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मुझे तोड़ लेना वनमाली-- जगदीश बाली


Jagdish Bali
एक बार फ़िर वही हुआ जो घाटी में दशकों से होता आया है। एक बहुत बड़ा फ़िदायीन हमला और देश के लगभग 40 जवान शहीद हो गए। जब कभी भी जम्मू-कश्मीर में ये लगने लगता है कि घाटी में अमन कायम होने वाला है, तभी दहशतगर्द ऐसी घटना अंजाम दे जाते हैं कि हर एक सच्चा हिंदोस्तानी सिहर उठता है। कुछ ही समय पहले जब बारामूला को आतंकी रहित ज़िला घोषित किया गया, तो लगा कि नए साल में घाटी की फ़िज़ाओं में अमनोचैन की खुशबू फ़ैलने वाली है। पर अमनोचैन कैसे हो सकता है जब पड़ोसी देश पाकिस्तान हो, उसकी पनाह में नाचने वाले दहशतगर्द हो और दहशतगर्दों को कवर देने वाले पत्थरबाज़ अपने देश में ही मौजूद हो। पुलवामा ज़िले में स्थित अवंतिपोरा इलाके में जिस तरह से जैश-ए-मौहम्मद के विस्फोटक फ़िदायीन हमले में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस के जवानों को उड़ाया गया, वो घाटी में दहशतगर्दों के इरादों को स्पष्ट करता है। सितंबर 2016 में हुए उरी हमले से भी बड़ा व भयानक ये हमला था। इस आत्मघाति विस्फोट के बाद जो मंज़र पसरा था, उसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं थी। चारों ओर क्षत-विक्षत पड़े शवों को पहचानना तो दूर, शहीद जवानों के अंगों को ढूंड पाना भी असंभव था। आदिल अहमद डार द्वारा कार्यान्वित यह हमला इस बात की बानगी है कि दहशतगर्दों को अमनोचैन व बात-चीत से कोई सरोकार नहीं। वे तो बस कत्लोगारत व दहशत से जन्नत जाना चाहते हैं। इंसानियत खो चुके ऐसे आतंकियों का सफ़ाया होना चाहिए और उनके पनाहगाह पड़ोसी को भी माकूल सबक सिखाया जाए। उनसे बात-चीत का ढिंढोरा पीटना बंद होना चाहिए। अहम सवाल है आखिर कब तक हमारे देश के जवान यूं ही शहीद होते रहेंगे। आतंकियों के सथ रोज़ मौत से रु-ब-रु होते सैनिकों की बदौलत ही हम देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है।
ज़रा अंदाज़ा लगाइए घाटी के उस विरोधपूर्ण और तनाव भरे वातावरण व परिस्थितियों की, जिनमें हमारा फ़ौजी काम कर रहा है। ये स्थिति सचमुच किसी भीषण आपदा से कम तो नहीं है। कश्मीर घाटी में एक ओर तो सैनिक पाकिस्तान से आ रहे गोलों का सामना करते हैं और दूसरी ओर उसके द्वारा भेजे गए आतंकवादियों से लोहा लेते हैं। उस पर ये ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ व ’हिंदोस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगानेवाले पत्थरबाज़ और सियासी चालबाज़। हद तो तब हो जाती है जब सियासी गलियारों से भी ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा गूंज उठता उठाता है। दरअसल ये आवाज़ उन लोगों की है जो नमक तो भारत का खाते हैं, परन्तु उनके दिल में सहानुभूति पाकिस्तान के लिए हैं। ऐसी अलगाववादी व हिंदोस्तान विरोधी सोच रखने वालों के लिए अफ़जल गुरू, कसाव, बुराहन अवानी जैसे लोग शहीद ही होंगे और वे मानव अधिकार की आड़ में ऐसे लोगों को बचाने का भरसक प्रयास करते रहेंगे।
 हम चैन की नींद इसलिए सो पाते हैं क्योंकि सीमा पर वहां वो सैनिक खड़ा है। हम इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वह सैनिक दुश्मन के आ रहे गोलों के सामने चट्टान बन कर ढाल की तरह खड़ा है। पूस की कड़कड़ाती ठंड हो या जेठ की झुलसा देने वाला ताप, वो सैनिक वहां मुस्तैद खड़ा है। हम इसलिए अपने परिवार के साथ आनंदमय और सुखी जीवन का उपभोग कर रहे हैं क्योंकि कोई अपने परिवार, अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने भाई- बहिन, अपने मां-बाप को छोड़ कर सीमा पर तैनात है। हम इसलिए अपनी छुट्टियों व त्यौहारों की खुशियां मना पाते हैं, क्योंकि वहां देश का वो जवान खड़ा है, जिसके लिए कई बार छुट्टियां भी नसीब नहीं होती और मिलती है, तो कोई पता नहीं कब सीमा पर से बुलावा आ जाए। वह फ़ौजी शिकायत भी नहीं करता। वो तो देश के लिए शहीद होने के लिए तैयार रहता है। वह सिर नहीं झुकाता, बल्कि सिर कटाने के लिए तैयार रहता है और कहता है:
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जाए वीर अनेक
   आखिर बर्दाश्त की हद होती है। विभिन्न न्यूज चैनल्ज़ पर वीडियो में साफ देखा जा सक्ता है किस तरह से अलगाववादी सैनिकों को लात-घूंसे मारते है, उनसे छीना झपटी की जाती है और उनकी टोपी तक उछाली जाती है। फिर भी सैनिक सहन करते हैं। फिर पत्थरबाज़ उन पर पत्थरों की बरसात करने लग जाते हैं। ये सब देख कर आम देशवासी का तो खून कौलने लगता है। आखिर सैनिक कब तक खामोश रहे और क्यों? पाक परस्त पत्थरबाजों व उनके चालबाज सियासी आकाओं को समझ लेना चाहिए कि उनके नापाक मनसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।
 आज सीमा पर जवान रोज़ कुर्बान हो रहे हैं और इसके बावजूद भी सियासत के कई मदारी उनके विरुद्ध ऎफ़.आइ.आर दायर करने की बात करते हैं और पत्थर बाज़ों को आम मुआफ़ी का तोहफ़ा प्रदान करते हैं। वे पाकिस्तान के साथ बातचीत की हिमायत जोर शोर से करते हैं। ऐसा कर वे सैनिक के मनोबल को गिराने का घिनौना प्रयास कर रहे हैं और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। जिन सैनिकों की बदौलत देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है, उनके विरुद्ध प्राथमिकि दर्ज़ कर उनके मनोबल को नहीं गिराया जाता, बल्कि उनकी वतन परस्ती के ज़ज़्बे के आगे सिर झुकाया जाता है। भूलना नहीं चाहिए कि जब जवान आक्रोष में आता है, तो वह ऐसे शक्तियों को छिन्न-भिन्न कर देता है।
 वक्त आ गया है कि आतंकियो और उन्हें सहायता देने वाले पत्थरबाज़ों के साथ शून्य सहनशीलता की नीति को अपनाया जाए क्योंकि ये  न प्रेम की भाषा जानते हैं न मोहब्बत के गुलाब। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उचित ही कहा है:
छीनता हो स्वत्व कोई, और तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है
 आज देश के हर फौजी से सच्चा देशवासी कह रहा है – फौजी! तुम्हारे कारण ये देश जिंदाबाद है। इसलिए तुम हमेशा ज़िंदाबाद हो और तुम्हें ये देश जय हिंद कहता है।

सेना पर स्तब्ध करने वाला पुलवामा हमला

देश पर पुलवामा में इतना बड़ा हमला आतंकीयों ने किया है देश स्तब्ध हो कर रह गया है, पूरे देशवासियों का  खून खौल रहा है सभी केवल बदला चाहते है 40 के बदले सभी आतंकियो का सफाया।पर ऐसे में कई छोटे बड़े नेता उलूल ज़लूल बयानबाज़ी कर रहे है।1947 से हम पाकिस्तान पर अपनी विदेश नीति को देख रहे है जो तुष्टिकरण के अलावा कुछ नहीं रही।युद्ध हुए क्या पाकिस्तान सुधरा नहीं, कश्मीर पर उसकी नीति में कोई बदलाव आया बिल्कुल नही।अटल जी की लाहौर यात्रा का जवाब कारगिल रहा।अभी देश का सौभाग्य है कि मोदी जैसा योग्य नेतृत्व मिला है पर भी विदेश नीति को कमज़ोर करने की कोशिश करने में लगे हुए है।अब देश ऐसे लोगों को कभी माफ नहीं करेगा।अब में मोदी जी पाकिस्तान क्यों गये पूरे देश को स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मोदी जी देश के सरकार के प्रमुख है उनका पहला कार्य किसी भी देश को संदेश देना था कि हम दोस्ती चाहते है हम बड़े है हम पहल करते है कि क्षेत्र में हम शांति चाहते हमने आगे बढ़ कर पहल की आप भी आगे बढें और आंतरिक मुद्दे व कश्मीर समस्या का समाधान करें, मोदी के पाकिस्तान जाने के कदम को सराहनीय कदम माना जाना चाहिये।जब नकारात्मक जवाब मिला तो आतंकीयों के विरुद्ध जीरो टोलरेंस की नीति शुरू हुई जो अब भी जारी है।आतंकीयों को लगभग समाप्त कर दिया गया पाकिस्तान भी लगभग हताश हो गया है, आतंकीयों के सारे कमांडर मारे जा चुके है कोई कमांडर बनने को तैयार नही।मोदी जी ने ठोस नीति अपनायी जो प्रशंसनीय है।विरोधी दल सेना की कार्रवाई को प्रश्नचिन्ह लगाती है सेना के अफसरों को गाली देती है निंदनीय है।लोकल नेताओं की वजह से काफिलों के साथ लोकल वाहन की आवाजाही को मंजूरी देना घातक साबित हुआ।गुलाम नबी आजाद, फारूख उमर व महबूबा मुफ्ती जैसे लोग इस के लिये जिमेवार है जिनकी वजह से ये मंज़ूरी मिली थी।हम इन लोगों के व्यवहार से शर्मिंदा है।मोदी जी से अब केवल पूरा देश आप से चाहता है कि सब आतंकी कैम्प तबाह हो हाफिज सईद अजर महमूद को मौत दी जाये व पाकिस्तान को हर दृष्टि से तबाह कर दिया जाये।मोदी जी आप की सरकार आये या न आये पर सब समाप्त कर दो यही देश आप से चाहता है।जवानों की शहादत खाली न जाने पाये, वरना देश आप को माफ नहीं करेंगे।देश उन दलों को तो कभी माफ नहीं करेगा।

रघुराम राजन व मनमोहन सिंह जी बड़े अर्थशास्री है।मनमोहन सिंह जी को राजनीति में नरसिंह राव जी लाये वो केवल इसलिये ताकि एक योग्य ईमानदार व योग्य अर्थशास्री देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सके और उन्होंने अपना काम भी ईमानदारी से किया।पर प्रधानमंत्री बनने के बाद राजनीति को अपना लक्ष्य चुनना शायद मनमोहन सिंह जी की बहुत बड़ी भूल थी।उन्होंने बहुत कमाया लेकिन लगभग आधा उन्होंने ने इस पद को संभालकर गंवा दिया।अब उनका प्रयोग केवल अपना उल्लू साधने के लिये किया जाता है।नोट बंदी व जी एस टी पर इन दोनों यानी मनमोहन सिंह जी व रघुराम राजन के ब्यान सुने कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उनके बयान अर्थशास्री के नाते थे, पर वे भूल जाते है कि उनका कार्य किसी दल का कल्याण नहीं अपितु देश का भला होना चाहिए।राजनीति में लिए गए मोदीजी के ये दो कठोर फैसले देश की अर्थव्यवस्था को आम लोगों की अर्थव्यवस्था बनाने में सहायक होंगे।जी एस टी जहां देश में एकल टैक्स व्यस्था स्थापित करने में सहायक होगी और व्यापारियों की लूट से आम आदमी को छुटकारा मिलेगा वहीं नोट बंदी एक ऐसा कदम था जिसकी बहुत आवश्यकता थी, सब चाहते थे कि काले धन को बंद तिजोरी से कैसे बाहर लाये, जब तक मुद्रा प्रवाह सही नही होता देश की अर्थव्यवस्था कमज़ोर होती है।काले धन वाले इसको देश विरोधी गतिविधियों पर खर्च करते है जिससे आतंकवाद व नक्सलवाद बढ़ता है, अमीर और अमीर व ग़रीब और गरीब होता है।काले धन वाले बिना किसी कार्य के पंजीकृत कंपनियों के द्वारा काला धन सफेद करती है कई व्यापारी कृषि भूमि खरीद कर बिना टैक्स चुकाए अपना धन सफेद करते है।सारा धन प्रवाह में आया या 99% आया ये देश के लिए शुभ संकेत है यही छिपा हुआ पैसा तो देश के मुद्रा प्रवाह में शामिल करना था।लाखो फ़र्ज़ी कंपनियां बन्द हो गई लाखों लाख नए कर दाता बढ़ गए, ये देश के लिए अच्छा संकेत है क्योंकि ये धन केवल गरीबों के विकास के लिए खर्च होगा।रघुराम राजन शायद किसी दल में शामिल होना चाहते है तभी नोटबंदी व जी एस टी को विफल बता रहे है।देश हित मोदी जी का इतने कठोर कदम जिसमें उनका राजनीतिक भविष्य दांव पर लग सकता है उठाना इतना साहसी है जितनी तारीफ करें कम होगी।बोलने वाले बोलते है बोले पर देश पर राज अब वही व्यक्ति कर सकता है जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र का सोचे।वैसे इन सब से प्रभवित बीजेपी के लोग व वोटर ज़्यादा हुए है।अब अर्थव्यवस्था 7.7%की दर से बढ़ने लगी वो अब रुकने वाली नहीं , मंदी का दौर समाप्त हो चुका है अब केवल एक सुनहरी भारत का निर्माण होगा।इससे कुछ लोगों की जाने गई कुछ प्रभावित हुए उन पर राजनीति नही होनी चाहिए कृतज्ञ राष्ट्र उनकी नेक कुर्बानी को हमेशा याद रखेगा।

राफेल सौदे की आवश्यकता

दुःख होता है ये जानकर की अपने लोगों की नासमझी व् नादानी के कारण विदेशी आक्रांता यहां पर राज करते रहे तथाकथित देश के विरोधी अपने ही लोगों से खिलवाड़ करते रहे और देश की मासूम और असहाय जनता उनको अपना मसीहा मानती रही।ये सिलसिला आज भी जारी है  फूट डालो और शासन करो की नीति ने देश के विकास को बाधित किया है।राफेल डील को रद्द करने की पूरी कोशिश हो रही है ताकि देश की सेना को मज़बूती न मिल पाये,जो कार्य पाकिस्तान नहीं कर पा रहा है वह कार्य देश के राजनीतिक दल कर रहे है।जितना पैसा नेताओं ने भ्र्ष्टाचार करके खाया है राफेल डील तो उसका .1% भी नहीं है।राफेल जैसे अतिआधुनिक विमान के साथ साथ अन्य अस्त्र शस्त्र से हमारी सेनाएं शीघ्र ही सुसज्जित होनी चाहिए।देश तब तक ताकतवर नहीं बन सकता जब तक उसकी सीमाएं सुरक्षित न हो।राफेल डील को रद्द करने जो प्रयास हो रहे है वो देश के लिए खतरनाक व् आत्मघाती है।सामरिक सौदे के विरोधी सभी दलों को देश की जनता को रिजेक्ट कर देना चाहिए यही देश हित में होगा।मोदी जी भारतमाता के वो सपूत है जो कभी दलाली नहीं खा सकता।बाकि किसी न किसी कंपनी ने कॉन्ट्रैक्ट लेना ही था।ऐसा कदापि सम्भव नहीं की मोदी जी 526 करोड़ की चीज 1600 करोड़ में खरीदेंगे।इतना तो मोदी को जाननेवाला कोई नासमझ भी कह सकता है।किसी भी हालत में मोदी जी को इन सामरिक सौदों को  करने में देरी नहीं करनी चाहिए,भारत की जनता अब केवल उसको स्वीकार करेगी जो ज़मीन पर कुछ करके दिखायेगा न की विरोध ही करता रहेगा।

मोदी सरकार के फैसले

बेहद दुःखद बात है जी एक राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री को कुछ पढ़े लिखे भी समझ नहीं पा रहे है, ये केवल हमारी शिक्षाप्रणाली का असर है।नोटबन्दी पूरी तरह सफल रही, 2 से 3 लाख फ़र्ज़ी कंपनिया बन्द हुई,नक्सलवाद लगभग समाप्त हुआ, अब कुछ लोग 2000 के नोट इक्कठे करके उनको पुनः पहुंचा रहे है, आतंकवाद की कमर टूट गयी, घर में रखा पैसा सर्कुलेशन में आया,यदि 10 करोड़ लोग 5000 भी घर में रखते है तो ये 5 खरब बनते है, जो केवल ब्लैक मनी ही कहा जायेगा ये पैसा बैंकों में आया अब गरीबों के काम आ रहा है, लाखों करोड़ पकड़ा गया वह देश की अर्थव्यवस्था में शामिल हुआ।लोगों ने कहा जा रहा की गरीब लोगों के द्वारा बैंकों में जमा किया और इन गरीबों को लाइन में खड़ा किया, जिन खातों में पैसा नहीं था उसमें पैसा एकदम कहाँ से आया, बैंको ने नोटबन्दी को विफल करने का प्रयास किया जिससे आज बैंक कर्मचारियों को अच्छे नज़रों से नहीं देखा जा रहा है।कालाधन धन वालों ने हर हथकंडे अपनाये।99.3,%पैसा आना इसी बात का सूचक है की नोटबन्दी सफल रही।कम से कम काला धन देश की अर्थव्यवस्था में शामिल हुआ।आपने देखा होगा रियल एस्टेट market में कितनी गिरावट आयी जिसमे मकान की कीमतें कितनी गिरी ।फ़र्ज़ी कंपनीयां जो गरीबों को दुगना तिगना करने का सपना दिखती थी गरीबों को लूटती थी व् बड़े बड़े लोगों के आयकर को बचाती थी बन्द हुई।आयकरदाताओं की संख्या दुगनी हो गयी कैसे हुई। नोटबन्दी के कारण आयकर चोरी करनेवालों में डर पैदा हुआ।GST को तो विश्व सबसे सफल माना जा रहा है।इसकी विसंगतियों को दूर किया जा रहा है इसे तार्किक बनाया जा रहा है।पेट्रोल उत्पाद का टैक्स structure पहले से बना है मोदी जी ने इसे बाज़ार कीमतों से तय किया, यदि इसे काफी कम किया जाता है तो मुद्रास्फिति बढ़ने का पूरा खतरा है।पहले इसके impact के लिए दुसरे स्रोत पैदा करने होंगे वे मोदी जी अवश्य कर रहे होंगें।2014 में सरकार आने पर पेट्रॉल लगभग 77 रूपये था व् गैस सिलिंडर 700 से ऊपर था उस समय सब्सिडी सरकार गैस एजेंसी को देती थी इसलिए सिलिंडर की कीमते कम थी।सब्सिडी गरीबी दूर करने का स्थाई समाधान नहीं इससे गरीब लोग कम मेहनत करते है, उन्हें सक्षम बनाना आवश्यक है जो प्रयास मोदी जी कर रहे है।विपक्ष जब कोई दल होता है लोकतन्त्र में सरकार की नीतियों का विरोध करना उसका काम होता है, जो 2014 से पहले मोदीजी ने किया आज राहुल गांधी कर रहे है।1947 के बाद कोई भी हथियार भारत में नहीं बनता न हम तकनीक का विकास करते है ,क्यों।देश विदेश में जाकर FDI आयी, उस पैसे जो काम हुआ उससे रोज़गार बढ़ा ,नीजि क्षेत्र में काफी रोज़गार मिला, बेरोज़गारों को ऋण उपलब्ध करवाये गए, इससे भी रोज़गार सृजित हुआ।विदेशों में देश का नाम ऊंचा हुआ,अपनी योजनाए व् उपलब्धीयां गिनाई इससे प्रभावित विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ा ,क्या गलत हुआ।15 लाख किसी के खाते में नहीं आते देश की अर्थव्यवस्था में शामिल होते है।led बल्ब ,9 km रोड या अन्य बचकानी बातें है।आतंकवादीयों की कमर टूट चुकी है,सख्ती से कश्मीर में निपटा जा रहा, देश में कोई बड़ी आतंकवादी घटना नहीं घटी,देश के जीडीपी 8.2 हो गयी, राष्ट्रीय राजमार्गों के जाल बिछ गए , देश सुरक्षित है टूरिज़्म को बढ़ावा मिला, महिला सशक्तिकरण के प्रयास सफल हुए, गरीबों के घर गैस चूल्हे पहुंचे, बिहार व् आदिवासी क्षेत्रों तक बिजली पहुंची,फौजियों की वन रैंक वन पेंशन योजना लागू हुई, किसानो का उत्पाद मूल्य दुगना किया गया, गरीबों के घरों तक करोड़ों घर टॉयलेट सुविधा से जुड़े,लोगों को आश्रित नहीं स्वावलम्बी बनाने के प्रयास हुए ये क्या कम है।पाकिस्तान जा कर दोस्ती का सन्देश दिया ताकि की ये न कह पाये की भारत प्रयास नहीं करता, चीन के साथ पूरी कोशिश की की अच्छे सम्बन्ध बने जबकि दुनिया जानती है चीन किसी का नहीं हो सकता।बुलेट ट्रेन जैसी योजना लाई,जो दूरगामी प्रभाव डालेगी।एक तरफ गरीब को खाना उपलब्ध करना व् दूसरा देश को विकास पथ ले जाना ये सयुक्तत प्रयास क्या गलत है।नोटबन्दी से जो भी चोर है चाहे वह बीजेपी या किसी दल का हो कोई भी प्रभावशाली हो या बैंक कर्मी सब पर सख्त कारवाई होनी चाहिये।बाकि पैसे वाले किसी गरीब को ऊंचे पद पर बैठे देखना पसन्द नहीं करते , वे तो गरीब को हमेशा ही गरीब देखना चाहते है।मोदीजी की मुझे सबसे अच्छी बात ये है कि वे माँ भारती के लिए समर्पित,ईमानदार व् योग्य व्यक्ति है पूरा देश ही उनका परिवार है।ओ

राफेल के मार्ग में बाधाऐ

1947 के बाद आज तक के देश के इतिहास पर नज़र दौड़ाता हूँ तो एक बात समझ में नहीं आती की कौन है वो और क्या कारण है जो देश की सेनाओं को कमज़ोर करने में लगा है।हम कोई भी आधुनिक उपकरण तैयार नहीं कर पा रहे है, कोई विदेशी सौदा करते है तो नेता बहुत हो हल्ला करने लग जाते है।देश जब तक सामरिक रूप से ताकतवर नहीं बनेगा तब तक विकास के सारी बात हवा हवाई रहेगी ,भारत गरीबी से कभी भी उभर नहीं पायेगा, चन्द उद्योगपति और भरष्टचारी ही धन धान्य से पूर्ण होंगे ।बोफोर्स सौदे में कॉमिशन दी गयी ये सब को पता है, पर स्वीडन में बनी इन्हीं तोपों के बल पर हमने कारगिल जीता।अब राफेल आधुनिक उपकरणो से सुसज्जित लड़ाकू एयरक्राफ्ट शामिल हो रहा है उसमें विरोध हो रहा है , क्यों? देश कि सेनाएं कमज़ोर बनी रहे पर क्यों, समझ से परे है।एक बार इतना आधुनिक एयरक्राफ्ट आ रहा है उसको आने दो ,वैसे तो मोदी भृष्टाचारी हो सकते है लगभग असम्भव है, पर है भी तो इनको आने  देना चाहिए,  ताकि सेनाओं मैं जान आये जैसे बोफोर्स से आयी थी।कहीं हमारे नेता किसी विदेशी ताकत के हाथों में तो नहीं खेल रही।कहीं ऐसा न हो गन्दी राजनीति देश को समाप्त करके ही न रख दे।भरष्टाचार होगा तो हमारी अदालतें निपट लेगी,देश की सुरक्षा तो थोड़ी मज़बूत होगी।हमारे कई समाचार चैनेल व् पत्रकार  बेहद नकरात्मक भूमिका निभा रहे है।

फ़ौजी! तुम ज़िदाबाद, तुम्हें सलाम... जगदीश बाली

फ़ौजी! तुम ज़िदाबाद, तुम्हें सलाम...

 वो घड़ी सचमुच दिल को मुसर्रत व आत्मा को सकून देने वाली थी जब भारत की सर्वोच्च अदालत ने जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा हाल में हुई शोपियां गोलीबारी के मामले में 10 गढ़वाल राइफल्स के मेजर आदित्य कुमार के खिलाफ दायर प्राथमिकी पर रोक लगा दी। यद्यपि यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले में केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार क्या जवाब देती हैं, परन्तु अदालत का यह आदेश उन लोगों के लिए एक उचित और करारा जवाब है जो भारतीय सैनिकों का अपमान करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। मेजर आदित्य के पिता लेफ्टिनेंट कर्नल कर्मवीर सिंह (रिटायर्ड), जिन्होंने कर्गिल युद्ध में हिस्सा लिया था, ने सेना के खिलाफ दायर प्राथमिकी के खिलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटा कर एक उचित और प्रशंसनीय कदम उठाया है। उधर सेना अधिकारियों के तीन बेटों ने कश्मीर में सेना के साथ हो रहे बर्ताव को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय मानव आयोग में शिकायत दर्ज़ कर ये सवाल उठाया है कि कश्मीर घाटी में सेना के सम्मान और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए सरकारें क्या कर रहीं हैं। एक सच्चा देशवासी इन बेटों के दर्द को महसूस कर सकता है और उनके इस कदम की प्रशंसा कर रहा है। ये इस बात का द्योतक है कि भारतीय सैनिकों की सहिष्णुता की आड़ में पाकिस्तान परस्त और भारत विरोधी ताकतें उनका उत्पीड़न नहीं कर सकती। साथ ही ये मानव अधिकार का डंका पीट कर पत्थरबाज़ों की पैरवी करने वालों के मुंह पर एक ज़ोर का तमाचा है। जिन सैनिकों की बदौलत देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है, उनके विरुद्ध प्राथमिकि दर्ज़ कर उनके मनोबल को नहीं गिराया जाता, बल्कि उनकी वतन परस्ती के ज़ज़्बे के आगे सिर झुकाया जाता है।
 हम चैन की नींद इसलिए सो पाते हैं क्योंकि सीमा पर वहां वो सैनिक खड़ा है। हम इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वह सैनिक दुश्मन के आ रहे गोलों के सामने चट्टान बन कर ढाल की तरह खड़ा है। पूस की कड़कड़ाती ठंड हो या जेठ की झुलसा देने वाला ताप, वो सैनिक वहां मुस्तैद खड़ा है। सियासी चालबाज़ों को पत्थरबाज़ों के लिए तो दया उमड़ आती है, पर क्या सैनिक इंसान नहीं? क्या उन्हें आत्मरक्षा का भी अधिकार नहीं? हम इसलिए अपने परिवार के साथ आनंदमय और सुखी जीवन का उपभोग कर रहे हैं क्योंकि कोई अपने परिवार, अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने भाई- बहिन, अपने मां-बाप को छोड़ कर सीमा पर तैनात है। हम इसलिए अपनी छुट्टियों व त्यौहारों की खुशियां मना पाते हैं, क्योंकि वहां देश का वो जवान खड़ा है, जिसके लिए कई बार छुट्टियां भी नसीब नहीं होती और मिलती है, तो कोई पता नहीं कब सीमा पर से बुलावा आ जाए। वह फ़ौजी शिकायत भी नहीं करता। वो तो देश के लिए शहीद होने के लिए तैयार रहता है। वह सिर नहीं झुकाता, बल्कि सिर कटाने के लिए तैयार रहता है और कहता है:
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक 
मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जाए वीर अनेक

 ज़रा अंदाज़ा लगाइए घाटी के उस विरोधपूर्ण और तनाव भरे वातावरण व परिस्थितियों की, जिनमें हमारा फ़ौजी काम कर रहा है। ये स्थिति सचमुच किसी भीषण आपदा से कम तो नहीं है। कश्मीर घाटी में एक ओर तो सैनिक पाकिस्तान से आ रहे गोलों का सामना करते हैं और दूसरी ओर उसके द्वारा भेजे गए आतंकवादियों से लोहा लेते हैं। उस पर ये 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' व 'हिंदोस्तान मुर्दाबाद' का नारा लगानेवाले पत्थरबाज़ और सियासी चालबाज़। इन पत्थरबाज़ों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हो जाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब सियासी गलियारों से से भी 'पाकिस्तान ज़िंदाबाद' का नारा गूंज उठता उठाता है। दरअसल ये आवाज़ उन लोगों की है जो नमक तो भारत का खाते हैं, परन्तु उनके दिल में सहानुभूति पाकिस्तान के लिए हैं। ऐसी अलगाववादी व हिंदोस्तान विरोधी सोच रखने वालों के लिए अफ़जल गुरू, कसाव, बुराहन अवानी जैसे लोग शहीद ही होंगे हैं और वे मानव अधिकार की आड़ में ऐसे लोगों को बचाने का भरसक प्रयास करते रहेंगे।
   पत्थरबाज़ों और आतंकवादियों के लिए मानवाधिकारों की बात करने वालो! उन सैनिकों के भी के भी मानवाधिकार है जिनकी गाड़ियों को तोड़ने के लिए तुम आमादा हो जाते हो, घेर कर जिनकी जान लेने पर तुम उतारू हो जाते हो। ऐसी स्थिती में क्या सैनिक अपनी सुरक्षा भी न करे? अगर पत्थरबाज़ों को आम माफ़ी दे कर छोड़ दिया जाए और अपनी रक्षा में हथियार उठाने पर सैनिक के विरुद्ध प्राथमिकि दायर की जाए, तो घाटी के ऐसे शासन और प्रशासन पर शक और भी पुख्ता हो जाता है।
मैं ये तो नहीं कह रहा हूं की सैनिकों को हर किसी पर गोलियां चलाने का अधिकार है, परन्तु अपनी रक्षा करने का स्वत्व तो भगवान ने हर किसी इंसान को दिया है और संविधान भी इसे मौलिक अधिकार के रुप में हमारे देश के नागरिक को देता है और हमारा फौजी भी ऐसा ही नागरिक है। देश की रक्षा का कर्तव्य निभाते हुए उसे आत्मरक्षा का पूरा हक है। आखिर बर्दाश्त की हद होती है। विभिन्न न्यूज चैनल्ज़ पर वीडियो में साफ देखा जा सक्ता है किस तरह से अलगाववादी सैनिकों को लात-घूंसे मारते है, उनसे छीना झपटी की जाती है और उनकी टोपी तक उछाली जाती है। फिर भी सैनिक सहन करते हैं। फिर पत्थरबाज़ उन पर पत्थरों की बरसात करने लग जाते हैं। ये सब देख कर आम देशवासी का तो खून कौलने लगता है, तो  आखिर सैनिक कब तक खामोश रहे और क्यों? पाक परस्त पत्थरबाजों व उनके चालबाज सियासी आकाओं को समझ लेना चाहिए कि उनके नापाक मनसूबे कभी पूरे नहीं होंगे। 
     राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां याद आ रही है:
                छीनता हो स्वत्व कोई, और तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है
                 पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है 
             देश के हर फौजी से सच्चा देशवासी कह रहा है – फौजी! तुम्हारे कारण ये देश जिंदाबाद है । इसलिए तुम्हें सलाम!

इन दरिंदों को सरेआम सज़ा-ए-मौत दे दो मी लॉर्ड


जगदीश बाली
9418009808
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 आज से लगभग पांच वर्ष पहले 23वर्षीय निर्भया से सामूहिक दुष्कर्म और उसकी लोमहर्षक हत्या से दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरा देश दहल उठा था और मोमबत्तियां जलाते हुए लोग आंदोलन के रूप में सड़कों पर उतर आए थे। इसी तरह हिमाचल प्रदेश के कोटखाई में स्कूल की एक छात्रा के साथ पिछले वर्ष ऐसा ही दिल दहला देने वाला सामूहिक दुराचार और हत्या का मामला सामने आया। उस समय भी लोग सड़कों पर उतर आए थे। इन दो घटनाओं को याद कर अब ज़रा कल्पना कीजिए - आठ माह की बच्ची की, उसके मासूम चेहरे की, उसकी किलकारियों की और उसकी मुस्कुराहट की। क्या आप इस मासूम फूल सी बच्ची के बालात्कार की घटना के बारे में सोच भी सकते हैं? परन्तु जो कुछ हो रहा है वो यही ब्यां करता है कि मालूम नहीं इंसान कितने नीचे गिर सकता है!  ये समझ से परे है कि इंसान के रूप में दरिंदे हैवानियत की किस हद तक पहुंच सकते हैं। 
 मैं बात कर रहा हूं चंद रोज़ पहले की उस घटना की जिसकी खबर सुनकर पूरा देश एक बार फिर सकते में आ गया और इंसानियत एक बार फिर खून के आंसू रोई। हमारे देश की राजधानी व भारत का दिल, दिल्ली ये सुनकर दहल उठी कि यहां की शकूरबस्ती क्षेत्र में आठ महीने की मासूम बच्ची के साथ बर्बरता पूर्ण दुष्कर्म किया गया है। ये सुन कर रौंगटे खड़े हो गए और शरीर का रोम रोम थर्रा उठा कि इस वहशियाना दुष्कर्म को अंजाम देने वाला कोई और नहीं बल्कि उस बच्ची के ताऊ का सताईस वर्षीय बेटा है। इस खबर के बारे में जब सुना तो कानों पर भरोसा न हुआ, इस खबर को जब पढ़ा तो आंखो पर भी शक होने लगा। जब न्यूज़ चैनल्ज़ पर देखा, तो विश्वास करना ही पड़ा। इस खबर ने दिल को अंदर तक दहला दिया, मन और मस्तिष्क विचलित हो उठे। तीन घंटे के ऑपरेशन के दौरान अस्पताल के आई.सी.यू.से असहनीय और अनहद दर्द से जूझती असहाय बच्ची की चीखों का एहसास ज़रा सी इंसानी भावना रखने वाला कोई भी इंसान सहज़ ही कर सकता है। उस बच्ची की पीड़ा के बारे में सोचते-सोचते मेरा ध्यान खुशी से उछलती कूदती अपनी बेटी की ओर गया। कहीं इसके साथ भी कभी ऐसा हो गया...। ज़रा सोचिए - आठ महीने की बेटी के साथ ऐसा बर्बरतापूर्ण दुष्कर्म! फिर सोचिए अगर ऐसा आपकी बेटी के साथ हो!  या खुदा... 
 चंडीगढ़ की उस 10 वर्षीय बच्ची के बारे में भी सोचिए जिसे उसके ही चाचा के दुराचार ने मां बना दिया और इस मासूम को पता भी नहीं उसके साथ क्या हुआ है और मां बनना क्या होता है। खिलौनों से खेलने वाली10 वर्षीय मासूम बच्ची क्या जानें उसके साथ क्या हुआ है। ऐसी दरिंदगी देख क्या आपका मन ये चीख-चीख कर नहीं कहता - इन दरिंदों को सरेआम चौराहे पर सज़ा-ए-मौत दे दो माई लॉर्ड... ? 
  सितंबर 2016 में दिल्ली में ही एक मज़दूर ने 11 महीने की बच्ची से दुराचार किया और उसे मरा हुआ समझ कर झाड़ियों में छोड़ दिया। कुछ समय पहले हरियाणा के पानीपत क्षेत्र में 11 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया, उसका गला घोंट दिया गया और दरिंदे यहां भी नहीं रुके और गला घौंटने के बाद भी दुष्कर्म करते रहे। हरियाणा के ही ज़िंद में 15 वर्षीय बालिका के साथ दुष्कर्म करने के बाद बेरहमी से मार दिया गया।  पिछले वर्ष पश्चिम बंगाल के माल्दा ज़िले के एक गांव में 9 वर्षीय मासूम से लगातार तीन दिन तक दुराचार किया गया और फिर उसे एक सुनसान इमारत में लटका दिया गया। इसी राज्य में कुछ महीने पहले एक दरिंदे ने 13 वर्षीय बालिका को दुष्कर्म करने के बाद मार दिया। देश की राजधानी दिल्ली में एक 60 वर्षीय ने दो नाबालिग बच्चियों के साथ दुष्कर्म किया और उन्हें 5 रूपए देकर घटना के बारे में किसी से बात ना करने को कहा। ये वो मामले हैं जिनमें नबालिग बच्चियां दरिंदगी का शिकार हुई है। इसके अलावा महिलाओं से बलात्कार के मामले तो और भी अधिक है।
 निर्भया दुराचार मामले को पांच साल से अधिक हो गए हैं। उस समय इस अपराध के लिए उठी आम जन की आवज़ से लगा था कि शायद तसवीर बदलेगी और सख्त कानून बनेगा, परन्तु बलात्कार की घटनाएं बढ़ती ही जा रही हैं। कानून कह रहा है कि सब कुछ कानून के अनुसार होगा। बीते पांच वर्षों पर नज़र दौड़ाई जाए, तो बलात्कार के मामलों में भारी वृद्धि हो रही है। देश के तमाम कोनों से आए दिन सामूहिक बलात्कार की खबरें आती ही रहती हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन नहीं गुजरता हो, जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म की खबर ना आती हो। नैश्नल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के अनुसार 2015 में देश भर में बलात्कार के 34000 से ज्यादा मामले सामने आए, जबकि 2016 में 34600 मामले दर्ज़ किए गए। 2015 में 10854 मामले बालदुराचार के दर्ज़ किए गए जो बढ़ कर 2016 में 19765 तक पहुंच गए अर्थात 82 प्रतिशत की सैलाना वृद्धि। ये आंकड़े एक अंधेरी और भयावह तस्वीर पेश करते हैं। हमारे देश की राजधानी दिल्ली तो महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक होती जा रही है। थॉम्पसन रॉयटर्स फॉउंडेशन ने जून-जुलाई 2017 के बीच दुनिया के 19 महानगरों में एक सर्वे कराया जिसमें सामने आया है कि दिल्ली महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक महानगर है। 
 चंद कामयाब महिलाओं की उपलब्धियों को गिना कर हम बाकी बहू-बेटियों की दुर्दशा पर पर्दा डालकर सच्चाई से नहीं भाग सकते। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ - ये नारा तो अच्छा है, परन्तु क्या हम बेटियों को महफ़ूज़ रख पा रहे हैं? अगर बेटियां महफ़ूज़ ही नहीं, तो फिर पढ़ाएंगे किसे? खैर ज़िम्मेदारी केवल सरकार की नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी हमारी, आपकी और समाज की भी बनती है। आज किसी और की बेटी दरिंदगी का शिकार हुई है, कल मेरी और आपकी बेटी भी तो हो सकती है। इसलिए ऐसे दरिंदों का समाजिक बहिषकार कीजिए। इन्हें पकड़वाने में कानून का साथ दीजिए। और हां, ये दरिंदे बहुतायत आपके आस-पास हो सकते हैं। एन.सी.आर.बी ने खुलासा किया है कि  2015 की जानकारी के अनुसार 95 प्रतिशत बलात्कार जान पहचान वालों ने किए। इनमे से 27 प्रतिशत पड़ोसियों ने और 9 प्रतिशत परिवार के नज़दीकि सदस्य या रिश्तेदारों ने किए। इसलिए चौकन्ने रहिए। कहीं कोई दरिंदा अपके आस-पास आपकी बहू बेटियों पर बुरी नज़र तो नहीं रख रहा । हो सकता है वह घिनौनी हरकत करने की फिराक में हो। हर बेटी के मां-बाप को चौकन्ने रहने की सलाह दूंगा। समाज के पढ़े-लिखे ज़िम्मेदार लोगों को बाल दुराचार के विरुद्ध मशालें उठा कर एक जन अंदोलन करना चाहिए। सरकारों पर निर्भर मत रहिए। सरकारें तो आती-जाती रहेंगी, मगर आपकी बेटी की मासूमियत, अस्मत और स्वाभिमान पर लगे वो धब्बे शायद कभी न मिटे।   
हमें नहीं मालूम कानून की दलील क्या है, मगर एक बेटी के मां-बाप की तो यही इल्तज़ा है - इन दरिंदों को सरेआम सज़ा-ए-मौत दे दो माई लॉर्ड...

भाषा में फूहड़ता

कुछ रोज़ पहले रोज़ाना की तरह टहल रहा था | टहलते टहलते एक खुले मैदान के पास से गुज़रना हुआ| वहां कुछ बच्चे खेल रहे थे |  तभी एक छोटा सा बच्चा अपनी बहिन के साथ झगड़ रहा था | बचे की उम्र कोई छः साल और उसकी बहिन की उम्र तकरीबन आठ साल प्रतीत हो रही थी | झगड़ते  झगड़ते अचानक बच्चे ने अपनी बहिन को धक्का दिया और बोला - 'साली मा... लौ... | ' बाच्ची तो गिरते गिरते बची|, पर मैं उस नन्हें से बालक के मुंह से इन शब्दों को सुन कर मैं हक्का बक्का रह गया |  मैंने बच्चे को डांटते हुए कहा -'गंदी बात करता है| ऐसा भी कोई बोलता है क्या?' बच्चा वहां से भागता हुआ बोला : 'जब पापा मम्मी से लड़ते हैं, तो मम्मी को ऐसा ही बोलते हैं|'  ज़ाहिर है बच्चे ने ये भाषा अपने घर मेम ही सीखी होगी | इसमें बच्चे का दोष नहीं क्योकिं जन्म लेते ही वो भाषा ले कर तो नहीं आया न?
अकसर  बच्चे बड़ों के द्वारा इस्तेमाल की गयी भाषा को बड़ी जल्दी  अपना लेते हैं| दरअसल हमारी रोज़ाना की भाषा में फूहड़पन और अभद्रता आ गयी है| पैंट कोट टाई  पहने हुए दो जेंटलमैन यार जब मिलते हैं तो उनके सम्बोधन मैं भी भाषा का बिगड़ा हुआ मिज़ाज़ झलकता है| एक कहता है -'और भई माँ... | दूसरा जवाब यूँ  देता है-'ठीक है भई पैं ... |' आत्मीयता मेँ वे भूल जाते हैं की उनके आस पास भी दुनिया बसती है | अगर निकट कोई बच्चा हो तो समझ लीजिए ये शब्द तो जुकाम  की तरह एक बच्चे से सुसरे को और फिर पता नहीं कहां कहा तक पहुंच जाऐंगे|
इस तरह की भाषा से आप विद्यालयों मेँ भी रु बू रु हो सकते हैं| मज़े की बात ये है कि छात्र ताबड़तोड़ इन
एक्सपलेटिवज़ का इस्तेमाल करते हैं| भाषा का ज्ञान न होना अलग बात है, परन्तु फूहड़ और अभद्र भाषा का नियमित तौर पर इस्तेमाल समाज में बढ़  रहे छिछोरेपन व विकृत  मानसिकता को दर्शाता है| जेम्ज़ रोज़ोफ है - 'भाषा की फूहड़ता मदिरा की तरह होता है, जिसका इस्तेमाल एक ख़ास समूह मेँ ख़ास समय पर ही प्रयुक्त की जा सकते है|   


Vulgarity is like a fine wine: it should only be uncorked on a special occasion, and then only shared with the right group of people.” 
― James Rozoff