह जी व रघुराम राजन के ब्यान सुने कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उनके बयान अर्थशास्री के नाते थे, पर वे भूल जाते है कि उनका कार्य किसी दल का कल्याण नहीं अपितु देश का भला होना चाहिए।राजनीति में लिए गए मोदीजी के ये दो कठोर फैसले देश की अर्थव्यवस्था को आम लोगों की अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होंगे।जी एस टी जहां देश में एकल टैक्स व्यस्था स्थापित करने में सहायक होगी और व्यापारियों की लूट से आम आदमी को छुटकारा मिलेगा वहीं नोट बंदी एक ऐसा कदम था जिसकी बहुत आवश्यकता थी, सब चाहते थे कि काले धन को बंद तिजोरी से कैसे बाहर लाये, जब तक मुद्रा प्रवाह सही नही होता देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होती है।काले धन वाले इसको देश विरोधी गतिविधियों पर खर्च करते है जिससे आतंकवाद व नक्सलवाद बढ़ता है, अमीर और अमीर व ग़रीब और गरीब होता है।काले धन वाले बिना किसी कार्य के पंजीकृत कंपनियों के द्वारा काला धन सफेद करती है कई व्यापारी कृषि भूमि खरीद कर बिना टैक्स चुकाए अपना धन सफेद करते है।सारा धन प्रवाह में आया या 99% आया ये देश के लिए शुभ संकेत है यही छिपा हुआ पैसा तो देश के मुद्रा प्रवाह में शामिल करना था।लाखो फ़र्ज़ी कंपनियां बन्द हो गई लाखों लाख नए कर दाता बढ़ गए, ये देश के लिए अच्छा संकेत है क्योंकि ये धन केवल गरीबों के विकास के लिए खर्च होगा।रघुराम राजन शायद किसी दल में शामिल होना चाहते है तभी नोटबंदी व जी एस टी को विफल बता रहे है।देश हित मोदी जी का इतने कठोर कदम जिसमें उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर लग सकता है उठाना इतना साहसी है जितनी तारीफ करें कम होगी।बोलने वाले बोलते है बोले पर देश पर राज अब वही व्यक्ति कर सकता है जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र का सोचे।वैसे इन सब से प्रभवित बीजेपी के लोग व वोटर ज़्यादा हुए है।अब अर्थव्यवस्था 7.7%की दर से बढ़ने लगी वो अब रुकने वाली नहीं , मंदी का दौर समाप्त हो चुका है अब केवल एक सुनहरी भारत का निर्माण होगा।इससे कुछ लोगों की जाने गई कुछ प्रभावित हुए उन पर राजनीति नही होनी चाहिए कृतज्ञ राष्ट्र उनकी नेक कुर्बानी को हमेशा याद रखेगा।

राफेल सौदे की आवश्यकता

दुःख होता है ये जानकर की अपने लोगों की नासमझी व् नादानी के कारण विदेशी आक्रांता यहां पर राज करते रहे तथाकथित देश के विरोधी अपने ही लोगों से खिलवाड़ करते रहे और देश की मासूम और असहाय जनता उनको अपना मसीहा मानती रही।ये सिलसिला आज भी जारी है  फूट डालो और शासन करो की नीति ने देश के विकास को बाधित किया है।राफेल डील को रद्द करने की पूरी कोशिश हो रही है ताकि देश की सेना को मज़बूती न मिल पाये,जो कार्य पाकिस्तान नहीं कर पा रहा है वह कार्य देश के राजनीतिक दल कर रहे है।जितना पैसा नेताओं ने भ्र्ष्टाचार करके खाया है राफेल डील तो उसका .1% भी नहीं है।राफेल जैसे अतिआधुनिक विमान के साथ साथ अन्य अस्त्र शस्त्र से हमारी सेनाएं शीघ्र ही सुसज्जित होनी चाहिए।देश तब तक ताकतवर नहीं बन सकता जब तक उसकी सीमाएं सुरक्षित न हो।राफेल डील को रद्द करने जो प्रयास हो रहे है वो देश के लिए खतरनाक व् आत्मघाती है।सामरिक सौदे के विरोधी सभी दलों को देश की जनता को रिजेक्ट कर देना चाहिए यही देश हित में होगा।मोदी जी भारतमाता के वो सपूत है जो कभी दलाली नहीं खा सकता।बाकि किसी न किसी कंपनी ने कॉन्ट्रैक्ट लेना ही था।ऐसा कदापि सम्भव नहीं की मोदी जी 526 करोड़ की चीज 1600 करोड़ में खरीदेंगे।इतना तो मोदी को जाननेवाला कोई नासमझ भी कह सकता है।किसी भी हालत में मोदी जी को इन सामरिक सौदों को  करने में देरी नहीं करनी चाहिए,भारत की जनता अब केवल उसको स्वीकार करेगी जो ज़मीन पर कुछ करके दिखायेगा न की विरोध ही करता रहेगा।

मोदी सरकार के फैसले

बेहद दुःखद बात है जी एक राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री को कुछ पढ़े लिखे भी समझ नहीं पा रहे है, ये केवल हमारी शिक्षाप्रणाली का असर है।नोटबन्दी पूरी तरह सफल रही, 2 से 3 लाख फ़र्ज़ी कंपनिया बन्द हुई,नक्सलवाद लगभग समाप्त हुआ, अब कुछ लोग 2000 के नोट इक्कठे करके उनको पुनः पहुंचा रहे है, आतंकवाद की कमर टूट गयी, घर में रखा पैसा सर्कुलेशन में आया,यदि 10 करोड़ लोग 5000 भी घर में रखते है तो ये 5 खरब बनते है, जो केवल ब्लैक मनी ही कहा जायेगा ये पैसा बैंकों में आया अब गरीबों के काम आ रहा है, लाखों करोड़ पकड़ा गया वह देश की अर्थव्यवस्था में शामिल हुआ।लोगों ने कहा जा रहा की गरीब लोगों के द्वारा बैंकों में जमा किया और इन गरीबों को लाइन में खड़ा किया, जिन खातों में पैसा नहीं था उसमें पैसा एकदम कहाँ से आया, बैंको ने नोटबन्दी को विफल करने का प्रयास किया जिससे आज बैंक कर्मचारियों को अच्छे नज़रों से नहीं देखा जा रहा है।कालाधन धन वालों ने हर हथकंडे अपनाये।99.3,%पैसा आना इसी बात का सूचक है की नोटबन्दी सफल रही।कम से कम काला धन देश की अर्थव्यवस्था में शामिल हुआ।आपने देखा होगा रियल एस्टेट market में कितनी गिरावट आयी जिसमे मकान की कीमतें कितनी गिरी ।फ़र्ज़ी कंपनीयां जो गरीबों को दुगना तिगना करने का सपना दिखती थी गरीबों को लूटती थी व् बड़े बड़े लोगों के आयकर को बचाती थी बन्द हुई।आयकरदाताओं की संख्या दुगनी हो गयी कैसे हुई। नोटबन्दी के कारण आयकर चोरी करनेवालों में डर पैदा हुआ।GST को तो विश्व सबसे सफल माना जा रहा है।इसकी विसंगतियों को दूर किया जा रहा है इसे तार्किक बनाया जा रहा है।पेट्रोल उत्पाद का टैक्स structure पहले से बना है मोदी जी ने इसे बाज़ार कीमतों से तय किया, यदि इसे काफी कम किया जाता है तो मुद्रास्फिति बढ़ने का पूरा खतरा है।पहले इसके impact के लिए दुसरे स्रोत पैदा करने होंगे वे मोदी जी अवश्य कर रहे होंगें।2014 में सरकार आने पर पेट्रॉल लगभग 77 रूपये था व् गैस सिलिंडर 700 से ऊपर था उस समय सब्सिडी सरकार गैस एजेंसी को देती थी इसलिए सिलिंडर की कीमते कम थी।सब्सिडी गरीबी दूर करने का स्थाई समाधान नहीं इससे गरीब लोग कम मेहनत करते है, उन्हें सक्षम बनाना आवश्यक है जो प्रयास मोदी जी कर रहे है।विपक्ष जब कोई दल होता है लोकतन्त्र में सरकार की नीतियों का विरोध करना उसका काम होता है, जो 2014 से पहले मोदीजी ने किया आज राहुल गांधी कर रहे है।1947 के बाद कोई भी हथियार भारत में नहीं बनता न हम तकनीक का विकास करते है ,क्यों।देश विदेश में जाकर FDI आयी, उस पैसे जो काम हुआ उससे रोज़गार बढ़ा ,नीजि क्षेत्र में काफी रोज़गार मिला, बेरोज़गारों को ऋण उपलब्ध करवाये गए, इससे भी रोज़गार सृजित हुआ।विदेशों में देश का नाम ऊंचा हुआ,अपनी योजनाए व् उपलब्धीयां गिनाई इससे प्रभावित विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ा ,क्या गलत हुआ।15 लाख किसी के खाते में नहीं आते देश की अर्थव्यवस्था में शामिल होते है।led बल्ब ,9 km रोड या अन्य बचकानी बातें है।आतंकवादीयों की कमर टूट चुकी है,सख्ती से कश्मीर में निपटा जा रहा, देश में कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं घटी,देश के जीडीपी 8.2 हो गयी, राष्ट्रीय राजमार्गों के जाल बिछ गए , देश सुरक्षित है टूरिज़्म को बढ़ावा मिला, महिला सशक्तिकरण के प्रयास सफल हुए, गरीबों के घर गैस चूल्हे पहुंचे, बिहार व् आदिवासी क्षेत्रों तक बिजली पहुंची,फौजियों की वन रैंक वन पेंशन योजना लागू हुई, किसानो का उत्पाद मूल्य दुगना किया गया, गरीबों के घरों तक करोड़ों घर टॉयलेट सुविधा से जुड़े,लोगों को आश्रित नहीं स्वावलम्बी बनाने के प्रयास हुए ये क्या कम है।पाकिस्तान जा कर दोस्ती का सन्देश दिया ताकि की ये न कह पाये की भारत प्रयास नहीं करता, चीन के साथ पूरी कोशिश की की अच्छे सम्बन्ध बने जबकि दुनिया जानती है चीन किसी का नहीं हो सकता।बुलेट ट्रेन जैसी योजना लाई,जो दूरगामी प्रभाव डालेगी।एक तरफ गरीब को खाना उपलब्ध करना व् दूसरा देश को विकास पथ ले जाना ये सयुक्तत प्रयास क्या गलत है।नोटबन्दी से जो भी चोर है चाहे वह बीजेपी या किसी दल का हो कोई भी प्रभावशाली हो या बैंक कर्मी सब पर सख्त कारवाई होनी चाहिये।बाकि पैसे वाले किसी गरीब को ऊंचे पद पर बैठे देखना पसन्द नहीं करते , वे तो गरीब को हमेशा ही गरीब देखना चाहते है।मोदीजी की मुझे सबसे अच्छी बात ये है कि वे माँ भारती के लिए समर्पित,ईमानदार व् योग्य व्यक्ति है पूरा देश ही उनका परिवार है।ओ

राफेल के मार्ग में बाधाऐ

1947 के बाद आज तक के देश के इतिहास पर नज़र दौड़ाता हूँ तो एक बात समझ में नहीं आती की कौन है वो और क्या कारण है जो देश की सेनाओं को कमज़ोर करने में लगा है।हम कोई भी आधुनिक उपकरण तैयार नहीं कर पा रहे है, कोई विदेशी सौदा करते है तो नेता बहुत हो हल्ला करने लग जाते है।देश जब तक सामरिक रूप से ताकतवर नहीं बनेगा तब तक विकास के सारी बात हवा हवाई रहेगी ,भारत गरीबी से कभी भी उभर नहीं पायेगा, चन्द उद्योगपति और भरष्टचारी ही धन धान्य से पूर्ण होंगे ।बोफोर्स सौदे में कॉमिशन दी गयी ये सब को पता है, पर स्वीडन में बनी इन्हीं तोपों के बल पर हमने कारगिल जीता।अब राफेल आधुनिक उपकरणो से सुसज्जित लड़ाकू एयरक्राफ्ट शामिल हो रहा है उसमें विरोध हो रहा है , क्यों? देश कि सेनाएं कमज़ोर बनी रहे पर क्यों, समझ से परे है।एक बार इतना आधुनिक एयरक्राफ्ट आ रहा है उसको आने दो ,वैसे तो मोदी भृष्टाचारी हो सकते है लगभग असम्भव है, पर है भी तो इनको आने  देना चाहिए,  ताकि सेनाओं मैं जान आये जैसे बोफोर्स से आयी थी।कहीं हमारे नेता किसी विदेशी ताकत के हाथों में तो नहीं खेल रही।कहीं ऐसा न हो गन्दी राजनीति देश को समाप्त करके ही न रख दे।भरष्टाचार होगा तो हमारी अदालतें निपट लेगी,देश की सुरक्षा तो थोड़ी मज़बूत होगी।हमारे कई समाचार चैनेल व् पत्रकार  बेहद नकरात्मक भूमिका निभा रहे है।