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शिक्षक दिवस का महत्व और राष्ट्र का भविष्य

शिक्षक दिवस पर हार्दिक बधाई।
शिक्षक होना अपने आप में गर्व की बात है क्योंकि शिक्षक गुरु होता है सभी को अंधकार से प्रकाश की तरफ लाता है।हर कार्य को करने के लिये गुरु की आवश्यकता होती है।प्रारम्भिक शिक्षा से शुरू करके उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक तो आवश्यकता रहती ही है अपितु हर तकनीकी ज्ञान प्राप्त करने के लिये गुरु का योगदान होता है।कोई वैज्ञानिक बने डॉक्टर बने इंजीनियर बने नेता बने मेकैनिक बने ड्राइवर बने व्यापारी बने मिस्त्री बने खिलाड़ी बने चाहे कुछ भी कार्य करे सभी के लिये गुरु ही मंज़िल तक पहुंचाता है।कबीर ने गुरु को भगवान
से भी आगे रखा है।
         जो गुरु अपने कार्य को ईमानदारी व निष्कपट व निस्वार्थ भावना से करता है वही महान बनता है, महान बनने के लिये किसी के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नही होता व्यक्ति अपनी नज़रों में ऊंचे आदर्शों का स्वामी होना चाहिये।शिक्षक वही महान बनता है जो विद्यार्थी की हर। ग़लती को क्षमा करने की भावना रखता है और उसकी हर कमज़ोरी को दूर कर शिखर की तरफ ले जाता है वही सच्चा शिक्षक है।डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने शिक्षको की गरिमा को बढ़ाकर समस्त शिक्षकों को गौरवान्वित किया है आदिकाल से गुरु अपने समर्पण और त्याग के लिये जाने जाते थे बड़े बड़े डाकू लुटेरे भी जिन की शरण में आकर सन्त बन गये।चाणक्य जैसे गुरु ने चंद्रगुप्त की सहायता से वृहत भारत का निर्माण कर इसे एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया।द्रोणाचार्य ने विश्व को अर्जुन जैसा श्रेष्ठ धनुर्धर दिया।गुरु समय की रफ्तार को नियंत्रित करने का कार्य कर सकता है।पर कुछ समय से जब से देश भ्र्ष्टाचार व स्वार्थ बढ़ा है नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है और गुरु महिमा को भी ठेस पहुंची है।कुछ गुरु का केवल मकसद होता है ईनाम प्राप्त करना वाह वाही लूटना जो गुरु महिमा के बिल्कुल विरूद्ध है गुरु निस्वार्थ व निष्कपट होना चाहिये कभी भी किसी को नीचा दिखाने का प्रयास न करे यही गुरु का धर्म है।परंतु इस पावन धरती पर कोई भी गुरु की गरिमा कम नहीं कर सकता, शिक्षको में से कुछ इसको कम करने में लगे हुए है  पर उनके हथकंडे बहुत दिनों तक न चल पायेंगे देश भ्र्ष्टाचार भाई भतीजावाद के चंगुल से बाहर निकलेगा  और इस कार्य में गुरु अहम भूमिका निभाएंगे।देश विश्व गुरु बनेगा और इसके गौरवशाली इतिहास की पुनर्स्थापना होगी।

अरुण जेटली जी को श्रद्धांजलि

मेरा विचार है कि देश में  लोगों के नस नस में जो भ्रष्टाचार रम गया था ,ज़्यादातरनेता ,नौकरशाह,अर्थशास्त्री व उद्योगपतियों के लिये ये एक मनोरंजन से बन गया था,आम आदमी के टैक्स की कमाई कुछ लोगों की जेब में जा रही थी औऱ लोग त्राहि त्राहि कर रहे थे।गरीबी बढ़ गयी थी, पुलिस और न्यायालय का प्रयोग आम जनता को कुचलने के लिये किया जा रहा था।देशवासी स्तब्ध व किंकर्तव्यविमूढ़ बन कर रह गये थे चीन और पाकिस्तान का तो छोड़िए बांग्लादेश नेपाल श्रीलंका जैसे देश भी भारत की तरफ नज़रें तिरछी करने लग गये थे।देश की सेनाएं कमज़ोर बन गयी थी क्योंकि अस्त्र शस्त्र की कमी थी ,सेना के शास्त्रग्रहों में लगी आग भी संदेह के घेरे में है ,चाहे इनको दुर्घटना का रूप दिया गया।ऐसे में देश के पटल पर मोदी जैसे राष्ट्रभक्त नेता के पर्दापण ने देशवासियों को आत्मसम्मान से जीने की प्रेरणा दी ,आज फिलहाल किसी को तिरछी नज़रें करने की हिम्मत नही।राष्ट्र को धोखा देना व देशवासियों के खून पसीने की कमाई से भ्रष्टाचार करना भी राजद्रोह है।ऐसे समय अरुण जेटली ने मोदी जी के सहयोग से कई ऐसे फैसले लिये जिसको किताबी दिमाग रखने वाले अर्थशास्त्री शायद नही पहचान पाये।क्योंकि उनके लिए नोटबन्दी व जी एस टी जैसे फैसले गलत थे, जो सही भी था।पर देश का राजनीतिक परिदृश्य पर हर व्यक्ति चाहता था कि भ्र्ष्टाचार रोकने के लिये कुछ ठोस किया जाये ।इसलिये कड़े फैसले लिये गये जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।भ्र्ष्टाचार पर काफी रोक लग चुकी है, आतंकवाद को काबू करने के प्रयास सफल दिख रहे है,नौकरशाही व उद्योगपति सही दिशा में राष्ट्र के लिये काम कर रहे है।अम्बानी टाटा, अडानी रामदेव जैसे लोग ऐसा कारोबार कर रहे जिससे देश का धन बाहर जाना बंद हो गया है।नीरव मोदी विजय माल्या जैसे लोगों के हश्र को देखते हुए डिफाल्टर बैंकों का कर्ज चुका रहे है और सरकार विदेशों में बैठे देश के डिफॉल्टर को चैन नहीं लेने दे रही है।जाली करेंसी बन्द हो गयी है,देशभक्ति की भावना में वृद्धि हुई है।जो शुभ संकेत है कई अर्थशास्री इसको अभी गलत ठहराने में लगे है, जी एस टी का पूरे विश्व ने समर्थन दिया है, सोचने की बात ये की सब जानते थे कि ये मुद्दे अपना नुकसान कर सकते है फिर भी निर्णय लिये गये।बैंकिंग प्रणाली को दरुस्त करने कार्य शुरू किये गये विदेशी निवेश को उदार किया गया है।देश कैशलेस व्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है ,सभी लोग इस व्यवस्था को अपना रहे है माना गरीबों के पास धन की कमी पर इसके देश में विकास के कार्यों को नहीं रोका जा सकता।दूरगामी व देश हित में कई कार्य करने के लिये दिवंगत अरुण जेटली जी को नमन एवम वंदन,प्रभु दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करे व अपने श्रीचरणों में स्थान दे।

एक जैसा परिधान यानि ड्रेस कोड -- सचिन ठाकुर

कई लोग अपने कपड़ों से पहचाने जाते हैं। जैसे पुलिस, वर्दी में होते हैं तो आम जनता इनके पास संरक्षण, शिकायत या मदद के लिए जा सकती है। (मिलगी कितनी भले ही ये सोचनीय है) वर्दी पर अपराधी हमला नही कर सकते। सेना, इनके लिए वर्दी सुरक्षा व सुविधा है। दमकल कर्मी अग्नि व ऊष्मा से बचाव के लिए उपयोगी कपड़े पहनते हैं। पोस्टमैन अपने कपड़ों से पहचाना जाता है। 
     इस तरह के पेशों में संगठन , अनुशासन और एकरूपता की कदाचित जरूरत है। इन कामों के प्रकृति में स्वयतत्ता के लिए जगह ही नही है। 
        स्कूल जैसी किसी चीज का ताल्लुक बच्चों और शिक्षकों से होता है। यहाँ बात दर्शन, स्वतंत्र चिंतन, स्वायत्तता औऱ सृजनात्मकता की होती है। शिक्षक बच्चों के मस्तिष्कों को एक जैसे सांचे में ढालने के लिए नहीं बल्कि इन साँचों को तोड़ने के लिए होते हैं। शिक्षक स्वयं उन साँचों में नहीं आ सकते। यहां जरूरत स्वतंत्र चिंतन की होती है । अब एक से कपड़े पहनने से ये कैसे प्रभावित हो जाएगी? सवाल स्वाभाविक और जायज है। हिंदी और फीजिक्स का टीचर एक से रंग और बनावट के कपड़े पहने तो उनके शिक्षण में क्या अंतर आ जायेगा? तो भाई जब कपड़ों से कोई अंतर नही आता तो काहे ड्रेस पहनाने पर तुले हो? विविध रूप, रंग, बनावट, पहनावे को विद्यालय ही नही पचा सकेंगे तो समाज कैसे स्वीकार करेगा? सारे शिक्षक सिकन्दर के एक जैसे सिपाहियों की फौज है क्या, दाएँ मुड़ेगा दायें मुड़ कहा , मुड़ गए, बैठ जा, उठ जा, ..... सा विद्या या विमुक्तये।  विद्या जकड़ती नहीं जकड़ने तोड़ती है। उसे इस लायक बनाना और बनाये रखना सरकार का काम है। शिक्षा में बदलाव के लिए कुछ भी नया करते जाना सुधार नहीं होता। बदहाल शिक्षा के लिए कुछ करते हुए दिखना  एक ढोंग है। स्कूलों को भवन, पुस्तकालय, पुस्तकें, लैब, लैब उपकरण और शिक्षक चाहिए ड्रेस नहीं। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने एक स्कूल की नौकरी इसलिए स्वीकार नही की कि वहाँ ड्रेस पहननी थी। आजाद खयालातों के दम घोटू माहौल में स्कूल नहीं चलते। 
        ड्रेस समर्थक ये भी तर्क लाते हैं कि बच्चों के लिये क्यों ड्रेस तय करते हो? सवाल ये है कि किस शिक्षाविद ने कहा कि बच्चों की ड्रेस तय करो। दुनियां के तमाम सफल स्कूलों में से किसमें ड्रेस थी? तोतोचान के टोमोये में तो बाकायदा कहा जाता था कि बच्चों को नए कपड़े पहनाकर मत भेजिए ताकि वे कपड़ों की चिंता किये बिना आजादी से अपने काम कर सकें। भारत के तमाम शिक्षाविदों ने अपने सफल स्कूल बिना ड्रेस के चलाये हैं। यही स्कूलों की स्वायत्तता है। बोलने, पहनने, खाने, सोचने पर पहरे लगाने वाले कौन हो सकते हैं, सोचनीय है। 
      बच्चों की ड्रेस के पक्ष में एक और तर्क जीभ की नोक पर विराजमान रहता है। अमीर और गरीब एक जैसे कपड़े पहन के आएगे तो गरीब कुंठित नही होगा। अब्बल तो इन दोनों वर्गो के स्कूल एक हैं ही नहीं। हैं भी तो अमीरी गरीबी को जबरन एक जैसे कपड़े पहना कर ढकने के बजाय इस असमानता को मिटाने की जरूरत है। यह भी एक तर्क है कि एक जैसे पहनावे से भेदभाव नहीं होगा। इसके लिए जाति और धर्म के कठोर विभाजन को खत्म करना होगा। सांस्कृतिक पहचान की इस विविधता को स्वीकारना ओर सम्मान करना स्कूलों में सिखाना होगा।
          खैर, बात शिक्षकों को एक जैसे खोल में डालने की हो रही है। माध्यमिक शिक्षा आयोग की एक टिप्पणी है- 'कोई भी समाज अपने शिक्षकों से बेहतर नही हो सकता।' शिक्षक एक प्रबुद्घ वर्ग होता है उसे जितना दयनीय बनाओगे समाज उतना ही अवनति की ओर जाएगा। स्वायत्तता दो, सम्मान दो, सुविधा दो, जिम्मेदारी दो। एक देश, एक संस्क्रति, एक धर्म , एक भाषा, एक टेक्स के आगे सबको एक जैसी शिक्षा और स्वास्थ्य भी तो बोलो।
         पहनना, खाना, सोचना, बोलना , आदमी की निजता है। आदम समाज की बोल व सोच पर काम करने वालों को भी जकड़ना किन इरादों की अभिव्यक्ति है , इसे   समझना होगा।
       शिक्षक संगठनों ने विरोध को कुछ मांगों की शर्त के साथ जोड़कर एक किस्म से ड्रेस को कुबूल कर लिया है। शिक्षक दिवस तक सरकार एकाध मांगे मान ले तो शिक्षक स्वायत्तता घेंघे के सींग की तरह ड्रेस के खोल में छुप जाएगी। ड्रेस के पक्षधर इससे पहले कुछ सवालों के जवाब जरूर ढूंढें, दुनियां में कहाँ-कहाँ शिक्षक ड्रेस पहनते हैं? किन शिक्षाविदों ने इसकी सिफारिश की है? इससे क्या लाभ हुए हैं? हिमाचल के शिक्षक ड्रेस पहनेंगे तो इससे शिक्षा में किस प्रकार सुधार होंगे? 
      कसम वर्दी की सवाल ही समाज को आगे ले जाते हैं। शिक्षक पूछेंगे तो बच्चे भी पूछना सीखेंगे।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट 
ज़िला मंडी हिमाचल 

कपड़े - सचिन ठाकुर

वट्स एप्प पर मैने शिक्षक नामक ग्रुप बनाया है ।इस ग्रुप में मेरे बेहतरीन प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षक और जानकार प्रिंट ,वेब और टी वी पत्रकार मित्र शामिल हैं ।ग्रुप में आम तौर पर किसी न किसी ज्वलन्त विषय को लेकर सटीक विश्लेषण ,उम्दा बहस और कभी कभार भयंकर युद्ध जैसे हालात उतपन्न हो जाते हैं।
आज किसी शिक्षक मित्र ने शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों को साधारण कपड़ो में स्कूल आने की सलाह वाला पत्र इस ग्रुप में पोस्ट करा।मजेदार बात ये थी की जब मैंने इस पत्र को पढा उसी समय मैं अमेजॉन किंडल पर चम्पारण सत्याग्रह को पढ़ रहा था ।
चम्पारण सत्याग्रह निसन्देह मोहन दास कर्म चंद गांधी को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी में परिवर्तित करने वाला पहला कदम था ।इस आंदोलन की खास बात बापू के कपड़े थे।इससे पहले वो अंग्रेजी पेंट और कमीज पहनते थे।इसी आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी कपड़े छोड़े और धोती ,कुर्ता और सर पर गमछा धारण कर गांव गांव जा जनता को जगाना शुरू करा।साधारण जन समूह में गांधी की छवि घर कर गई।अंग्रेजी सरकार की नीवं में दरार उतपन्न हुई।उनकी समस्या बमुश्किल 45 किलो,ठिगने और पतले शरीर वाले गांधी नहीं बल्कि उनकी महामानव बनने वाली छवि बन गई।मशहूर अखबार " पायनियर " के साथ मिल कर अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी की छवि को बिगाड़ने का काम शुरू किया।हर दिन पायोनियर अखबार गांधी के विरुद्ध कोई न कोई लेख लिखता और हर लेख में गांधी के कपड़ो को निशाना बनाया जाता।बहुत वक्त तक गांधी ने इन लेखों पर चुप्पी साधे रखी परन्तु पानी सिर से ऊपर बह जाने के बाद गांधी ने पायोनियर अखबार को अपनी वेशभुसा के बारे में एक पत्र लिखा ।उसके आखिरी वाक्य ये थे "...... कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिए।धोती कुर्ता मुझे बेहद सहूलियत और आराम देते हैं, गमछा इसलिए सिर पर धारण करता हूँ क्योंकि ये भीषण गर्मी से बचाता है।कपड़ों को किसी धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती या पूर्वी अथवा पश्चिमी सभ्यता में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता होगी...... "
ये पत्र जब पायोनियर अखबार के मालिक और प्रधान संपादक के पास पहुंचा तो वो खुद गांधी से मिलने आये।उनसे माफी मांगी और ये पूरा पत्र अगले दिन के अखबार में माफी सहित छापा।
मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे विभाग के अधिकारियों का साधारण कपड़ो से अभिप्राय क्या है।कपड़ों का शिक्षा की गुणवत्ता से क्या लेना देना है, ये भी मुझे नहीं पता।अगर ये पत्र महिला अध्यापको के लिए है तो फिर पत्र जारी करने वाले अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से अपना पद तय्याग देना चाहिए क्योंकि सामन्त वादी सोच के लोगों के लिए शिक्षण व्यवस्था में कोई जगह है ही नहीं।इस पत्र का क्या संदेश है ,इसके लिए तुरन्त एक वर्कशॉप विभाग को आयोजित करनी चाहिए जिसमें शिक्षक, न्याय विद ,फैशन डिज़ाइनर ,जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सबसे जरूरी " स्वतन्त्र और गणतांत्रिक देश " की असली परिभाषा समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भी बुलाये जाने चाहिए।
याद रखिये " गन्दगी कपड़ो में नहीं होती , देखने वाले कि नजरों में होती है .... "
मैं फिर बापू के ऐतिहासिक पत्र की पंक्ति दोहरा दूं.... " कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिएं....... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट
ज़िला मंडी हिमाचल 


बांग्ला लघुकथाः
एलियन की आँखों से भारत
- शमीम अख्तर बानो
मूल बांग्ला से अनुवाद - रतन चंद रत्नेश
..................................................................................
उड़न-तश्तरी पर सवार होकर एक एलियन दूसरे ग्रह से इस धरती पर आया। उसे यहाँ विभिन्न देशों की जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजा गया था।
एलियन पहले अमेरिका गया। वहाँ के वासिंदों से पूछने पर सबने एक ही बात कही कि वे अमेरिकन हैं। उसके बाद पाकिस्तान जाने पर वहाँ  भी यही जवाब मिला - मैं पाकिस्तानी हूँ।इसी तरह बांग्लादेश के लोगों ने उस प्राणी को अपना परिचय बांग्लादेशी के रूप में दिया।
फिर एलियन भारत आया। विभिन्न राज्यों में जाने पर उसे अलग-अलग परियच मिला। किसी ने कहा, मैं गुजराती हूँ  तो किसी ने खुद को बंगाली बताया। किसी ने अपना परिचय बिहारीके रूप में दिया। इस देश में किसी व्यक्ति ने उसे अपना परिचय यह कहकर नहीं दिया कि मैं भारतीय या इंडियन हूँ ।
अपने ग्रह में लौटकर ने अपनी रिपोर्ट सौंपते हुए लिखा - पृथ्वी पर इंडिया नाम का एक अद्भुत देश है, जहाँ एक भी इंडियन ढूंढे नहीं मिलता।






































































































































Sushil Bhimta

बस यूं ही जीवन सफर पर चलते चलते, उम्र के एक पड़ाव की शाम ढलते-ढ़लते।
बचपन की यादों के दिल में मचलते-मचचलते, वक्त के जख्मों को भरते-भरते…बचपन के चार दिवारी में पलते-पलते!–आंसूओं का सैलाब पथराई आँखों से निकलते-निकलते–बस यूं ही जीवन सफर पर चलते-चलते!

गिरवी बचपन— क्यों ना चंद लम्हें उस बचपन के याद करलें जो बर्फ में तसलें में फिसलता और ठंड से ठिठुरता हाथ पर गर्म सांसे फुंकता था कभी। वो गांव की बर्फ की सफेद चादर से ढकी जमीं तो आज भी नजर आती है मगर गाँव की गलियों में खेलता वो बचपन आज शहर के पारकों, प्ले स्कूलों के दिखावे में खोकर बंदिशों में घुटकर दम तोड़नें लगा और गांव की गलियां चौबारे, नुक्कड़ वीरान छोड़नें लगा।

आधुनकिता ने गांव की माटी से रिश्ता तोड़ दिया। वो आजादी की उड़ान भरनें वाला नन्हा सा लाड़ प्यार-दुलार से भरा बचपन चार दिवारी में तन्हा छोड़ दिया। वक्त के साथ बदले हालात के हाथों तन्हाई में और चारपाई पर मोबाइल पर बचपन के अनमोल पल खोता और बचपन की दोस्ती की मस्ती खोता नजर आता है।

वो गुड़ की ढली और मक्की की रोटी की जगह पिजा, बर्गर, पेटीज खाता बीमारियों को बुलाता वो मासूम बचपन हर जगह नजर आता है। स्वाद ने स्वास्थ्य ले लिया और दिखावे नें ज़िदगी से किनारा कर लिया। शिक्षा सिर्फ अंग्रेजों से भिक्षा बनकर रह गई। ज्ञान अब अंग्रेजी है और विद्वान हिन्दोस्तानी बनें अंग्रेज। जिन्हें 79-89, 94 और 95 का पता नहीं, आज रामायण महाभारत, वैद-शास्त्रों को कोई पड़ता नहीं उन्हें अपने संस्कारों का पता चलता नहीं।

आज छाये फिल्म जगत के कपूर और खान हैं जो परदों पर निकाल रहे संस्कारों और भारतीयता की जान हैं धर्म के ठेकेदार बने आसाराम और राम रहीम जैसे जो अपने ढाबों में निकाल रहे आस्था के नाम पर आवाम की जान हैं। हरम बनाकर जी रहे धर्म स्थलों को, राजनीति और धर्म गुरु बनकर ली आड़ में हुए बेलगाम हैं। 11–12साल की उम्र में ही बेटियों की लूटते आबरू और जाती मासूमों की जान है। दौलत नें बचपन खरीद लिया, प्ले स्कूलों, करचों का साया डालकर और माता-पिता का माल देखकर! धुँधला गई माया जाल के फैले जाल से माँ-बाप की आंखें और बचपन बेचकर दिखावे की चादर खरीद लाये जिसमें बाहर से चमक तो बहुत है पर ओढ़ने पर सकूँ नहीं मिलता। बचपन पराये हाथों में पलता है जो अपनेपन को छलता है जिसका असर आज माँ बाप से और सामाजिक रिश्तों में आई दूरियों में झलकता है। बस बचपन की माँ -पिता रिश्ते-नातों की इसी अनमोल सीख की कमीं से युवा रिश्तों की दुनियाँ को छोड़ आज के दौर में थोड़ा बेदर्द दिखता है।

दौलत कमाना कोई गुनाह नहीं लाजमी है जीनें के लिए। मगर उसके सरूर में अपने घर के चिराग को जिसने चलना फिरना अभी सीखा ही होता है उसको अंग्रेजी संस्कार ही कहूँगा कि शिक्षा देने वालों के सुपुर्द कर देना मतलब बेदर्द और बेपरवाह बना देना है।

इस हालत में बड़ा हुआ बचपन फिर देश में नहीं विदेश में रुकता है और माता-पिता की आँखों में तब सिर्फ आंसुओं का सैलाब और वृद्धाश्रमों का द्वार दिखता है जहां फिर बुढापा सिसकता और गैरों से जबरदस्ती लिपटता दिखता है।

अंगेजी सिर्फ एक भाषा है जो सिर्फ माध्यम है विचारों के आदान प्रदान का, हमारे धर्म ग्रन्थ-कथा, कहानियां, पूजा-पाठ, रीति-रिवाज, वेशभूषा हमारी पहचान है। इन्हें बढ़ावा तभी मिल सकता है जब इन्हें कहीं ना कहीं हमारे पाठयक्रम और सामाजिक जीवन में आवश्यक तौर पर अपनाया और लाया जाए। आज भी हमें अंग्रेजी और अंग्रेजों ने मानसिक गुलाम बना रखा है और घर को शमशान बना रखा है जहां रोज संस्कारों व्यवहारों की अर्थी जलाई और दफनाई जाती है।

आसुंओ का सैलाब हर घर की दहलीज से निकलकर गाँव, शहर की गलियों से गुजरकर देश में अराजकता का समुंदर बनकर देश डूबने लगा है। जो सबको दिखता है पर फिर भी बचपन दिखावे के हाथों बिकता है। दौलत का जनून दिखता है। बचपन के बगैर हर घर वीरान दिखता है। धार्मिक शिक्षा ग्रन्थों को प्राण दो बचपन को नई पहचान दो, घर के वीरानों को बचपन की किलकारियों से जान दो!….होड़ है, दौड़ है, कोढ़ है, ये दिखावा एक भयानक मोड़ है!

अंत में एक गुजारिश करना चाहूंगा देश की सरकार और राज्यों की सभी सरकारों के कर्णधारों से की अंग्रेजी माध्यम ठीक है मगर उसके साथ-साथ हमारे संस्कारों, व्यवहारों को शिक्षा पाठयक्रम में लाना भी जरूरी है। हम सब सामाजिक प्राणियों का भी उतना ही उत्तरदायित्व है जितना कर्णधारों का, कि हम अपने बच्चों को अपने रीति-रिवाजों और भारतीय परिधानों, आचरण-व्यवहारों से जोड़े रखें। वर्ना बचपन विदेश में युवा बनकर आबाद होगा और भारत यूँ ही बर्बाद होगा और हमारे बुढापे का ये कडुवा स्वाद होगा।

बचपन को प्ले स्कूलों, कर्च, मोबाईल आदि में मत फसाइये उसे समय दीजिये ये कच्ची मिटटी के खिलौने हैं टूट जातें हैं इन्हें गैर हाथों में इतनी जल्दी मत सौंपिये। फूल हैं इन्हें माँ बाप रिश्ते नातों और अपने अपने समाज की बगिया में खिलने दीजिये। इनकी नाजुक उंगलियों को पकड़ कर एक उम्र तक इन्हें चलना सिखायें। फिर जहां चाहो वहां छोड़ जायें । तब ये घर समाज, देश हर जगह महकेंगे, बहकेंगे नही।

लेखक स्वतंत्र विचारक हैं तथा हिमाचल प्रदेश में रहते हैं।

विपक्ष के नकारेपन के कारण फासीवादी ताकतों ने सरकार पर कब्जा कर लिया है


बाराबंकी । कामरेड राम नरेश वर्मा कम्युनिस्ट पार्टी के निर्भीक, लडाकू व संघर्ष शील नेता थे यह विचार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि कामरेड वर्मा ऐसे वक्त में दिवंगत हुए हैं जब विपक्ष के नकारेपन के कारण फासीवादी ताकतों ने सरकार पर कब्जा कर लिया है मजदूर किसान की कोई बात सुनने वाला नहीं है
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता हुमायूं नईम खां ने कामरेड राम नरेश को कर्मठ व ईमानदार साम्यवादी बताया। बहुजन समाज पार्टी के जिला उपाध्यक्ष राम प्रताप मिश्रा ने कहा कि राजनीति में कामरेड राम नरेश एक अच्छे दोस्त थे और समाज को नई दिशा देने का काम किया था
कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सहसचिव डॉ कौसर हुसेन ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को बनाए रखना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि आज पार्टी को कामरेड रामनरेश वर्मा जैसे लड़ाकू नेताओं की जरूरत है।
श्रद्धांजलि सभा को शिव दर्शन वर्मा किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह, प्रवीण कुमार, बहुजन समाज पार्टी के निशात अहमद समाजसेवी फजलुर्र्हमान, समाजवादी पार्टी के आशाराम वर्मा, हनोमान प्रसाद, अमर सिंह प्रधान, जियालाल वर्मा, मुनेश्वरबक्स गिरीश चन्द्र, राम सुचित वर्मा, योगेंद्र सिंह, श्याम सिंह, अंकुर वर्मा, अधिवक्ता नीरज वर्मा आदि प्रमुख लोग थे।

EVM और चुनाव

देश के नेता और मीडिया विश्वसनीयता खोता जा रहा है।पहले बूथ capturing होती थी जनता को ठगा जाता, शेषन साहब द्वारा  चुनाव सुधार प्रक्रिया शुरू की गई थी उससे चुनावों में काफी पारदर्षिता आ चुकी है।EVM खराब हो सकती है पर उसमें हेरा फेरी करना बेहद मुश्किल है।जो लोग हेरा फेरी करके विजेता बनते थे वे हार रहे है और चुनाव प्रक्रिया को निशाना बनाते है।मैं तो कहूंगा कि अब समय आ गया है कि अब मोबाइल एप या किसी जगह आधार कार्ड के माध्यम से अंगूठा लगा कर वोटिंग हो ताकि शत प्रतिशत वोटिंग लक्ष्य हासिल हो सके।कुछ नकारे गए लोग देश को बैलट वाली उसी चोर दुनिया में ले जाना चाहते है जहां कहा जाता है कि पोलिंग बूथ के ठेके होते थे और बाहुबली चुनावों को निर्धारित करते है।यदि भाजपा को दोषी बताते है तो देश में बहुत। से राज्यो में अन्य दलों की सरकारें है और उनकी देखरेख में चुनावी प्रक्रिया सम्पन्न होती है।अतः देश को आगे ले जाना चाहिये पीछे नहीं यही देश के लिए उचित है।

मुझे तोड़ लेना वनमाली-- जगदीश बाली


Jagdish Bali
एक बार फ़िर वही हुआ जो घाटी में दशकों से होता आया है। एक बहुत बड़ा फ़िदायीन हमला और देश के लगभग 40 जवान शहीद हो गए। जब कभी भी जम्मू-कश्मीर में ये लगने लगता है कि घाटी में अमन कायम होने वाला है, तभी दहशतगर्द ऐसी घटना अंजाम दे जाते हैं कि हर एक सच्चा हिंदोस्तानी सिहर उठता है। कुछ ही समय पहले जब बारामूला को आतंकी रहित ज़िला घोषित किया गया, तो लगा कि नए साल में घाटी की फ़िज़ाओं में अमनोचैन की खुशबू फ़ैलने वाली है। पर अमनोचैन कैसे हो सकता है जब पड़ोसी देश पाकिस्तान हो, उसकी पनाह में नाचने वाले दहशतगर्द हो और दहशतगर्दों को कवर देने वाले पत्थरबाज़ अपने देश में ही मौजूद हो। पुलवामा ज़िले में स्थित अवंतिपोरा इलाके में जिस तरह से जैश-ए-मौहम्मद के विस्फोटक फ़िदायीन हमले में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस के जवानों को उड़ाया गया, वो घाटी में दहशतगर्दों के इरादों को स्पष्ट करता है। सितंबर 2016 में हुए उरी हमले से भी बड़ा व भयानक ये हमला था। इस आत्मघाति विस्फोट के बाद जो मंज़र पसरा था, उसे देखना हर किसी के बस की बात नहीं थी। चारों ओर क्षत-विक्षत पड़े शवों को पहचानना तो दूर, शहीद जवानों के अंगों को ढूंड पाना भी असंभव था। आदिल अहमद डार द्वारा कार्यान्वित यह हमला इस बात की बानगी है कि दहशतगर्दों को अमनोचैन व बात-चीत से कोई सरोकार नहीं। वे तो बस कत्लोगारत व दहशत से जन्नत जाना चाहते हैं। इंसानियत खो चुके ऐसे आतंकियों का सफ़ाया होना चाहिए और उनके पनाहगाह पड़ोसी को भी माकूल सबक सिखाया जाए। उनसे बात-चीत का ढिंढोरा पीटना बंद होना चाहिए। अहम सवाल है आखिर कब तक हमारे देश के जवान यूं ही शहीद होते रहेंगे। आतंकियों के सथ रोज़ मौत से रु-ब-रु होते सैनिकों की बदौलत ही हम देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है।
ज़रा अंदाज़ा लगाइए घाटी के उस विरोधपूर्ण और तनाव भरे वातावरण व परिस्थितियों की, जिनमें हमारा फ़ौजी काम कर रहा है। ये स्थिति सचमुच किसी भीषण आपदा से कम तो नहीं है। कश्मीर घाटी में एक ओर तो सैनिक पाकिस्तान से आ रहे गोलों का सामना करते हैं और दूसरी ओर उसके द्वारा भेजे गए आतंकवादियों से लोहा लेते हैं। उस पर ये ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ व ’हिंदोस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगानेवाले पत्थरबाज़ और सियासी चालबाज़। हद तो तब हो जाती है जब सियासी गलियारों से भी ’पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा गूंज उठता उठाता है। दरअसल ये आवाज़ उन लोगों की है जो नमक तो भारत का खाते हैं, परन्तु उनके दिल में सहानुभूति पाकिस्तान के लिए हैं। ऐसी अलगाववादी व हिंदोस्तान विरोधी सोच रखने वालों के लिए अफ़जल गुरू, कसाव, बुराहन अवानी जैसे लोग शहीद ही होंगे और वे मानव अधिकार की आड़ में ऐसे लोगों को बचाने का भरसक प्रयास करते रहेंगे।
 हम चैन की नींद इसलिए सो पाते हैं क्योंकि सीमा पर वहां वो सैनिक खड़ा है। हम इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वह सैनिक दुश्मन के आ रहे गोलों के सामने चट्टान बन कर ढाल की तरह खड़ा है। पूस की कड़कड़ाती ठंड हो या जेठ की झुलसा देने वाला ताप, वो सैनिक वहां मुस्तैद खड़ा है। हम इसलिए अपने परिवार के साथ आनंदमय और सुखी जीवन का उपभोग कर रहे हैं क्योंकि कोई अपने परिवार, अपनी पत्नी, अपने बच्चों, अपने भाई- बहिन, अपने मां-बाप को छोड़ कर सीमा पर तैनात है। हम इसलिए अपनी छुट्टियों व त्यौहारों की खुशियां मना पाते हैं, क्योंकि वहां देश का वो जवान खड़ा है, जिसके लिए कई बार छुट्टियां भी नसीब नहीं होती और मिलती है, तो कोई पता नहीं कब सीमा पर से बुलावा आ जाए। वह फ़ौजी शिकायत भी नहीं करता। वो तो देश के लिए शहीद होने के लिए तैयार रहता है। वह सिर नहीं झुकाता, बल्कि सिर कटाने के लिए तैयार रहता है और कहता है:
मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक
मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पथ जाए वीर अनेक
   आखिर बर्दाश्त की हद होती है। विभिन्न न्यूज चैनल्ज़ पर वीडियो में साफ देखा जा सक्ता है किस तरह से अलगाववादी सैनिकों को लात-घूंसे मारते है, उनसे छीना झपटी की जाती है और उनकी टोपी तक उछाली जाती है। फिर भी सैनिक सहन करते हैं। फिर पत्थरबाज़ उन पर पत्थरों की बरसात करने लग जाते हैं। ये सब देख कर आम देशवासी का तो खून कौलने लगता है। आखिर सैनिक कब तक खामोश रहे और क्यों? पाक परस्त पत्थरबाजों व उनके चालबाज सियासी आकाओं को समझ लेना चाहिए कि उनके नापाक मनसूबे कभी पूरे नहीं होंगे।
 आज सीमा पर जवान रोज़ कुर्बान हो रहे हैं और इसके बावजूद भी सियासत के कई मदारी उनके विरुद्ध ऎफ़.आइ.आर दायर करने की बात करते हैं और पत्थर बाज़ों को आम मुआफ़ी का तोहफ़ा प्रदान करते हैं। वे पाकिस्तान के साथ बातचीत की हिमायत जोर शोर से करते हैं। ऐसा कर वे सैनिक के मनोबल को गिराने का घिनौना प्रयास कर रहे हैं और देश की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं। जिन सैनिकों की बदौलत देशवासियों को सुरक्षा और अमनोचैन की ज़िंदगी मयस्सर होती है, उनके विरुद्ध प्राथमिकि दर्ज़ कर उनके मनोबल को नहीं गिराया जाता, बल्कि उनकी वतन परस्ती के ज़ज़्बे के आगे सिर झुकाया जाता है। भूलना नहीं चाहिए कि जब जवान आक्रोष में आता है, तो वह ऐसे शक्तियों को छिन्न-भिन्न कर देता है।
 वक्त आ गया है कि आतंकियो और उन्हें सहायता देने वाले पत्थरबाज़ों के साथ शून्य सहनशीलता की नीति को अपनाया जाए क्योंकि ये  न प्रेम की भाषा जानते हैं न मोहब्बत के गुलाब। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उचित ही कहा है:
छीनता हो स्वत्व कोई, और तू त्याग-तप से काम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है
 आज देश के हर फौजी से सच्चा देशवासी कह रहा है – फौजी! तुम्हारे कारण ये देश जिंदाबाद है। इसलिए तुम हमेशा ज़िंदाबाद हो और तुम्हें ये देश जय हिंद कहता है।